हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
[Header] अष्टम उच्छ्वासः ४१७
प्राकृतेनाकारविशेषेण तेन चाभिजात्यप्रकाशकेन गरीयसा प्रश्रयेण चाह्लादितश्चक्षुषी च चेतसि च युगपदमग्रहीत् । धीरस्वभावोऽपि च संपा- दितसंभ्रमाभ्युत्थानः संकलय्य किंचिदुद्गमनकेन विलोलं विलम्बमानं वामांसाच्चीवरपटान्तमुत्क्षिप्य चानेकाभयदानदीक्षादक्षिणे दक्षिणं महा- पुरुषलक्षणलेखाप्रशस्तं स्निग्धमधुरया वाचा सगौरवमारोग्यदानेन राजा- नमनुग्रहीत् । अभ्यनन्दच्च स्वागतगिरा गुरुमिवाभ्यागतं बहु मन्यमानः स्वेनासनेनाडूध्वमत्रेति निमन्त्रयांचकार । पार्श्वस्थितं च शिष्यमब्रवीत्— ‘आयुष्मन् ! उपानय कमण्डलुना पादोदकम्’ इति । राजा त्वचिन्तयत्— ‘अलोहः खलु संयमनपाशः सौजन्यमभिजातानाम् । स्थाने खलु तत्र- भवान्गुणानुरागी ग्रहवर्मा बहुशो वर्णितवानस्य गुणान्’ इति । प्रकाशं चाबभाषे—‘भगवन् ! भवद्दर्शनपुण्यानुगृहीतस्य मम पुनरुक्त इवायमार्य- प्रयुक्तः प्रतिभात्यनुग्रहः । चक्षुःप्रमाणप्रसादस्वीकृतस्य च परकरणमिवा- च आह्लादित आनन्दितः सन्नन्वग्रहीदिति संबन्धः । महानुभावानामुत्तमानाम् । आभोगं टङ्कं भजत इत्याकारविशेषणम् । संकलय्य संयम्य । उद्गमनमुत्थापनम् । आगमनमागतम् , सुखेनागतं स्वागतम् । स्वागतप्रभार्थं गीस्तया अत्रोपविशेति । पहले नहीं देखा था, जो मनुष्य के लिए सम्भव नहीं, सबको अभिभूत कर देने वाला, महानुभावता से ओत-प्रोत, चमकीला और अग्राम्य राजा के उस आकार से और उनकी कुलीनता को व्यक्त करने वाले श्रेष्ठ विनय को देख कर उनकी आंखों में और चित्त में प्रसन्नता भर आई । गम्भीर प्रकृति के होने पर भी व्यग्रता के साथ अपने आसन से उठ कर अनेक जीवों को अभय दान की दीक्षा देने वाले उन्होंने शीघ्रता से उठने के कारण खिसक कर बायें कन्धे से लटकते हुए अपने चीवर समेट लिया और महापुरुष के लक्षणों से युक्त राजा को अपनी स्निग्ध और मधुर वाणी के गौरव के साथ आशीर्वाद देकर अनुगृहीत किया और उचित आवभगत से उनका स्वागत किया एवं गुरु के समान पधारे हुए अभ्यागत को ‘यहां विराजिए’ यह कह कर बड़े आदर के साथ निमंत्रित किया । बगल में बैठे हुए अपने एक शिष्य से बोले—‘आयुष्मन्, चरण पखारने के लिए कमण्डल का जल लाओ ।’ राजा सोचने लगे—‘सचमुच कुलीन पुरुषों का सौजन्य बिना लोहा के बना हुआ बांधने वाला पाश है । गुण के अनुरागी आदरणीय गृहवर्मा ने ठीक ही बहुत से इनके गुणों का वर्णन किया था ।’ तब उन्होंने कहा—‘भगवन्, आपने दर्शन देकर ही मुझ पर बड़ा अनुग्रह किया । फिर जो आर्य के द्वारा मेरा यह सम्मान है, इससे वह अनुग्रह पुनरुक्त-सा लगता है । जब आपने मुझे नयन-प्रसाद से स्वीकृत किया तो ये २७ ह० च०
४१८ हर्षचरितम् सनादिदानोपचारचेष्टितम् । अतिभूमिर्भूमिरेवासनं भवादृशां पुरः संभा- षणासृताभिषेकप्रक्षालितसकलवपुषश्च मे प्रदेशवृत्तिः । पाद्यमप्यपार्थकम् । आसतां भवन्तो यथासुखम् । आसीनोऽहम्' इत्यभिधाय क्षितावेवोपविशत् । 'अलंकारो हि परमार्थतः प्रभवतां प्रश्रयातिशयः, रत्नादिकस्तु शिला- भारः' इत्याकलय्य पुनः पुनरभ्यर्थ्यमानोऽपि यदा न प्रत्यपद्यत पार्थिवो वचनं तदा स्वमेवासनं पुनरपि भेजे भदन्तः । भूपतिमुखनलिननिहित- निभृतनयनयुगलनिगडनिश्चलीकृतहृदयश्च स्थित्वा कांचित्कालकलां कलि- कालकल्मषकालुष्यमिव क्षालयन्नमलाभिर्दन्तमयूखमालाभिर्मूलफलाभ्यव- हारसंभवमुद्द्रमन्निव च परिमलसुभगं विकचकुसुमपटलपाण्डुरं लतावन- मवादीत्—'अद्यप्रभृति न केवलमयमनिन्द्यो वन्द्योऽपि प्रकाशितसत्सारः संसारः । किं नाम नालोक्यते जीवद्भिरद्भुतं येन रूपमचिन्तितोपनतमिदं दृक्पथमुपगतम् । एवंविधैरनुमीयन्ते जन्मान्तरावस्थितसुकृतानि हृदयो- भूमिमतिक्रान्तातिभूमिः । स्वर्गादिस्थानरूपः प्रदेशवृत्तिः एकदेशो वा । नयनयुगलमेव निगडो बन्धनशृङ्खला । निवृत्तिः चित्तविभ्रमः । आसनादि देने के उपचार मुझे पृथक् करने के समान प्रतीत होते हैं । आप जैसे लोगों के सामने भूमि पर बैठना ही परस्पर बातचीत के अमृताभिषेक से प्रक्षालित शरीर वाले मेरे लिए मर्यादा से बाहर है । चरणोदक भी व्यर्थ है । आप सुख-पूर्वक बिराजें, मैं तो बैठता ही हूँ ।' यह कह कर जमीन पर ही बैठ गए । 'परमार्थतः बड़े लोगों का अलंकार विनयातिशय है, रत्नादिक तो शिलाभार है।' यह सोचकर बार-बार आग्रह करने पर भी जब राजा ने आसन पर बैठना स्वीकार नहीं किया तब फिर भदन्त अपने ही आसन पर विराजमान हुए । कुछ समय तक राजा के मुख की ओर अविचल दृष्टि से देखते रहे, मानों उनका हृदय जंजीर में बँध कर निश्चल हो गया था । तब वे अपने निर्मल दांतों की किरणों से कलिकाल के पापजन्य कालुष्य को मानों प्रक्षालित करते हुए और फल एवं मूल के आहार करने से मुँह से परि- मल भरा, खिले हुए पुष्पों से उज्ज्वल लतावन का दृश्य उत्पन्न करते हुए वे बोले—'आज तक सज्जनों के उत्कर्ष को प्रकाश में लाने वाला यह संसार केवल अनिन्द्य ही नहीं, बल्कि वन्दनीय भी है । जीवित रहने वाले लोग कौन-सा आश्चर्य नहीं देख लेते ! उदा- हरण के रूप में बिना सोचे ही यह रूप हमारी आँखों का गोचर हो गया । हृदय के इन्हीं आनन्दों से लोग जन्मान्तर के पुण्यों का अनुमान करते हैं । हमारे इस तपस्या के क्लेश ने इस जन्म में भी असुलभदर्शन देवानांप्रिय आपके दर्शन के रूप में फल दे दिया ।
अष्टम उच्छ्वासः ४१६ त्सवैः । इहापि जन्मनि दत्तमेवास्माकममुना तपःक्लेशेन फलमसुलभद- र्शनं दर्शयता देवानांप्रियम् । आ तृप्तेरापीतममृतमीक्षणाभ्याम् । जातं निरुत्कण्ठं मानसं निवृत्तिसुखस्य । महद्भिः पुण्यैर्विना न विश्राम्यन्ति सज्जने त्वादृशि दृशः । सुदिवसः स त्वं यस्मिञ्जातोऽसि । सा सुजाता जननी या सकलजीवलोकजीवितजनकमजनयदायुष्मन्तम् । पुण्यवन्ति पुण्यान्यपि तानि येषामसि परिणामः । सुकृततपसस्ते परमाणवो ये तव परिगृहीतसर्वावयवाः । तत्सुभगं सौभाग्यमाश्रितोऽसि येन । भव्यः स पुरुषभावो भवत्यवस्थितो यः । यत्सत्यं मुमुक्षोरपि मे पुण्यभाजमालोक्य पुनः श्रद्धा जाता मनुजजन्मनि । नेच्छद्भिरप्यस्माभिर्दृष्टः कुसुमायुधः । कृतार्थमद्य चक्षुर्व॑नदेवतानाम् । अद्य सफलं जन्म पादपानां येषामसि गतो गोचरम् । अमृतमयस्य भवतो वचसां माधुर्यं कार्यमेव । अस्य त्वीदृशे शैशवे विनयस्योपाध्यायं ध्यायन्नपि न संभावयामि भुवि । सर्वथा शून्यं आसीदजाते दीर्घायुषि गुणग्रामः । धन्यः स भूभृद्यस्य वंशे मणिरिव मुक्तामयः संभूतोऽसि । एवंविधस्य च पुण्यवतः