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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

४३२ हर्षचरितम् ञ्जलिबन्धः । मातर्महाटवि, रटन्तीं न शृणोषीमामापत्पतिताम् । पतङ्ग, प्रसीद पाहि पतिव्रतामशरण्याम् । प्रयलरक्षित कृतघ्न चारित्रचण्डाल, न रक्षसि राजपुत्रीम् । किमवधृतं लक्षणैः । हा देवि दुहितृस्नेहमयि यशोमति, मुषितासि दग्धदैवदस्युना । देव, दुहितरि दह्यमानायां नापतसि । प्रतापशील, शिथिलीभूतमपत्यप्रेम । महाराज राज्यवर्धन, न धावसि मन्दीभूता भगिनीप्रीतिः । अहो निष्ठुरः प्रेतभावः । व्यपेहि पाप पावक स्त्रीघातनिर्घृण, ज्वलन्न लज्जसे । भ्रातर्वात, दासी तवास्मि । संवादय द्रुतं देवीदाहं देवाय दुःखितजनार्तिहराय हर्षाय । नितान्तनिःशूक शोकश्वपाक, सकामॊऽसि । दुःखदायिन्वियोगराक्षस, संतुष्टोऽसि । विजने वने कमा- क्रन्दामि, कस्मै कथयामि, कमुपयामि शरणम् , कां दिशं प्रतिपद्ये, करोमि किमभागधेया । गान्धारिके, गृहीतोऽयं लतापाशः । पिशाचि मोचनिके, मुञ्च शाखाग्रहणकलहम् । कलहंसि हंसि, किमतःपरमुत्तमाङ्गम् । मञ्ज- लिके, मुक्तगलं किमद्यापि रुद्यते । सुन्दरि, दूरीभवति सखीसार्थः । गान्धारिके मोचनिके कलहंसि इत्यादीनि सहगतसखीनां संबोधनानि । रहने वाले राजधर्म, तुम क्यों उदासीन हो गए ? हे विपत्ति के बान्धव विन्ध्य, क्या तुम्हारे प्रति यह अञ्जलि व्यर्थ जायगी ? हे माता महाटवी, विपत्ति में पड़ी रट लगाती हुई इसका विलाप क्यों नहीं सुनती हो ? हे सूर्यदेव, प्रसन्न होकर इस अशरण पतिव्रता की रक्षा करो। अरे प्रयत्नसंरक्षित, कृतघ्न, चारित्रचण्डाल, राजपुत्री की क्यों नहीं रक्षा करता ? शुभ लक्षणों ने रहकर क्या किया ? हा पुत्री के प्रति स्नेहमयी देवी यशोमती, आज लुटेरे दैव ने तुम्हें लूट लिया । देव प्रतापशील, पुत्री आग में जल रही है और तुम नहीं आते ? महाराज राज्यवर्धन, आते नहीं, क्या बहिन के प्रति तुम्हारा प्रेम कम हो गया है ? आश्चर्य है ! मर जाने वाला निष्ठुर हो जाता है। अरे पापी, स्त्री को मार डालने में निर्घृण अग्नि, क्या जलते हुए तुझे लज्जा नहीं आती ? हे भाई वायु, मैं तेरी दासी हूँ, जल्दी जाकर देवी के जलने का यह संवाद दुखी जन के दुःख दूर करने वाले देव हर्ष को कह दे। अत्यन्त निर्दय चण्डाल शोक, तेरी मनोकामना पूरी हुई । दुःख देने वाले राक्षस वियोग, अब तू संतुष्ट है। इस निर्जन वन में किसे पुकारूँ ? किस ओर जाऊँ और अभागिन मैं क्या करूँ ? हे सखी गान्धारिका, फाँसरी के लिए मैंने लता की यह डोर उठा ली । अरी पिशाचिन मोचनिका, झूल जाने के लिए डाल पकड़ लेने दे, झगड़ मत । अरी कलहंसी, क्यों सिर फोड़ रही है ? मरना तो है ही। अरी मञ्जलिका, आज भी क्यों गला फाड़ कर रोती है ? अरी सुन्दरी अब सखियों अलग

