हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] अष्टम उच्छ्वासः ४१७
प्राकृतेनाकारविशेषेण तेन चाभिजात्यप्रकाशकेन गरीयसा प्रश्रयेण चाह्लादितश्चक्षुषी च चेतसि च युगपदमग्रहीत् । धीरस्वभावोऽपि च संपा- दितसंभ्रमाभ्युत्थानः संकलय्य किंचिदुद्गमनकेन विलोलं विलम्बमानं वामांसाच्चीवरपटान्तमुत्क्षिप्य चानेकाभयदानदीक्षादक्षिणे दक्षिणं महा- पुरुषलक्षणलेखाप्रशस्तं स्निग्धमधुरया वाचा सगौरवमारोग्यदानेन राजा- नमनुग्रहीत् । अभ्यनन्दच्च स्वागतगिरा गुरुमिवाभ्यागतं बहु मन्यमानः स्वेनासनेनाडूध्वमत्रेति निमन्त्रयांचकार । पार्श्वस्थितं च शिष्यमब्रवीत्— ‘आयुष्मन् ! उपानय कमण्डलुना पादोदकम्’ इति । राजा त्वचिन्तयत्— ‘अलोहः खलु संयमनपाशः सौजन्यमभिजातानाम् । स्थाने खलु तत्र- भवान्गुणानुरागी ग्रहवर्मा बहुशो वर्णितवानस्य गुणान्’ इति । प्रकाशं चाबभाषे—‘भगवन् ! भवद्दर्शनपुण्यानुगृहीतस्य मम पुनरुक्त इवायमार्य- प्रयुक्तः प्रतिभात्यनुग्रहः । चक्षुःप्रमाणप्रसादस्वीकृतस्य च परकरणमिवा- च आह्लादित आनन्दितः सन्नन्वग्रहीदिति संबन्धः । महानुभावानामुत्तमानाम् । आभोगं टङ्कं भजत इत्याकारविशेषणम् । संकलय्य संयम्य । उद्गमनमुत्थापनम् । आगमनमागतम् , सुखेनागतं स्वागतम् । स्वागतप्रभार्थं गीस्तया अत्रोपविशेति । पहले नहीं देखा था, जो मनुष्य के लिए सम्भव नहीं, सबको अभिभूत कर देने वाला, महानुभावता से ओत-प्रोत, चमकीला और अग्राम्य राजा के उस आकार से और उनकी कुलीनता को व्यक्त करने वाले श्रेष्ठ विनय को देख कर उनकी आंखों में और चित्त में प्रसन्नता भर आई । गम्भीर प्रकृति के होने पर भी व्यग्रता के साथ अपने आसन से उठ कर अनेक जीवों को अभय दान की दीक्षा देने वाले उन्होंने शीघ्रता से उठने के कारण खिसक कर बायें कन्धे से लटकते हुए अपने चीवर समेट लिया और महापुरुष के लक्षणों से युक्त राजा को अपनी स्निग्ध और मधुर वाणी के गौरव के साथ आशीर्वाद देकर अनुगृहीत किया और उचित आवभगत से उनका स्वागत किया एवं गुरु के समान पधारे हुए अभ्यागत को ‘यहां विराजिए’ यह कह कर बड़े आदर के साथ निमंत्रित किया । बगल में बैठे हुए अपने एक शिष्य से बोले—‘आयुष्मन्, चरण पखारने के लिए कमण्डल का जल लाओ ।’ राजा सोचने लगे—‘सचमुच कुलीन पुरुषों का सौजन्य बिना लोहा के बना हुआ बांधने वाला पाश है । गुण के अनुरागी आदरणीय गृहवर्मा ने ठीक ही बहुत से इनके गुणों का वर्णन किया था ।’ तब उन्होंने कहा—‘भगवन्, आपने दर्शन देकर ही मुझ पर बड़ा अनुग्रह किया । फिर जो आर्य के द्वारा मेरा यह सम्मान है, इससे वह अनुग्रह पुनरुक्त-सा लगता है । जब आपने मुझे नयन-प्रसाद से स्वीकृत किया तो ये २७ ह० च०