कथंचित्प्राप्तस्य केन अमृतमयस्येति यतोऽमृतमयस्त्वमतो भवद्वचसां माधुर्यं कार्यं प्रयोज्यं कारणसदृशेन कार्येण भवितव्यमित्युक्तेः । शून्यः निराश्रयः । वंशो वेणुरपि । मुक्तामयस्त्यक्तदोषः, तृप्ति पर्यन्त मेरी आँखों ने आज अमृत का पान किया । अब चित्त में निर्वाण के सुख की उत्कण्ठा नहीं रही । अगर बहुत अधिक पुण्य न हो तो आप जैसे सत्पुरुषों पर दृष्टिपात करने का अवसर नहीं मिलता । वह दिन बड़ा ही अच्छा होगा जिस दिन आपका जन्म हुआ होगा । वह जननी सच्चे अर्थ में जननी है, जिसने समस्त जीवलोक के प्राण भायु- ष्मान् को जन्म दिया । वे पुण्य भी सचमुच पुण्यवान् हैं, जिनके फलस्वरूप तुम हो । जो परमाणु तुम्हारे अङ्ग-अङ्ग के बनने में लगाए गए हैं, निश्चय ही उन्होंने खूब तपस्या की होगी । वह सौभाग्य बड़ा ही शोभन होगा, जिसके आश्रय में तुम हो । वह पौरुष बड़ा ही भव्य है जो तुममें रहता है । सचमुच मुझ मुमुक्षु की भी पुण्यवान् आपको देख- कर मनुष्य के जन्म में श्रद्धा होती है । इच्छा न रखते हुए भी हमने आज कामदेव को साक्षात् देख लिया । आज देवताओं की आँखें कृतार्थ हो गईं । आज वृक्षों का भी जन्म सफल हुआ, जिनके सामने तुम गए । अमृतमय आपकी बातों में माधुर्य का होना स्वाभा- विक है । इस प्रकार के शैशवकाल में भी इस विनय की शिक्षा देने वाले आचार्य को पृथिवी भर में ढूँढ़ कर प्राप्त करना मुश्किल है । दीर्घायु आपकी उत्पत्ति के पूर्व सर्वथा गुणों का समूह किसी काम का न था । वह राजा धन्य है जिसके वंश में मणि की भाँति आप
४२० हर्षचरितम् प्रियं समाचराम इति पारिप्लवं चेतो नः। सकलवनचरसार्थसाधारणस्य कन्दमूलफलस्य गिरिसरिदम्भसो वा के वयम्। अपरोपकरणीकृतस्तु कायकलिरयमस्माकम्। सर्वस्वमवशिष्टमिष्टातिथ्याय। स्वायत्ताश्च विद्यन्ते विद्याबिन्दवः कतिचित्। उपयोगं तु न प्रीतिर्विचारयति। यदि च नोप- रुणद्धि कंचित्कार्यलवमरक्षणीयाक्षरं वा कथनीयं तत्कथयतु भवान् स श्रोतुमभिलषति हृदयं सर्वमिदं नः। केन कृत्यातिभारेण भव्यो भूषित- वान्भूमिरिमेतामभ्रमणयोग्याम्? कियदवधिर्वाऽयं शून्याटवीपर्यटनक्लेशः कल्याणराशेः? कस्माच्च संतप्तरूपेष ते तनुरियमसंतापार्हा विभाव्यते?' इति। राजा तु सादरतरमब्रवीत्—'आर्य! दर्शितसंभ्रमेणानेन मधुरसवि- सरममृतमिव हृदयधृतिकरमनवरतं वर्षता वचसैव ते सर्वमनुष्ठितम्। धन्योऽस्मि यदेवमभ्यर्हितमनुपचरणीयमपि मान्यो मन्यते माम्। अस्य मौखिकरूपश्च। पारिप्लवं दोलाधिरूढमित्यर्थः। अनेकदुःखहेतुत्वात्। काय एव कलिः। आरक्षणीयाक्षरमिति। यदस्माकमुपरि विश्वासोऽस्तीत्यर्थः। उत्पन्न हुए हैं। हमारे मन में यह विकलता है कि इस प्रकार के पुण्यवान् आप किसी तरह पधारे हों तो हम आपके योग्य कौन-सा प्रिय करें? जो कन्द, मूल, फल और झरने के जल समस्त वनचरों के लिए सुलभ हैं, उनके देने के अधिकारी ही नहीं। केवल हमारा यह शरीर दूसरे के अधीन नहीं है। प्रिय अतिथि-सत्कार के लिए यह सर्वस्व हमारे पास बचा है। विद्या के कुछ कण ही अपने अधीन रह गए हैं। हमारी प्रीति उनका कोई उपयोग नहीं समझती। यदि कोई कार्य की बाधा न हो और बात कहने योग्य हो तो आप उसे कहें, हमारा हृदय वह सब कुछ सुनना चाहता है। भ्रमण के अयोग्य इस भूमि को भव्य आपने किस आवश्यक कार्य से आकर अलंकृत किया है? कल्याणराशि आप इस निर्जन अटवी में कब से पर्यटन का क्लेश उठा रहे हैं? सन्ताप के सहन न करने के योग्य यह आपकी देह किस कारण इस प्रकार कष्ट उठा रही है?' राजा ने आदर के साथ कहा—'आर्य, अमृत के समान निरन्तर मधुरस बरसाने वाले, मेरे प्रति आदर से भरे और हृदय को धैर्य देने वाले आपके इस वचन ने सब कुछ कर दिया। मैं धन्य हूँ कि मान्य आप उपचार के अयोग्य भी मुझे आदर के योग्य समझते हैं। इस महावन में घूमने का कारण मतिमान् आप सुनें। परिवार के सब इष्ट व्यक्तियों के नष्ट हो जाने के बाद मेरे जीवन का एकमात्र सहारा मेरी छोटी बहन बची थी, वह भी पति के वियोग से और शत्रु के द्वारा पकड़े जाने के भय से मारी-मारी किसी
च महावनभ्रमणपरिक्लेशस्य कारणमवधारयतु मतिमान् । मम हि विनष्ट- निखिलेष्टबन्धोर्जीवितानुबन्धस्य निबन्धनमेकैव यवीयसी स्वसावशेषा । सापि भर्तुर्विद्योगाद्धैरिपरिभवभयाद्भ्रमन्ती कथमपि विन्ध्यवनमिदम्, अशुभशबरबलबहुलम्, अगणितगजकुलकलिलम्, अपरिमितमृगपति- शरभभयम्, उद्दामहिषमुषितपथिकगमनम्, अतिनिशितशरकुशपरुषम्, अवटशतविषममविशत् । अतस्तामन्वेष्टुं वयमनिशं निशि निशि च सततमियामटवीमटामः । न चैनामासादयामः । कथयतु च गुरुरपि यदि कदाचित्कुतश्चिद्वने चरतः श्रुतिपथमुपगता तद्वार्ता' इति । अथ तच्छ्रुत्वा जातोद्वेग इव भदन्तः पुनरभ्यधात्—'धीमन् ! न खलु कश्चिदेवंरूपो वृत्तान्तोऽस्मानुपागतवान् । अभाजनं हि वयमीदृशानां प्रियाख्यानोपायनानां भवताम् ।' इत्येवं भाषमाण एव तस्मिन्नकस्मादा- गत्यापरः शमिनि वयसि वर्तमानः संभ्रान्तरूप इव पुरस्तादुपचिताञ्ज- लिर्जातकरुणः प्रक्षरितचक्षुर्भिक्षुरभाषत—'भगवन्भदन्त ! महत्करुणं वर्तते । बालैव च बलवद्व्यसनाभिभूता भूतपूर्वापि कल्याणरूपा स्त्री
अतिशयेनाल्पा यवीयसी कनिष्ठा । अयोगाद्विच्छेदविधिर्वैधुर्याद्विदं विन्ध्यवनम- निशं प्रविष्टेति पदयोजना । अनिशं सदा । अटवीमटामो गच्छामः ।
प्रकार इस विन्ध्यवन में आ गई, जहाँ दुराचारी शबर निवास करते हैं, असंख्य हाथियों से जो भरा है, जहाँ अनेक सिंहों और शरभों का डर बना रहता है, विकराल भैंसे राहियों को चलने नहीं देते, तीखे बाणों की तरह कुश-काँटे जहाँ बिछे हैं और सैकड़ों खाइयाँ हैं, इसलिए मैं उसे ढूँढ़ने के लिए रात-दिन इस जंगल का चप्पा-चप्पा छान रहा हूँ, पर अभी तक कोई पता नहीं मिला । यदि किसी वनचर से आपको कभी कोई समाचार मिला हो तो कृपया बतावें ।' यह सुनते ही भदन्त ने उद्विग्न मन से फिर कहा—'धीमन्, अभी तक ऐसा कोई वृत्तान्त मुझे नहीं मिला है। मैं इस प्रकार के प्रिय वृत्तान्त के उपहार आपको अर्पित करने के योग्य नहीं ।' जब वे यह कह ही रहे थे कि अकस्मात् एक अन्य भिक्षु जो शमभाव का उपासक था, सम्भ्रान्त जैसा दौड़ा-दौड़ा आया और हाथ जोड़कर करुणा से रोते हुए बोला—'भगवन्, भदन्त, अत्यन्त दुःख का विषय है। कोई एक अत्यन्त सुन्दरी बाल अवस्था की स्त्री विपत्ति में पड़ी हुई शोक के आवेश से अग्नि में जलने के लिए तैयार है । जब तक वह अपने प्राणों का परित्याग नहीं करती, कृपया चलकर उसे
