हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम उच्छ्वासः ४१५ बोधिसत्त्वजातकानि जपद्भिर्जातसौगतशीलशीतलस्वभावैः शार्दूलैर- प्यमांसाशिभिरुपास्यमानम् , आसनोपान्तोपविष्टविस्रब्धानेककेसरिशाव- कतया मुनिपरमेश्वरम् , अकृत्रिम इव सिंहासने निषण्णम्, उपशममिव पिबद्भिर्वनहरिणैर्जिह्वालताभिरुपलिह्यमानपादपल्लवम् , वामकरतलनिविष्टेन नीवारमश्नता पारावतपोतकेन कर्णोत्पलेनेव प्रियां मैत्रीं प्रसादयन्तम् , इतरकरकिसलयनखमयूखलेखाभिर्जनितजनव्यामोहम् , उद्ग्रीवं मयूरं मरकतमणिकरकमिव वारिधाराभिः पूरयन्तम् , इतस्ततः पिपीलकश्रे- णीनां श्यामाकतण्डुलकणान्स्वयमेव किरन्तम् , अरुणेन चीवरपटलेन म्रदीयसा संवीतम् , बहलबालातपानुलिप्तमिव पौरंदरं दिग्भागम् , उल्लि- खितपद्मरागप्रभाप्रतिमया रक्तावदातया देहप्रभया पाटलीकृतानां काषा- यग्रहणमिव दिशामप्युपदिशन्तम् , अनौद्धत्यादधोमुखेन मन्दमुकुलित- बोधिः समाधिः । तत्प्रधानसत्त्वं बुद्धभट्टारकः । तदीयानि जातकानि जीमूतवाह- नादिजन्मकथाः । मुनिपरमेश्वरम् मुनीश्वरं बुद्धम् । अपकारिण्यभिप्रीतिमैत्री । पिपीलकः कीटभेदः । चीवरं मुनिवासः । संवीतमाच्छादितम् । उल्लिखितश्चरणो- ( धर्मोपदेश ) करती थीं। उल्लू पक्षी भी बोधिसत्त्व की जातक कहानियों को हमेशा सुन रहे थे और उनसे आलोक ग्रहण कर रहे थे। व्याघ्र भी भगवान् बुद्ध का शील पालन करते थे और उनका स्वभाव शान्त बन गया था, और कभी भी मांस का आहार नहीं करते थे । इस प्रकार वहां भदन्त की सेवा हो रही थी। उनके आसन के दोनों ओर कई सिंहशावक विस्रब्धभाव से बैठे हुए थे। ऐसा लग रहा था मानों साक्षात् मुनि परमेश्वर भगवान् बुद्ध ही सिंहासन पर विराजमान हों। वनहरिन उनके पैर चाट रहे थे, मानों उनके शमभाव का पान कर रहे हों। उनके बायें हाथ पर बैठा हुआ कबूतर का बच्चा धान कुटरा रहा था, मानों अपने-अपने कर्णोत्पल के द्वारा प्रियामैत्री-भावना का प्रसादन कर रहे थे। उनके दाहिने हाथ के नखों की किरणें लोगों को चकाचौंध में डाल देती थीं। मरकत के कमण्डलु की भाँति गर्दन ऊपर उठाए मयूर को जलधारा से नहला रहे थे। इधर उधर स्वयं जाकर चींटियों के लिए सांवा की खुद्दी छींट रहे थे। लाल और मुलायम संघाटी ओढ़े हुए थे, मानों प्रातःकाल अरुणाई से भरा पूर्व का दिग्भाग हो। खराद पर चढ़े हुए पद्मराग के समान लाल और उज्ज्वल अपनी देह की प्रभा से दिशाओं को पाटल बना रहे थे, मानों उन्हें भी काषाय वस्त्र धारण करने के लिए उपदेश कर रहे हों । थोड़े मुकुलित कुमुद की भाँति उनकी स्निग्ध, धवल और प्रसन्न आँखें अनौद्धत्य के कारण झुकी हुई थीं मानों संसारी क्षुद्र जन्तुओं के जीवन के लिए अमृत की वर्षा कर रहे थे। उनका