हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१६ हर्षचरितम् कुमुदाकरेण स्निग्धधवलप्रसन्नेन चक्षुषा जनक्षुण्णक्षुद्रजन्तुजीवनार्थममृत- मिव वर्षन्तम् , सर्वशास्त्राक्षरपरमाणुभिरिव निर्मितम् , परमसौगतमप्य- बलोकितेश्वरम् , अस्खलितमपि तपसि लग्नम् , आलोकमिव यथावस्थि- तसकलपदार्थप्रकाशकं दर्शनार्थिनाम् , सुगतस्याप्यभिगमनीयम् , अवध- र्मस्याप्याराधनीयमिव, प्रसादस्यापि प्रसादनियमिव, मानस्यापि मान- नीयमिव, वन्द्यत्वस्यापि वन्दनीयमिव, आत्मनोऽपि स्पृहणीयमिव, ध्यानस्यापि ध्येयमिव, ज्ञानस्यापि ज्ञेयमिव, जन्म जपस्य, नेमिं निय- मस्य, तत्त्वं तपसः, शरीरं शौचस्य, कोशं कुशलस्य, वेश्म विश्वासस्य, सद्वृत्तं सद्वृत्ततायाः, सर्वस्वं सर्वज्ञतायाः, दाक्ष्यं दाक्षिण्यस्य, पारं परानुकम्पायाः, निर्वृतिं सुखस्य, मध्यमे वयसि वर्तमानं दिवाकरमित्रम- द्राक्षीत् । अतिप्रशान्तगम्भीराकारारोपितबहुमानश्च सादरं दूरादेव शिरसा वचसा मनसा च ववन्दे । दिवाकरमित्रस्तु मैत्रीमयः प्रकृत्या विशेषतस्तेनापरेणादृष्टपूर्वेणामानु- षलोकोचितेन सर्वाभिभाविना महानुभावामोगभाजा भ्राजिष्णुना भूपतेर- ङ्गीढः। क्षुद्राः स्वल्पाः । अवलोकितेश्वरनामा बुद्धविशेषोऽपि । अस्खलितमपीति । स्खलितो ह्यन्यत्र लग्नो भवति, सत्त्वभ्रष्टशीलस्तपःस्थश्च । दिवाकरमित्रस्तु तेन भूपतावाकारविशेषेण प्रश्रयेण च युगपच्चक्षुषि चेतसि विद्याशरीर मानों समस्त शास्त्रों के अक्षररूपी परमाणुओं से बना हुआ जान पड़ता था । परमसौगत होते हुए भी वे अवलोकितेश्वर ( एक बोधिसत्त्व ) थे । ( विरोध पक्ष में वह बौद्ध होते हुए भी ईश्वर का दर्शन करने वाला था । ) स्खलित न होते हुए भी वे तपस्या में लग्न थे । वे आलोक के समान दर्शनार्थियों के लिये ठीक-ठीक रूप में समस्त पदार्थों को प्रकाशित कर देते थे । स्वयं बुद्ध से भी वे आदर पाने योग्य थे और स्वयं धर्म से भी पूजा के योग्य थे । वे आत्मा के भी स्पृहा करने योग्य, ध्यान के भी ध्येय, ज्ञान के भी ज्ञेय, जप के जन्म, नियम के नेमि, तपस्या के तत्त्व, पवित्रता के साक्षात् शरीर, कुशल के कोश, विश्वास के गृह, सदाचार के निवास, सर्वज्ञता के सर्वस्व, दाक्षिण्य के दाक्ष्य, दूसरों पर अनुकम्पा से भरे और सुख के प्राप्तिसाधन थे, उनकी अवस्था अधेड़ थी । दिवाकर- मित्र के अति प्रशान्त और गम्भीर आकार को देखकर राजा के मन में सम्मान का भाव उत्पन्न हुआ और राजा ने दूर ही से अपने सिर से, वचन से और मन से उनकी वन्दना की । दिवाकरमित्र स्वभाव से ही मैत्रीभावना से परिपूर्ण थे, फिर भी विशेषरूप से जिसे