४२२ हर्षचरितम् शोकावेशविवशा वैश्वानरं विशति। संभावयतु तामप्रोषितप्राणां भगवान्। अभ्युपपद्यता समुचितैः समाश्वासनैः। अनुपरतपूर्वं कृमिकीटप्रायमपि दुःखितं दयाराशेरार्यस्य गोचरगतम्' इति। राजा तु जातानुजाशङ्कः सोदर्यस्नेहाद्धान्तर्द्रुत इव दुःखेन दोदूयमान- हृदयः कथमपि गद्गदिकागृहीतकण्ठो विकलवाग्बाष्पायमाणदृष्टिः पप्रच्छ— 'पाराशरिन् ! कियद्दूरे सा योषिदेवंजातीया जीवेद्वा कालमेतावन्तमिति। पृष्टा वा त्वया भद्रे ! कासि, कस्यासि, कुतोऽसि, किमर्थं वनमिदमभ्युप- गतासि, विशसि च किंनिमित्तमनलम् ? इत्यादितश्च प्रभृति कात्स्न्र्येन कथ्यमानमिच्छामि श्रोतुं कथमार्यस्य गता दर्शनगोचरमाकारतो वा कीदृशी' इति। तथाभिहितस्तु भूभुजा भिक्षुराचचक्षे—'महाभाग ! श्रूयताम्—अहं हि प्रत्यूषस्येवाद्य वन्दित्वा भगवन्तमनेनैव नदीरोधसा सैकतसुकुमारेण यदृच्छया विहृतवानतिदूरम्। एकस्मिंश्च वनलतागहने गिरिनदीसमीप- भाजि भ्रमरीणामिव हिमहतकमलाकरकातराणां रुसितं सार्यमाणानाम- यदृच्छया स्वेच्छया सार्यमाणानां श्रुतिरीत्यास्थाप्यमानानां स्वराणां विशिष्टम-
समझायें। उचित आश्वासनों द्वारा अनुग्रह करें। मरने से पूर्व दुःख में पड़े हुए कीड़े-पतंग भी दयाराशि आर्य की करुणा के पात्र हैं।' राजा के मन में बहिन की शंका उत्पन्न हुई। स्नेह के कारण वे जैसे पिघल गए। दुःख से उनका हृदय भर गया और कण्ठ में घिग्घी आने लगी। वाणी में विकलता हो उठी और आँखें आँसू से भर आईं। तब उन्होंने पूछा—'हे पाराशरिन्, कितनी दूर पर वह स्त्री है और इतनी देर तक वह जीवित रह सकेगी ? तुमने क्या उससे पूछा है कि भद्रे, तुम कौन हो ? किसकी हो ? कहाँ की हो ? इस जंगल में किसलिए आ निकली हो ? और किस निमित्त से अग्नि में प्रवेश कर रही हो ? इस प्रकार आदि से लेकर पूरा वृत्तान्त आपके द्वारा सुनना चाहता हूँ। वह कैसे आपको दिखाई पड़ी ? और आकार से कैसी है ?' राजा के ऐसा पूछने पर भिक्षु ने उत्तर दिया—'महाभाग, सुनिए—मैं आज प्रातः भगवान् की वन्दना करके इस नदी के सैकत-सुकुमार तीर पर स्वेच्छा से घूमता हुआ बहुत दूर निकल गया। गिरि नदी के निकट एक लताओं के बने झुरमुट में मैंने बहुत-सी
अष्टम उच्छ्वासः ४२३ तितारतानवर्तिनीनां वीणातन्त्रीणामिव झंकारमेकतानं नारीणां रुदितम- धृतिकरमतिकरुणमाकर्णितवानस्मि । समुपजातकृपञ्च गतोऽस्मि तं प्रदेशम् । दृष्टवानस्मि च दृषदखण्डखण्डिताङ्गुलिगलल्लोहितेन च पाणि- प्रविष्टशरशलाकराल्यशूलसंकोचितचक्षुषा चाध्वनीनश्रमश्वयथुनिश्ञ्चल- चरणेन च स्थाणवव्रणव्यथितगुल्फबद्धभूर्जत्वचा च वातखुडखेदखञ्ज- जङ्घाजातज्वरेण च पांसुपाण्डुरपिच्छकेन च खर्जूरजूटजटार्जर्जरितजानुना च शतावरीविदारितोरुणा च विदारीदारिततनुदुकूलपल्लवेन चोत्कटवंश- विटपकण्टककोटिपाटितकञ्चुककर्पटेन च फललोभावलम्बिताग्रबदरी- लताजालकैरूत्कण्टकैरूल्लिखितसुकुमारकरोदरेण च कुरङ्गशृङ्गोत्खातैः कन्द- वस्थानमेकलोपे द्विलोपे वा । ताना मूर्च्छना वा । वर्णाः स्थायिमञ्चादारोह्यवरोहि- णश्चत्वारस्तदुपलक्षिताः । तन्त्र्यो वर्णतन्त्यः । एकतानमेकरूपम् , अनवरतं वा । दृष्टवानित्यादौ। अस्मि चैवंविधानामबलानां चक्रवालेन परिवृतां योषितं दृष्टवानिति संबन्धः । लोहितं रक्तम् । पाणिः पादाधोदेशः । 'स्थाणुरस्त्री ध्रुवः शङ्कुः ।' 'स्था- णोरिमं स्थाणवः । वातखुडो गतिप्रतिघातलक्षणो वातव्याधिः । पिच्छुकं केश- कलापः । शतावरी शतमूली । विदारी क्षीरशुक्ली । सरला देवदारवः । शोकेन स्त्रियों के रोने का शब्द सुना। जैसे कमलवन के तुषारपात के कारण नष्ट हो जाने से भ्रमरियाँ चीख पड़ी हों, अथवा जैसे अनेक वीणाओं को कोई जोर से झनझना रहा हो, रोने की वह आवाज अत्यन्त उद्विग्न करने वाली और अति करुण थी। मेरे हृदय में करुणा उत्पन्न हुई और मैं उस स्थान पर पहुँचा। उस प्रदेश में जाकर क्या देखता हूँ कि अनेक स्त्रियों से घिरी हुई एक स्त्री दुःख में पड़ी हुई अत्यन्त करुणा से विलाप कर रही है। रोती हुई उन स्त्रियों के पैर की उँगलियाँ पत्थर से ठेस लग जाने के कारण फूट गई थीं और उनसे रुधिर बह रहा था। एड़ी में जंगली काँटों के गड़ जाने की अपार वेदना से उनकी आँखें सिकुड़ गई थीं। मार्ग में चलते-चलते उनके पैर सूज गये थे और उनमें चलने की शक्ति न थी। लकड़ी की खूथों से टकरा जाने के कारण उनकी ठेहुनी में चोट आ गई थी और उन्होंने उसे भोजपत्र से बाँध रखा था। उनकी जाँघें भर आई थीं जिससे वे लँगड़ा रही थीं। इस कारण से उन्हें ज्वर भी हो आया था। उनके बाल धूल भर जाने से उजले हो गये थे। खजूर के नोकदार काँटों से कहीं-कहीं उनके पैर छिल गये थे। काँटेदार शतावरी के लग जाने से उनकी जाँघें फट गई थीं। विदारी नामक लताओं में उलझ कर उनके वस्त्रों की धज्जियाँ उड़ गई थीं। उनके कञ्चुक भी बाँस की छरहरी शाखाओं में लगकर फट गए थे। जंगल में भूख लग जाने से फल खाने के लिये झुकाई हुई बैर की काँटेदार डालों से उनके हाथ में छिल्छोहे पड़ गए थे। हिरन की सींगों
४२४ हर्षचरितम् मूलफलैः कदर्शितबाहुना ताम्बूलविरहविरसमुखखण्डितकोमलामलकीफलेन कुशकुसुमाहतलोहितानां श्वयथुमतामक्ष्णां लेपीकृतमनःशिलेन च कण्ट- कीलतालूनालकलेशेन केनचित्किसलयोपपादितवातपत्रकृत्येन केनचित्कद- लीदलव्यजनवाहिना केनचित्कमलिनीपलाशपुटगृहीताम्भसा केनचि- त्पाथेयीकृतमृणालपूलिकेन केनचिच्चीनांशुकदशाशिक्यनिहितनालिकेर- कोशफलशीकलितसरलतैलेन, कतिपयावशेषशोकविकलकलमूककुब्जवाम- नबधिरबर्बराविरलेनाबलानां चक्रवालेन परिवृताम्, आपत्कालेऽपि कुलोद्भू- तेनेवामुच्यमानां प्रभालेपिना लावण्येन, प्रतिबिम्बितैरासन्नवनलताकि- सलयैः सरसैर्दुःखक्षतैरिवान्तःपटलीक्रियमाणकायाम्, कठोरदर्भाङ्कुरक्षत- क्षारिणा क्षतजेनानुसरणालक्तकेनेव रक्तचरणाम्, उत्तालेनान्यतरनारी- धृतेनारविन्दिनीदलेन कृतच्छायमपि विच्छायं मुखमुद्वहन्तीम्, आका- .