हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३२ हर्षचरितम् ञ्जलिबन्धः । मातर्महाटवि, रटन्तीं न शृणोषीमामापत्पतिताम् । पतङ्ग, प्रसीद पाहि पतिव्रतामशरण्याम् । प्रयलरक्षित कृतघ्न चारित्रचण्डाल, न रक्षसि राजपुत्रीम् । किमवधृतं लक्षणैः । हा देवि दुहितृस्नेहमयि यशोमति, मुषितासि दग्धदैवदस्युना । देव, दुहितरि दह्यमानायां नापतसि । प्रतापशील, शिथिलीभूतमपत्यप्रेम । महाराज राज्यवर्धन, न धावसि मन्दीभूता भगिनीप्रीतिः । अहो निष्ठुरः प्रेतभावः । व्यपेहि पाप पावक स्त्रीघातनिर्घृण, ज्वलन्न लज्जसे । भ्रातर्वात, दासी तवास्मि । संवादय द्रुतं देवीदाहं देवाय दुःखितजनार्तिहराय हर्षाय । नितान्तनिःशूक शोकश्वपाक, सकामॊऽसि । दुःखदायिन्वियोगराक्षस, संतुष्टोऽसि । विजने वने कमा- क्रन्दामि, कस्मै कथयामि, कमुपयामि शरणम् , कां दिशं प्रतिपद्ये, करोमि किमभागधेया । गान्धारिके, गृहीतोऽयं लतापाशः । पिशाचि मोचनिके, मुञ्च शाखाग्रहणकलहम् । कलहंसि हंसि, किमतःपरमुत्तमाङ्गम् । मञ्ज- लिके, मुक्तगलं किमद्यापि रुद्यते । सुन्दरि, दूरीभवति सखीसार्थः । गान्धारिके मोचनिके कलहंसि इत्यादीनि सहगतसखीनां संबोधनानि । रहने वाले राजधर्म, तुम क्यों उदासीन हो गए ? हे विपत्ति के बान्धव विन्ध्य, क्या तुम्हारे प्रति यह अञ्जलि व्यर्थ जायगी ? हे माता महाटवी, विपत्ति में पड़ी रट लगाती हुई इसका विलाप क्यों नहीं सुनती हो ? हे सूर्यदेव, प्रसन्न होकर इस अशरण पतिव्रता की रक्षा करो। अरे प्रयत्नसंरक्षित, कृतघ्न, चारित्रचण्डाल, राजपुत्री की क्यों नहीं रक्षा करता ? शुभ लक्षणों ने रहकर क्या किया ? हा पुत्री के प्रति स्नेहमयी देवी यशोमती, आज लुटेरे दैव ने तुम्हें लूट लिया । देव प्रतापशील, पुत्री आग में जल रही है और तुम नहीं आते ? महाराज राज्यवर्धन, आते नहीं, क्या बहिन के प्रति तुम्हारा प्रेम कम हो गया है ? आश्चर्य है ! मर जाने वाला निष्ठुर हो जाता है। अरे पापी, स्त्री को मार डालने में निर्घृण अग्नि, क्या जलते हुए तुझे लज्जा नहीं आती ? हे भाई वायु, मैं तेरी दासी हूँ, जल्दी जाकर देवी के जलने का यह संवाद दुखी जन के दुःख दूर करने वाले देव हर्ष को कह दे। अत्यन्त निर्दय चण्डाल शोक, तेरी मनोकामना पूरी हुई । दुःख देने वाले राक्षस वियोग, अब तू संतुष्ट है। इस निर्जन वन में किसे पुकारूँ ? किस ओर जाऊँ और अभागिन मैं क्या करूँ ? हे सखी गान्धारिका, फाँसरी के लिए मैंने लता की यह डोर उठा ली । अरी पिशाचिन मोचनिका, झूल जाने के लिए डाल पकड़ लेने दे, झगड़ मत । अरी कलहंसी, क्यों सिर फोड़ रही है ? मरना तो है ही। अरी मञ्जलिका, आज भी क्यों गला फाड़ कर रोती है ? अरी सुन्दरी अब सखियों अलग