विकला विह्वलाः । कलमूकाः षण्ढकाः । एवमादयोऽन्तःपुररक्षिणः । बर्बरा द्यूत- हेक्षणाः । सरसैः प्रत्यग्रैः सान्द्रैश्च । क्षतानि व्रणाः । अरविन्दिनी पद्मिनी । छाया आतपप्रतिपक्षजातिः, छाया च कान्तिः । उक्तं च—'छाया सूर्यप्रिया कान्तिः प्रति- से जंगली कन्दों को खोदते-खोदते उनके हाथों में छाले पड़ गए थे । पान के न मिलने के कारण उनके मुँह फीके पड़ गए थे और वे आँवले के कोमल फलों को चिंचोर कर काम चलाती थीं । कुशों के लग जाने से उनकी आँखें लाल हो गई थीं और सूजकर उबल आई थीं । उन पर उन्होंने मैनसिल का लेप चढ़ाया था । कण्टकी नामक लताओं में उलझकर उनके बाल उखड़ गए थे । कुछ ने घाम से बचने के लिए पत्रों को चुनकर छाता बना लिया था । कुछ पंखों के स्थान पर केले के पत्तों से झल रही थीं । कुछ पानी पीने के लिए कमलिनी के पत्तों को उपयोग में लाती थीं । कुछ ने खाने के लिए मृणाल की रोटियाँ बना ली थीं। अपने चीनांशुक को फाड़कर उन्होंने छींका बना लिये थे और उन पर नारियल के कुप्पों में बड़े यत्न से देवदार का तेल रख दिया था । राजमहल के कुछ बचे हुए शोकार्त गूँगे, कुबड़े, बौने, बहरे और भौंदे वहाँ उनके साथ रह गए थे । विपत्ति का पहाड़ उस पर टूट पड़ा था, फिर भी उसके मुँह में झलने वाला लावण्य छोड़कर हटा नहीं, जैसे अपना ही वंशज हो । दर्पण के समान झलकते हुए अङ्गों में पड़ती हुई पास के लता-किसलयों की परछाईं ऐसी लग रही थी, मानों उसके शरीर के भीतर के उत्पन्न घाव हों । कुशों के तीखे अग्रभाग के गड़ जाने से उसके पैर आलते के समान बहते हुए रुधिर से लाल हो गए थे । नाल पकड़े कमलिनी के दल उठाये कोई अन्य स्त्री
अष्टम उच्छ्वासः ४२५ शमपि शून्यतयातिशयानाम्, मृण्मयीमिव निश्चेतनतया मरुन्मयीमिव निःश्वाससंपदा पावकमयीमिव संतापसंतानेन सलिलमयीमिवाश्रुप्रस्र- वणेन वियन्मयीमिव निरवलम्बनतया तडिन्मयीमिव परिप्लवतया शब्द- मयीमिव परिदेवितवाणीबाहुल्येन मुक्तमुक्तांशुकरत्नकुसुमकनकपत्राभरणां कल्पलतामिव महावने पतिताम्, परमेश्वरोत्तमाङ्गपातदुर्ललिताङ्गां गङ्गा- मिव गां गताम्, वनकुसुमधूलिधूसरितपादपल्लवाम्, प्रभातचन्द्रमूर्तिमिव लोकान्तरमभिलषन्तीम्, निजजलमोक्षकदर्थितदर्शिताधवलायतनेत्रशोभां मन्दाकिनीमृणालिनीमिव परिम्लायमानाम्, दुःसहविकिरणसंस्पर्शखेद- निमीलितां कुमुदिनीमिव दुःखेन दिवसं नयन्तीम्, दग्धदशाविसंवादितां बिम्बमनातपः' इति । शून्यतेन्द्रियरहितत्वमपि । संतापसंतानो दुःखपरम्परा, औष्ण्यप्रबन्धश्च । मुक्ताक्यमंशुकं मालवदेशजमुत्तरीयम् । मुक्ता मौक्तिकं च, अल्पा अंशवोऽशुकाश्च । महावनं विस्तीर्णारण्यम्, विपुलजलं च। परमेश्वरोत्तमाङ्गपातो राजशिरश्छेदो हरमूर्ध्नि पातश्च । इष्टानि ललितानीप्सितानि येषु तान्यङ्गानि यस्याः । दुर्ललितं च हेवाकः । गां गतामिति । वाहनाभावाद्भूमिमवतीर्णां च वन- कुसुमानि जलजातत्वात्कुमुदानि च, पादा रश्मयोऽपि । लोकान्तरं परलोकम्, मेरुद्वितीयपार्श्वं च । जलमश्रु च, नेत्रम् अङ्घिमूलं च । दग्धदशा दुरवस्थाः, प्लुष्ट- उसके सिर पर छाया कर रही थी। तब भी उसका मुँह छायारहित (कान्तिहीन) लग रहा था। वह अपनी शून्यता में आकाश से भी बढ़ रही थी। वह निश्चेतनता से मानों मृण्मयी, साँस पर साँस लेने से वायुमयी, लगातार सन्ताप से पावकमयी, आँसू के प्रवाह से जलमयी, निराधार हो जाने से आकाशमयी, चञ्चलता से विद्युन्मयी और करुण स्वर से रोते रहने के कारण शब्दमयी हो रही थी। मोतियों को पोहकर बना हुआ उत्तरीय रत्न, पुष्प और कनकपत्र के गहनों को छोड़ कर वह कल्पलता की भाँति उस महावन में गिर कर पड़ी हुई थी। वह शिव के मस्तक से गिरकर अस्तव्यस्त हुई गङ्गा के समान पृथिवी पर आ गई थी। उसके पैर जंगली फूलों के पराग से धूसरित हो गये थे। वह प्रभातकालीन चन्द्रमूर्ति की भाँति इस लोक से दूर हो जाना चाहती थी। आँसू पोंछते-पोंछते उसकी दीर्घ आँखों की शोभा मन्द पड़ गई थी और वह मन्दाकिनी की मृणालिनी की भाँति मुरझाती जा रही थी। वह सूर्य की दुःसह किरणों के स्पर्शजन्य खेद से मुकुलित होती हुई कुमुदिनी बड़े कष्ट से दिन बिता रही थी। जिसकी बत्ती जल चुकी, ऐसी प्रभातकालीन दीपशिखा के समान वह आश्रयहीन अत्यन्त क्षीण और फीकी पड़ी जा रही थी। वह उस हथिनी के समान थी जो अपने पार्श्ववर्ती
४२६ हर्षचरितम् प्रत्यूषप्रदीपशिखामिव क्षामक्षामां पाण्डुवपुषम्, पार्श्ववर्त्तिवारणाभियोगर- क्ष्यमाणां वनकरिणीमिव महाहदे निमग्नाम्, प्रविष्टां वनगहनं ध्यानं च, स्थितां तरुतले मरणे च पतितां धात्र्युत्सङ्गे महानर्थे च, दूरीकृतां भर्त्रा सुखेन च, विरेचितां श्रमरेणायुषा च, आकुलां केशकलापेन मरणोपा- येन च, विवर्णितामध्वधूलिभिरङ्गवेदनाभिश्च, दग्धां चण्डातपेन वैधव्येन च, धृतमुखीं पाणिना मौनेन च, गृहीतां प्रियसखीजनेन मन्युना च, तथा च भ्रष्टैर्बन्धुभिर्विलासैश्च, मुक्तेन श्रवणयुगलेनात्मना च, परित्यक्तै- र्भूषणैः सर्वारम्भैश्च, भग्नैर्बलयैर्मनोरथैश्च, चरणलग्नाभिः परिचारिकाभि- र्दर्भाङ्कुरसूचीभिश्च, हृदयविनिहितेन चक्षुषा प्रियेण च, दीर्घैः शोकश्वसितैः केशैश्च, क्षीणेन वपुषा पुण्येन च, पादयोः पतन्तीभिर्वृद्धाभिरश्रुधाराभिश्च, स्वल्पावशेषेण परिजनेन जीवितेन च, अलसामुन्मेषे, दक्षामश्रुमोक्षे, दीपशामानश्च । प्रत्यूषः कल्यम् । वारणा निषेधः, हस्ती च वारणः । महाहदे निमग्नामनुसरणार्थं पुण्यजलाशयस्नाताम्, विस्तीर्णसरस्यवसन्नां च । 'स्थितां कृतनिश्चयां च । विगतो धवो यस्यास्तद्भावो वैधव्यम् । धवो भर्ता । बन्धुभिरि- त्यादावित्थंभूतलक्षणे तृतीया । मुक्तेन निरलंकारेण । अलसां दक्षां चेत्यादौ हाथी के बलात्कार से त्राण पान के लिए किस महासरोवर में कूद पड़ी हो । वह घने जंगल और ध्यान दोनों में प्रवेश कर चुकी थी । तरुतल और मरण दोनों की ओर पहुँच चुकी थी । धाय की गोद और महान् अनर्थ दोनों में गिर पड़ी थी । पति और सुख दोनों ने उसे छोड़ दिया था । श्रमण और आयु दोनों ने उसका परित्याग कर दिया था । केशकलाप और मरण के उपाय दोनों से वह आकुल थी । मार्ग की धूल और अङ्गों की वेदना दोनों से उसका चेहरा फीका पड़ गया था । कड़ी धूप और वैधव्य दोनों ने उसे जला डाला था । हाथ और मौन दोनों ने उसके मुँह को थाम लिया था । उसकी प्रिय सखियों और शोक दोनों ने उसे पकड़ रखा था । उसके परिवार के बन्धु नहीं रहे और विलास भी समाप्त हो गया । उसके कान अलङ्कार से सूने हो गए थे और वह स्वयं अपने आपमें खोई-खोई थी । उसने गहने उतार दिये थे और सारे काम छोड़ बैठी थी । उसके हाथ का वलय और मनोरथ दोनों टूट गये थे । उसके चरणों में परिचारिकायें और कुशों की नुकीली सूइयाँ लिपटी हुई थीं । उसकी आँख हृदय और प्रिय दोनों में लगी हुई थीं । उसकी साँस और अलकें दोनों लम्बी थीं । शरीर और पुण्य दोनों क्षीण हो गए थे । बूढ़ी स्त्रियों और आँसू की धारायें दोनों उसके पैरों पर पड़ रही थीं । उसके परिजन और प्राण दोनों ही अब बहुत कम बच रहे थे । आँख खोलकर ताकने में
अष्टम उच्छ्वासः ४२७ संततां चिन्तासु, विच्छिन्नामाशासु, कृशां काये, स्थूलां श्वसिते, पूरितां दुःखेन, रिक्तां सत्त्वेन, अध्यासितामायासेन, शून्यां हृदयेन, निश्चलां निश्चयेन, चलितां धैर्यात्, अपि च वसतिं व्यसनानाम्, आधानमाधी- नाम्, अवस्थानमनवस्थानाम्, आधारमधृतीनाम्, आवासमवसादानाम्, आस्पद्मापदाम्, अभियोगमभाग्यानाम्, उद्वेगमुद्वेगानाम्, कारणं करु- णायाः, पारं परायत्तताया योषितम्। चिन्तितवानस्मि च चित्रमीदृशीम- प्याकृतिमुपतापाः स्पृशन्तीति। सा तु समीपगते मयि तदवस्थापि सब- हुमानमानतमौलिः प्रणतवती। अहं तु प्रबलकरुणाप्रेर्यमाणस्तामालपितु- कामः पुनः कृतवान्मनसि—कथमिव महानुभावामेनामामन्त्रये। ‘वत्से’ इत्यतिप्रणयः, ‘मातः’ इति चाटु, ‘भगिनि’ इत्यात्मसंभावना, ‘देवि’ इति परिजनालापः, ‘राजपुत्रि’ इत्यस्फुटम्, ‘उपासिके’ इति मनोरथः, ‘स्वामिनि’ इति भृत्यभावाभ्युपगमः, ‘भद्रे’ इतीतरस्त्रीसमुचितम्, ‘आयु- ष्मति’ इत्यवस्थायामप्रियम्, ‘कल्यांणिनि’ इति दशायां विरुद्धम्, ‘चन्द्र- विरोधो बोद्धव्यः। अनवस्थानां दुःखरूपक्रियाणाम्। अभियोगमुद्योगम्। कथ- मिवेत्यादि समानः प्रश्न इत्यर्थः। महानुभावां मनस्विनीम्। अतिप्रणयो महती अलसाती थी। आँसू ढलते जा रहे थे; चिन्ता उसे खाये जा रही थी। उसकी आशायें टूट गईं थीं। बहुत दुबली थी, भारी सांस ले रही थी, दुःख से भरी थी, सत्त्व से हीन थी, थोड़े में वह थक जाती थी, हृदय से शून्य थी। उसका निश्चय अचल था, उसे धैर्य नहीं रह गया था। वह दुःखों की वसति, मानसिक व्यथाओं का आश्रय, दुर्दशा का स्थान, अधीरता का आधार, अवसादों का निवासस्थान, आपदाओं का आस्पद, दुर्भाग्य का आक्रमणस्थान, उद्वेगों की जन्मभूमि, करुणा का कारण, एवं पराधीनता की सीमा थी। देखकर मैं सोचने लगा—'आश्चर्य की बात है कि सन्ताप ऐसी आकृति को भी नहीं छोड़ते। मैं जब उसके समीप गया तो उस अवस्था में भी उसने आदर के साथ झुककर प्रणाम किय। मैं प्रबल करुणा से प्रेरित होता हुआ उससे बातचीत करने की इच्छा से फिर मन में सोचने लगा—मैं किस शब्द से इस महानुभावा को संबोधित करूँ ! अगर 'वत्से' कहता हूँ तो अतिशय प्रणय हो जाता है। 'मातः' कहता हूँ तो चाटुकारिता व्यक्त होती है। 'बहन' कहता हूं तो आत्मगौरव जग पड़ता है। 'देवि' कहता हूं तो परिजनों जैसी बात होती है। 'राजपुत्रि' कहता हूँ तो क्या यह स्पष्ट है कि यह राजपुत्री है ? 'उपासिके' कहता हूँ तो अपने मन के अननुकूल बात होती है। 'स्वामिनि' कहता हूँ तो दास की भाँति अपने में लघुता आती है। 'भद्रे' कहता हूँ
४२८ हर्षचरितम् मुखि' इत्यमुनिमतम् , 'बाले' इत्यगौरवोपेतम् , 'आर्ये' इति जरारोपणम् , 'पुण्यवति' इति फलविपरीतम् , 'भवति' इति सर्वसाधारणम् । अपि च 'कासि' इत्यनभिजातम् , 'किमर्थं रोदिषि' इति दुःखकारणस्मरणकारि, “मा रोदीः' इति शोकहेतुमपनीय न शोभते, 'समाश्वसिहि' इति किमा- 'श्रित्य, 'स्वागतम्' इति यातयामम्, 'सुखमास्यते' इति मिथ्या । इत्येवं चिन्तयत्येव मयि तस्मात्त्रैणादुत्थायान्यतरा योषिदार्यरूपेव शोकविक्लवा समुपसृत्य कतिपयपलितशारं शिरो नीत्वा महीतलमतुलहृदयसंतापसूच- कैरश्रुबिन्दुभिश्चरणयुगलं दहन्ती ममातिकृपणैरक्षरैश्च हृदयमभिहितवती— 'भगवन् ! सर्वसत्त्वानुकम्पिनी प्रायः प्रव्रज्या । प्रतिपन्नदुःखक्षपणदीक्षाद- क्षाश्च भवन्ति सौगताः । करुणाकुलगृहं च भगवतः शाक्यमुनेः शासनम् । सकलजनोपकारसज्जा सज्जनता जैनी । परलोकसाधनं च धर्मो मुनीनाम् । ीतिः । अनभिजातममुचितम् । यातयामं जीर्णप्रायम् । शासनं शास्त्रम् । सज्जनता तो साधारण स्त्री के लिए उचित संबोधन हो जाता है । 'आयुष्मति' कहता हूँ तो जिस अवस्था में यह पड़ी है उसके अनुसार प्रिय बात नहीं होती । 'कल्याणिनि' कहता हूँ तो यह संबोधन इसकी दशा के विरुद्ध हो जाता है । 'चन्द्रमुखी' कहता हूँ तो मुझ भिक्षु के लिए सम्मत नहीं । 'बाले' कहता हूँ तो इसके प्रति गौरवहीनता की बात होती है । 'आर्ये' कहता हूँ तो इसको वृद्धावस्था में आरोपित करना हो जाता है । 'पुण्यवति' कहता हूँ तो क्या पुण्य का यही फल होता है ? 'भवति' कहता हूँ तो सबके लिए यह साधारण संबोधन है । और भी, 'तू कौन है' पूछना उचित नहीं लगता । 'क्यों रोती है' यह तो दुःख के कारणों की याद दिलाने वाला प्रश्न है । 'रो मत' यह प्रश्न तो शोक के कारण को बिना हटाए नहीं शोभा देता । 'धीरज धरो' यह किस बात पर कहा जाय ? 'स्वागतम्' का तो जमाना लद गया । 'क्या सुखी हो ?' यह तो सरासर झूठ हुआ । मैं ऐसा सोच ही रहा था कि उन स्त्रियों के बीच से शोक से व्याकुल एक कुलीन स्त्री मेरे निकट आ गई और अपना सिर जिसके कई बाल सफेद हो गये थे, पृथिवी पर रखकर हृदय के अतुल संताप को व्यक्त करने वाले आँसुओं से भरे चरणों को और अत्यन्त करुण अक्षरों से मेरा हृदय जलाती हुई बोली—'भगवन्, प्रव्रज्या सब जीवों पर दया करने वाली है । सौगत लोग आपत्ति में पड़े हुओं का दुःख दूर करने की दीक्षा लिये रहते हैं । भगवान् शाक्यमुनि का शासन करुणा का स्थान है । बौद्ध साधु सब लोगों के उपकार के लिए तत्पर रहते हैं । मुनियों द्वारा अभिहित धर्म उत्कृष्ट लोक में पहुँचने का साधन है । लोगों का कहना है कि दूसरों की प्राणरक्षा से बढ़कर संसार में कोई पुण्य
प्राणरक्षणाच्च न परं पुण्यजातं जगति गीयते जनेन । अनुकम्पाभूमयः प्रकृत्यैव युवतयः किं पुनर्विपद्मभिभूताः । साधुजनश्च सिद्धक्षेत्रमार्त्तवच- साम् । यत इयं नः स्वामिनी मरणेन पितुरभावेन भर्तुः प्रवासेन च भ्रातुः भ्रंशेन च शेषस्य बान्धववर्गस्यातिमृदुहृदयत्यानपत्यतया च निर- वलम्बना, परिभवेन च नीचारातिकृतेन, प्रकृतिमन्स्विनी अमुना च महाटवीपर्यटनक्लेशेन कदर्थितसौकुमार्या, दग्धदैवदत्तैरेवंविधैर्बहुभिरुप- र्युपरि व्यसनैर्विह्वलीकृतहृदया, दारुणं दुःखमपारयन्ती सोढुं निवारयन्त- मनाक्रान्तपूर्वं स्वप्नेऽप्यवगणय्य गुरुजनमनुनयन्तीरखण्डितप्रणया नर्म- स्वपि समवधीर्य प्रियसखीर्विज्ञापयन्तमशरणमनाथमश्रुव्याकुलनयनमप- रिभूतपूर्वं मनसापि परिभूय भृत्यवर्गमग्निं प्रविशति । परित्रायताम् । आर्योऽपि तावदसह्यशोकापनयनोपायोपदेशनिपुणां व्यापारयतु वाणी- मस्याम्' इति चातिकृपणं व्याहरन्तीमहुत्थाप्योद्विग्नतरः शनैरभिहित- वान्—'आर्ये ! यथा कथयसि तथा। अस्मद्गिरामगोचरोऽयमस्याः पुण्या- साधुजनसमूहः । सिद्धक्षेत्रं सिद्धायतनम् । यत इत्यादि । यत इयं नः स्वामिन्यग्निं नहीं है। स्वभाव ही से युवतियाँ अनुकम्पा के पात्र हैं। और अगर विपत्तियों से वे अभिभूत हो गईं तो कहना ही क्या ? साधु लोग तो दुखियों की वाणी के सिद्धायतन हैं। यह स्वभाव से ही मनस्विनी हमारी स्वामिनी पिता के मरण, स्वामी के विनाश, भाई के प्रवास और अन्य सब बन्धुओं के बिछुड़ जाने से और हृदय के अत्यन्त मृदु एवं पुत्र के न होने से अनाथ हुई नीच शत्रु द्वारा किए गए पराभव के कारण अग्नि में प्रवेश कर रही है। इस घोर जंगल में भटकने के क्लेश ने इसके सौकुमार्य को दूषित कर डाला है। जले दैव ने इस प्रकार बहुत से दुःख जो इस पर उड़ेल दिए हैं, उनसे यह व्याकुल हो उठी है। यह अब अपने दारुण दुख को सहने में असमर्थ हो रही है। जिन गुरुजनों की बात का स्वप्न में भी उल्लङ्घन इसने नहीं किया था, अग्निप्रवेश से निवारण करते हुए उन्हीं की बात नहीं सुन रही है। हँसी-मजाक के खेलों में भी जिनसे अपना प्रेमभाव बनाए रही, अनुनय करती हुई उन प्रिय सखियों की बात भी नहीं मान रही है। जिन परिचारकों को उसने कभी भी डांट नहीं सुनाई, अशरण और अनाथ होकर आँसू से भरे प्रार्थना करते हुए उन्हें भी फटकार देती है। इसे बचाइए। आर्य भी इसके असह्य शोक को दूर करने के उपायों का उपदेश करते हुए इसे समझाइए।' इस प्रकार अत्यन्त दीन भाव से कहती हुई उस स्त्री से दुखी मैं उठकर धीरे से बोला—'आर्ये, जो तुम कहती हो
४३० हर्षचरितम् शयायाः शोकः । शक्यते चेन्मुहूर्त्तमात्रमपि त्रातुमुपरिष्टान्न व्यर्थेयमभ्य- र्थना भविष्यति । मम हि गुरुरपर इव भगवान्सुगतः समीपगत एव । कथिते मयास्मिन्वदन्ते नियतमागमिष्यति परमदयालुः । 'दुःखान्धकार- पटलभिदुरैश्च सौगतैः सुभाषितैः स्वकीयैश्च दर्शितनिदर्शनैर्नानागमगुरु- भिर्गिरां कौशलैः कुशलशीलामेनां प्रबोधपदवीमारोपयिष्यति' इति । तच्च श्रुत्वा 'त्वरतामार्यः' इत्यभिदधाना सा पुनरपि पादयोः पतितवती । सोऽहमुपगत्य त्वरमाणो व्यतिकरमिममधृतिकरमशरणकृपणबहुयुवति- मरणमतिकरुणमत्रभवते गुरवे निवेदितवान्' इति । अथ भूपूस्तैक्ष्णवं समवधार्य तद्भाषितमश्रुमिश्रितमश्रुतेऽपि स्वसुर्नाम्नि निश्श्रीकृतमना मन्युना सर्वाकारसंवादिन्या दशयैव दूरीकृतसंदेहो दग्ध इव सोदर्यावस्थाश्रवणेन श्रवणयोः श्रमणाचार्यमुवाच- 'आर्य ! नियतं सैवेयमनार्यस्यास्य जनस्यातिकठिनहृदयस्यातिनृशंसस्य मन्दभाग्यस्य भगिनी भागधेयैरेतामवस्थां नीता निष्कारणवैरिमिर्रराकी विदीर्यमाणं मे प्रविशति तदार्योऽपि तावदस्यां वाणीं व्यापारयत्विति संबन्धः । निदर्शनं दृष्टान्तः । निम्नं संकुचच्छक्ति । सो ठीक है; किन्तु मेरे समझाने से इस पुण्य-आशय वाली का शोक कम न होगा। मुहूर्त्त भर भी तुम इसे रोक सको तो यह प्रार्थना व्यर्थ न होगी, क्योंकि दूसरे भगवान् बुद्ध के समान मेरे गुरु यहाँ से समीप ही रहते हैं। मैं इस वृत्तान्त को कहूँगा तो निश्चय ही परम दयालु वे आकर दुःखान्धकार के निवारण में समर्थ भगवान बुद्ध के अनेक सुभाषितों से और दृष्टान्तों से भरी अनेक आगमों से गौरवशालिनी अपनी वाणी से कुशलशीलवालो इसे प्रबोधित करेंगे।' यह सुनकर 'आर्य शीघ्रता करें' यह कहती हुई वह मेरे चरणों में गिर गई। सो मैंने शीघ्रता से आकर धीरज को तोड़ने वाले अनाथ, दीन, दुखिया अनेक युवतियों के मरने के इस अत्यन्त करुण समाचार को श्रीचरणों में सुना दिया।' राजा भिक्षु की आँसू से मिली हुई बात सुनते ही राज्यश्री का नाम न कहे जाने पर भी शोक से आक्रान्त होकर सब प्रकार की बातों से मेल खाने वाली उस दशा से ही तुरन्त समझ गये और अपनी बहन को इस दशा के सुनने से जैसे जल गए । तब उन्होंने श्रमणाचार्य दिवाकरमित्र से कान में कहा-'आर्य ! फटा जाता हुआ मेरा हृदय यह निवेदन कर रहा है कि अनार्य अति कठिन हृदय वाले अतिकूट मन्दभाग्य इस जन की (मेरी) वही वह बेचारी अकारण शत्रु भाग्य की मारी बहिन राज्यश्री है जो इस अवस्था
अष्टम उच्छ्वासः ४३१
हृदयमेवं निवेदयति' इत्युक्त्वा तमपि श्रमणमभ्यधात् — 'आर्य ! उत्तिष्ठ । दर्शय कासौ । यतस्व प्रभूतप्राणपरित्राणपुण्योपार्जनाय यामः, यदि कथं- चिज्जीवन्तीं संभावयामः' इति भाषमाण एवोत्तस्थौ । अथ समग्रशिष्यवर्गानुगतेनाचार्येण तुरगेभ्योऽवतीर्य समस्तेन साम- न्तलोकेन पश्चादाकृष्यमाणाश्वीयेनानुगम्यमानः पुरस्ताच्च तेन शाक्यपु- त्रीयेण प्रदिश्यमानवर्त्मा पद्धयामेव तं प्रदेशमविरलैः पदैः पिबन्निव प्रावर्तत । क्रमेण च समीपमुपगतः शुश्राव लतावानान्तरितस्य मुमूर्षोर्म- हतः स्त्रैणस्य तत्कालोचिताननेकप्रकारानालापान् — 'भगवन्धर्म ! धाव शीघ्रम् । क्कासि कुलदेवते । देवि धरणि, धीरयसि न दुःखितां दुहितरम् । क नु खलु प्रोषिता पुष्पभूतिकुटुम्बिनी लक्ष्मीः । अनाथां नाथ मुखरवश्य, विविधाधिविधुरां वधूं त्रिधवां विबोधयसि किमिति नेमाम् । भगवन्, भक्तजने संज्वरिणि सुगत सुप्तोऽसि । राजधर्म पुष्पभूतिभवनपक्षपातिन्, उदासीनीभूतोऽसि कथम् । त्वय्यपि विपद्बान्धव विन्ध्य, वन्ध्योऽय- यतस्व यत्नं कुरु । अश्वीयमश्वसमूहः । शाक्यपुत्रीयेण दिवाकरमित्रशिष्येण । अविरलैर्दीर्घैः । पदै- श्चरणक्रमैः । मुमूर्षोर्मरणोन्मुखस्य । स्त्रैणस्य स्त्रीसमूहस्यालापाञ्छुश्रावेत्यन्वयः । संज्वरिणि संतापवति । राजधर्मो बुद्धः । तक पहुँच गई है।' और उस दूसरे भिक्षु से भी कहा—'आर्य, उठो और बताओ वह कहाँ है ? प्रयत्न करो, बहुत से प्राणों की रक्षा के पुण्योपार्जन के लिए चलें, जिससे किसी प्रकार जीवित अवस्था में ही उसे प्राप्त कर सकें।' यह कहते ही उठ खड़े हुए । समस्त शिष्य वर्ग के साथ आचार्य दिवाकरमित्र हर्ष के आगे चले, और उनके पीछे समस्त सामन्त लोग घोड़ों से उतर कर पैदल उन्हें खींचते हुए चलने लगे । राजा के आगे-आगे मार्ग दिखलाता हुआ दिवाकरमित्र का शिष्य चल रहा था । इस प्रकार वे पैदल ही उस प्रदेश को अपनी आँखों से जैसे पीते हुए कदम बढ़ाते चल पड़े । कुछ देर में जब समीप पहुँच गये तो लतावन की ओट में मरने के लिए तैयार बहुत-सी स्त्रियों के उस अवसर के लिए उचित विलाप सुने—'हे भगवन् धर्म, शीघ्र दौड़ो। हे कुलदेवते, कहां हो ? हे देवी पृथिवी, अपनी दुखिया पुत्री को क्यों नहीं धीरज देती हो ! पुष्पभूति की गृहिणी लक्ष्मी कहां चली गई ? हे मुखरवंश में उत्पन्न होने वाले राजन् (गृहवर्मा), नाना प्रकार की मानसिक व्यथाओं से पीड़ित अनाथ विधवा अपनी वधू को क्यों नहीं समझाते ? हे भगवन् सुगत, क्या तुम भी इस दुःखिनी के लिए सो गए ? हे पुष्पभूति के भवन में
४३२ हर्षचरितम् ञ्जलिबन्धः । मातर्महाटवि, रटन्तीं न शृणोषीमामापत्पतिताम् । पतङ्ग, प्रसीद पाहि पतिव्रतामशरण्याम् । प्रयलरक्षित कृतघ्न चारित्रचण्डाल, न रक्षसि राजपुत्रीम् । किमवधृतं लक्षणैः । हा देवि दुहितृस्नेहमयि यशोमति, मुषितासि दग्धदैवदस्युना । देव, दुहितरि दह्यमानायां नापतसि । प्रतापशील, शिथिलीभूतमपत्यप्रेम । महाराज राज्यवर्धन, न धावसि मन्दीभूता भगिनीप्रीतिः । अहो निष्ठुरः प्रेतभावः । व्यपेहि पाप पावक स्त्रीघातनिर्घृण, ज्वलन्न लज्जसे । भ्रातर्वात, दासी तवास्मि । संवादय द्रुतं देवीदाहं देवाय दुःखितजनार्तिहराय हर्षाय । नितान्तनिःशूक शोकश्वपाक, सकामॊऽसि । दुःखदायिन्वियोगराक्षस, संतुष्टोऽसि । विजने वने कमा- क्रन्दामि, कस्मै कथयामि, कमुपयामि शरणम् , कां दिशं प्रतिपद्ये, करोमि किमभागधेया । गान्धारिके, गृहीतोऽयं लतापाशः । पिशाचि मोचनिके, मुञ्च शाखाग्रहणकलहम् । कलहंसि हंसि, किमतःपरमुत्तमाङ्गम् । मञ्ज- लिके, मुक्तगलं किमद्यापि रुद्यते । सुन्दरि, दूरीभवति सखीसार्थः । गान्धारिके मोचनिके कलहंसि इत्यादीनि सहगतसखीनां संबोधनानि । रहने वाले राजधर्म, तुम क्यों उदासीन हो गए ? हे विपत्ति के बान्धव विन्ध्य, क्या तुम्हारे प्रति यह अञ्जलि व्यर्थ जायगी ? हे माता महाटवी, विपत्ति में पड़ी रट लगाती हुई इसका विलाप क्यों नहीं सुनती हो ? हे सूर्यदेव, प्रसन्न होकर इस अशरण पतिव्रता की रक्षा करो। अरे प्रयत्नसंरक्षित, कृतघ्न, चारित्रचण्डाल, राजपुत्री की क्यों नहीं रक्षा करता ? शुभ लक्षणों ने रहकर क्या किया ? हा पुत्री के प्रति स्नेहमयी देवी यशोमती, आज लुटेरे दैव ने तुम्हें लूट लिया । देव प्रतापशील, पुत्री आग में जल रही है और तुम नहीं आते ? महाराज राज्यवर्धन, आते नहीं, क्या बहिन के प्रति तुम्हारा प्रेम कम हो गया है ? आश्चर्य है ! मर जाने वाला निष्ठुर हो जाता है। अरे पापी, स्त्री को मार डालने में निर्घृण अग्नि, क्या जलते हुए तुझे लज्जा नहीं आती ? हे भाई वायु, मैं तेरी दासी हूँ, जल्दी जाकर देवी के जलने का यह संवाद दुखी जन के दुःख दूर करने वाले देव हर्ष को कह दे। अत्यन्त निर्दय चण्डाल शोक, तेरी मनोकामना पूरी हुई । दुःख देने वाले राक्षस वियोग, अब तू संतुष्ट है। इस निर्जन वन में किसे पुकारूँ ? किस ओर जाऊँ और अभागिन मैं क्या करूँ ? हे सखी गान्धारिका, फाँसरी के लिए मैंने लता की यह डोर उठा ली । अरी पिशाचिन मोचनिका, झूल जाने के लिए डाल पकड़ लेने दे, झगड़ मत । अरी कलहंसी, क्यों सिर फोड़ रही है ? मरना तो है ही। अरी मञ्जलिका, आज भी क्यों गला फाड़ कर रोती है ? अरी सुन्दरी अब सखियों अलग
अष्टम उच्छ्वासः ४३१
स्थास्यसि कथमिवाशिवे शवशिबिरे शबरिके । सुतनु, तनूनपाति पति- ष्यसि त्वमपि । मृणालकोमले मालावति, म्लानासि । मातर्मातङ्गिके, अङ्गीकृतस्त्वयापि मृत्युः । वत्से वत्सिके, वत्स्यसि कथमनभिप्रेते प्रेतनगरे । नागरिके, गरिमाणमागतास्यनया स्वामिभक्त्या । विराजिके, विराजि- तासि राजपुत्रीविपदि जीवितव्ययव्यवसायेन । भृगुपतनाभ्युद्यमभागा- भिज्ञे भृङ्गारधारिणि, धन्यासि । केतकि, कुतः पुनरीदृशी स्वप्नेऽपि सुस्वा- मिनी । मेनके, जन्मनि जन्मनि देवीदास्यमेव ददातु देवो देहं दहन्दहनः । विजये, वीजय कृशानुम् । सानुमति, नमतीन्दीवरिका दिवं गन्तुकामा । कामदासि, देहि दहनप्रदक्षिणावकाशम् । विचारिके, विरचय वह्निम् । विकिर किरातिके, कुसुमप्रकरम् । कुररिके, कुरु कुरुबककोरकाचितां चिताम् । चामरं चामरग्राहिणि, गृहाण । पुनरपि कष्टे मर्षयितव्यानि नर्मदे, नर्मनिर्मितानि निर्मर्यादहसितानि । भद्रे सुभद्रे, भद्रमस्तु ते परलोकगमनम् । अग्रामीणगुणानुरागिणि ग्रामेयिके, गच्छ सुगतिम् । तनूनपाति वह्नौ । वत्स्यस्यासिष्यसि । भृगुः प्रपातः । उक्तं च—‘प्रपातस्त्वतटो भृगुः’ इत्यमरः । निर्माणं विधानम् । अर्थात्संसारस्य । हो रही हैं । अरी शबरिका, मुर्दों की इस अमङ्गल छावनी में कैसे तू ठहरेगी ? अरी सुन्दर अङ्गों वाली तू भी आग में गिरेगी । अरी मृणाल की भाँति कोमल मालावती, तू मुरझा गई है । हे माता मातङ्गिका, तूने भी मृत्यु को स्वीकार कर लिया ? अरी वत्से वत्सिका, अनभिप्रेत प्रेतनगर में तू कैसे रहेगी ? अरी नागरिके, स्वामी के प्रति इस भक्ति से तुझमें गौरव आ गया है । अरी विराजिका, राजपुत्री की विपत्ति में अपने प्राण त्यागने के इस प्रयत्न से तू सुशोभित है । अरी भृङ्गार ( विशेष प्रकार का जलपात्र ) धारण करने वाली, पहाड़ की चोटी से गिरने के इस उद्योग से तू धन्य है । अरी केतकी, स्वप्न में भी ऐसी कामिनी कहाँ मिलेगी ? अरी मेनका, अग्निदेव शरीर को जलाकर जन्म-जन्म में देवी की ही दासी बनने का सौभाग्य दे । अरी विजया, आग जगा दे । अरी सानुमती, स्वर्ग जाने के लिए तैयार इन्दीवरिका तुझे प्रणाम कर रही है । अरी कामदासी, अग्नि की परिक्रमा करने दे । अरी विचारिका, आग लगाने की तैयारी कर । अरी किरातिका, फूल बिखेर । अरी कुररिका, कुरुबक की कोढ़ियों से चिता को सजा । अरी चामरग्राहिणी, चँवर उठा। अरी नर्मदा, परिहास की हँसियों को भूल जाना। भद्रे सुभद्रा, तेरा परलोकगमन मंगलमय हो । अरी ग्रामीण गुणों में अनुराग करने वाली ग्रामेयिका, तेरी सद्गति हो । अरी वसन्तिका, फुर्सत दे । हे देवी, छत्रधारी २८ ह० च०
४१४ हर्षचरितम् बसन्तिके, अन्तरं प्रयच्छ । आपृच्छते छत्रधारी देवि, देहि दृष्टिम् । इष्टा तव जहाति जीवितं विजयसेना । सेयं मुक्तिका मुक्तकण्ठमारटति निकटे नाटकसूत्रधारी । पादयोः पतति ते ताम्बूलवाहिनी बहुमता राजपुत्रि, पत्रलता, कलिङ्गसेने, अयं पश्चिमः परिष्वङ्गः । पीडय निर्भरमुरसा माम् । असवः प्रवसन्ति वसन्तसेने । मञ्जुलिके, मार्जयसि कतिकृत्वः सुदुःसह- दुःखसहस्रास्रदिग्धं चक्षुरिदं रोदिषि कियदालिष्य च माम् । निर्माणमी- दृशं प्रायशो यशोधने । धीरयस्यद्यापि किं मां माधविके । केयमवस्था संस्थापनानाम् । गतः कालः कालिन्दि, सखीजनानुनयाञ्जलीनाम् । उन्म- त्तिके मत्तपालिके, कृताः पृष्ठतः प्रणयिनीप्रणिपातानुरोधाः । शिथिलय चकोरवति, चरणग्रहणं प्रहिणि । कमलिनि, किमनेन पुनःपुनर्देवोपालम्भेन । न प्राप्तं चिरं सखीजनसंगमसुखम् । आर्ये महत्तरिके तरङ्गसेने, नम- स्कारः । सखि सौदामिनि, दृष्टासि । समुपनय हव्यवाहनार्चनकुसुमानि कुमुदिके । देहि चितारोहणाय रोहिणि, हस्तावलम्बनम् । अम्ब, धात्रि, धीरा भव । भवन्त्येवंविधा एव कर्मणां विपाकाः पापकारिणीनाम् । आर्य- संस्थापनानां सांत्वनानाम् । ग्रहोऽभिनिवेशः । विदा के रही है, दृष्टि डालिए । आपकी प्रिय सखी विजयसेना प्राण त्याग कर रही है । नाटक की सूत्रधारी यह मुक्तिका आपके निकट गला फाड़कर चिल्ला रही है। हे राजपुत्री, आपकी अच्छी ताम्बूलवाहिनी पत्रलता चरणों पर गिर रही है । अरी कलिङ्गसेना, यह अन्तिम आलिङ्गन है। कसकर मुझे छाती से दबा। अरी बसन्तसेने, अब प्राण जा रहे हैं। अरी मंजुलिका, दुःसह दुःखों के उत्पन्न आँसू से नेत्र को कितनी बार साफ करेगी और कितनी बार मुझे अँकवार कर रोयेगी ? अरी यशोधना, विधि का यही विधान है । अरी माधविका, आज भी क्यों मुझे धीरज बँधाती है ? सान्त्वना देने की अवस्था अब कहाँ ? अरी कालिन्दी, सखियों के अनुनय की अञ्जलि का अवसर चला गया । अरी पागल मत्तपालिका, प्रिय सखियों के प्रणिपात के अनुरोध पीछे कर दिए गए । अरी ढीठ चकोरवती, मेरे पैर छोड़ । अरी कमलिनी, बार-बार दैव को कोसने से क्या काम ? सखियों का संगमसुख देर तक प्राप्त नहीं हो सका । आर्या, महत्तरिका, तरंगसेना, यह मेरा नमस्कार है । सखी सौदामिनी, तुझे देख लिया । अरी कुमुदिका, अग्निदेव की पूजा के फूल ला। अरी रोहिणी, चिता पर चढ़ने के लिए हाथ का सहारा दे । अम्ब धात्री, धीरज धरो। पापिनियों के कर्मों के विपाक ऐसे ही होते हैं । आर्यचरणों के लिए
चरणानामयमञ्जलिः । परः परलोकप्रयाणप्रणामोऽयं मातः । मरणसमये कस्माल्लवलिके, हलहलो बलीयानानन्दमयो हृदयस्य मे । हृष्यन्त्युच्चै- रोमाञ्चमुञ्चि किमङ्गीकृत्याङ्गानि । वामलिके, बामेन मे स्फुरितमक्ष्णा । वृथा विरससि वयस्य वायस, वृत्ते क्षीरिणि क्षयो क्षयो क्षीणपुण्यायाः पुरः। हरिणि, हेषितमिव हयानामुत्तरतः । कस्येदमातपत्रमुच्चमत्र पादपान्तरेण प्रभावति, विभाव्यते । कुरङ्गिके, केन सुगृहीतनाम्रो नाम गृहीतममृत- मयमार्थस्य । देवि, दिष्ट्या वर्धसे देवस्य हर्षस्यागमनमहोत्सवेन ।' इत्येतच्च श्रुत्वा सत्वरमुपससर्प । ददर्श च मुह्यन्तीमग्निप्रवेशायोद्यतां राजा राज्यश्रियम् । आललम्बे च मूर्च्छामीलितलोचनाया ललाटं हस्तेन तस्याः ससंभ्रमम् । अथ तेन भ्रातुः प्रेयसः प्रकोष्ठबद्धानामोषधीनां रसविरासमिव प्रत्यु- जीवनक्षमं क्षरता वमतेव पारिहार्यमणीनामचिन्त्यं प्रभावममृतमिव नख- चन्द्ररश्मिभिरुद्विरता बभ्रतेव चन्द्रोदयच्युतशिशिरशीकरं चन्द्रकान्तचूडा- मणि मूर्धनि मृणालमयाङ्गुलिनेवातिशीतलेन निर्वापयता दह्यमानं हृदयं हलहलक उत्कण्ठा । एवमादिना निमित्तेन हर्षागमनं सूच्यते । अथंत्यादौ—भ्रातुर्हस्तसंस्पर्शेन राज्यश्रीः सहसैव समुन्मिमीलेति संबन्धः । यह अञ्जलि है । हे माता, परलोक जाने का यह अन्तिम प्रणाम है । अरी लवलिका, मरने के समय मेरे हृदय में यह आनन्द से भरी उत्कण्ठा क्यों उत्पन्न हो रही है ? क्या सोचकर मेरे रोमांचित अंग प्रसन्न हो रहे हैं ? अरी वामनिका, मेरी बाईं आँख फड़क रही है । मित्र वायस, क्षीणपुण्य मेरे सामने दुधारे वृक्ष पर बैठ कर व्यर्थ काँव-काँव मचा रहे हो । अरी हरिणी, उत्तर की ओर घोड़ों की हिनहिनाहट सी सुन पड़ रही है । अरी प्रभावती, किसका यह ऊँचा छत्र वृक्षों की ओट में झलक रहा है ? अरी कुरङ्गिका, सुगृहीतनाम आर्य का किसने अमृतमय नाम लिया ? हे देवी, देव हर्ष के इस आगमन- महोत्सव से तुम्हारी भाग्यवृद्धि हो।' यह सुनकर हर्ष पास पहुँच गए और मूर्च्छित-सी अग्निप्रवेश के लिए तैयार राज्यश्री को देखा । झट दौड़कर मूर्च्छा से बन्द आँखों वाली उस राज्यश्री के ललाट को हाथ से ओढ़ लिया । इस अवस्था में बड़े भाई के आह्लादित करने वाले हाथ के स्पर्श से राज्यश्री की आँखें सहसा खुल गयीं । हर्ष के हाथ का वह स्पर्श ऐसा लगा मानों पुनः जीवित कर देने में समर्थ प्रकोष्ठ में बँधी हुई औषधियों का रस उड़ेल रहा हो । या मानों नख की ज्योत्स्नाओं के रूप में कङ्कण की मणियों का अमृत के समान अचिन्त्य प्रभाव उगल रहा हो।
४३६ हर्षचरितम् .
प्रत्यानयतेव कुतोऽपि जीवितमाह्लादकेन हस्तसंस्पर्शेन सहसैव समुन्मि- मील राज्यश्रीः । तथा चासंभावितागमनस्याचिन्तितदर्शनस्य सहसा प्राप्तस्य भ्रातुः स्वप्नदृष्टदर्शनस्येव कण्ठे समाश्लिष्य तत्कालाविर्भावनि- र्भरेणाभिभूतसर्वात्मना दुःखसंभारेण निर्दयं नदीमुखप्रणालाभ्यामिव मुक्ताभ्यां स्थूलप्रवाहमुत्सृजन्ती बाष्पवारि विलोचनाभ्याम् 'हा तात, हा अम्ब, हा सख्यः' इति व्याहरन्ती, मुहुर्मुहुरुच्चैस्तरां च समुद्भूतभगिनीस्ने- हसद्भावभारभावितमन्युना मुक्तकण्ठमतिचिरं विक्रुश्य 'वत्से, स्थिरा भव त्वम्' इति भ्रात्रा करस्थगितमुखी समाश्वास्यमानापि, 'कल्याणि, कुरु वचनमग्रजस्य गुरोः' इत्याचार्येण याच्यमानापि, 'देवि, न पश्यसि देव- स्यावस्थाम् । अलमतिरुदितेन' इति राजलोकेनाभ्यर्थ्यमानापि, 'स्वामिनि, भ्रातरमवेक्षस्व' इति परिजनेन विज्ञाप्यमानापि, 'दुहितर्, विश्रम्य पुनरा- रटितव्यम्' इति निवार्यमाणापि बान्धववृद्धाभिः, 'प्रियसखि, कियद्रोदिषि, तूष्णीमास्स्व । दृढं दूयते देव' इति सखीभिरनुनीयमानापि, चिरं संभा- वितानेकदुःसहदुःखनिबर्हणबाष्पोत्पीडपीड्यमानकण्ठभागा, प्रभूत- परिहार्य कटकम् । तथा चेत्यादौ साकरोदिति संबन्धः । दुःखनिवहस्य निर्वहणं
या मानों उदित होते हुए चन्द्र की ठंडी किरणें जिसमें पड़ गई हों ऐसी चन्द्रकान्त की चूड़ामणि को मस्तक में बाँध रहा हो । या प्राणों को कहीं से लौटा रहा हो । भाई हर्ष के आगमन की पहले से कोई सम्भावना न थी और उनके दर्शन की बात सोची भी न थी कि वे आ गए, मानों स्वप्न में दिखाई पड़ रहे हों । राज्यश्री उनके कण्ठ में जोर से लिपटकर तत्काल प्रकट हुए सबको अभिभूत कर देनेवाले अपने दुःखभार से नदी की जल निकलने वाली नाली की तरह आँसू के स्थूल प्रवाह को अपने नेत्रों से बहाती हुई विलाप करने लगी- 'हा पिता, हा माता, हा सखियाँ !' बार-बार बहिन के स्नेह से शोक उत्पन्न हो जाने के कारण हर्ष भी देर तक मुक्तकंठ से रोते रहे और कहा—'अब धीरज धरो, अपने को सम्हालो ।' इस प्रकार भाई ने हाथ से मुँह ढँकी हुई उसे सान्त्वना दी । आचार्य ने याचना की—'कल्याणि, बड़े भाई की बात मानो ।' राजाओं ने अभ्यर्थना की—'देवी, देव की अवस्था को नहीं देख रही हो ? अत्यन्त रोना व्यर्थ है ।' परिजनों ने निवेदन किया—'स्वामिनी, भाई को देखो ।' सगी बुढाओं ने मना करते हुए कहा— 'पुत्री, विश्राम करके फिर रो लेना ।' सखियों ने अनुनय किया—'कितना रोओगी, चुप हो जाओ, देव को कष्ट हो रहा है ।' फिर भी बहुत दिनों के अनुभूत दुःसह दुःख के कारण