अष्टम उच्छ्वासः ४३१

स्थास्यसि कथमिवाशिवे शवशिबिरे शबरिके । सुतनु, तनूनपाति पति- ष्यसि त्वमपि । मृणालकोमले मालावति, म्लानासि । मातर्मातङ्गिके, अङ्गीकृतस्त्वयापि मृत्युः । वत्से वत्सिके, वत्स्यसि कथमनभिप्रेते प्रेतनगरे । नागरिके, गरिमाणमागतास्यनया स्वामिभक्त्या । विराजिके, विराजि- तासि राजपुत्रीविपदि जीवितव्ययव्यवसायेन । भृगुपतनाभ्युद्यमभागा- भिज्ञे भृङ्गारधारिणि, धन्यासि । केतकि, कुतः पुनरीदृशी स्वप्नेऽपि सुस्वा- मिनी । मेनके, जन्मनि जन्मनि देवीदास्यमेव ददातु देवो देहं दहन्दहनः । विजये, वीजय कृशानुम् । सानुमति, नमतीन्दीवरिका दिवं गन्तुकामा । कामदासि, देहि दहनप्रदक्षिणावकाशम् । विचारिके, विरचय वह्निम् । विकिर किरातिके, कुसुमप्रकरम् । कुररिके, कुरु कुरुबककोरकाचितां चिताम् । चामरं चामरग्राहिणि, गृहाण । पुनरपि कष्टे मर्षयितव्यानि नर्मदे, नर्मनिर्मितानि निर्मर्यादहसितानि । भद्रे सुभद्रे, भद्रमस्तु ते परलोकगमनम् । अग्रामीणगुणानुरागिणि ग्रामेयिके, गच्छ सुगतिम् । तनूनपाति वह्नौ । वत्स्यस्यासिष्यसि । भृगुः प्रपातः । उक्तं च—‘प्रपातस्त्वतटो भृगुः’ इत्यमरः । निर्माणं विधानम् । अर्थात्संसारस्य । हो रही हैं । अरी शबरिका, मुर्दों की इस अमङ्गल छावनी में कैसे तू ठहरेगी ? अरी सुन्दर अङ्गों वाली तू भी आग में गिरेगी । अरी मृणाल की भाँति कोमल मालावती, तू मुरझा गई है । हे माता मातङ्गिका, तूने भी मृत्यु को स्वीकार कर लिया ? अरी वत्से वत्सिका, अनभिप्रेत प्रेतनगर में तू कैसे रहेगी ? अरी नागरिके, स्वामी के प्रति इस भक्ति से तुझमें गौरव आ गया है । अरी विराजिका, राजपुत्री की विपत्ति में अपने प्राण त्यागने के इस प्रयत्न से तू सुशोभित है । अरी भृङ्गार ( विशेष प्रकार का जलपात्र ) धारण करने वाली, पहाड़ की चोटी से गिरने के इस उद्योग से तू धन्य है । अरी केतकी, स्वप्न में भी ऐसी कामिनी कहाँ मिलेगी ? अरी मेनका, अग्निदेव शरीर को जलाकर जन्म-जन्म में देवी की ही दासी बनने का सौभाग्य दे । अरी विजया, आग जगा दे । अरी सानुमती, स्वर्ग जाने के लिए तैयार इन्दीवरिका तुझे प्रणाम कर रही है । अरी कामदासी, अग्नि की परिक्रमा करने दे । अरी विचारिका, आग लगाने की तैयारी कर । अरी किरातिका, फूल बिखेर । अरी कुररिका, कुरुबक की कोढ़ियों से चिता को सजा । अरी चामरग्राहिणी, चँवर उठा। अरी नर्मदा, परिहास की हँसियों को भूल जाना। भद्रे सुभद्रा, तेरा परलोकगमन मंगलमय हो । अरी ग्रामीण गुणों में अनुराग करने वाली ग्रामेयिका, तेरी सद्गति हो । अरी वसन्तिका, फुर्सत दे । हे देवी, छत्रधारी २८ ह० च०

४१४ हर्षचरितम् बसन्तिके, अन्तरं प्रयच्छ । आपृच्छते छत्रधारी देवि, देहि दृष्टिम् । इष्टा तव जहाति जीवितं विजयसेना । सेयं मुक्तिका मुक्तकण्ठमारटति निकटे नाटकसूत्रधारी । पादयोः पतति ते ताम्बूलवाहिनी बहुमता राजपुत्रि, पत्रलता, कलिङ्गसेने, अयं पश्चिमः परिष्वङ्गः । पीडय निर्भरमुरसा माम् । असवः प्रवसन्ति वसन्तसेने । मञ्जुलिके, मार्जयसि कतिकृत्वः सुदुःसह- दुःखसहस्रास्रदिग्धं चक्षुरिदं रोदिषि कियदालिष्य च माम् । निर्माणमी- दृशं प्रायशो यशोधने । धीरयस्यद्यापि किं मां माधविके । केयमवस्था संस्थापनानाम् । गतः कालः कालिन्दि, सखीजनानुनयाञ्जलीनाम् । उन्म- त्तिके मत्तपालिके, कृताः पृष्ठतः प्रणयिनीप्रणिपातानुरोधाः । शिथिलय चकोरवति, चरणग्रहणं प्रहिणि । कमलिनि, किमनेन पुनःपुनर्देवोपालम्भेन । न प्राप्तं चिरं सखीजनसंगमसुखम् । आर्ये महत्तरिके तरङ्गसेने, नम- स्कारः । सखि सौदामिनि, दृष्टासि । समुपनय हव्यवाहनार्चनकुसुमानि कुमुदिके । देहि चितारोहणाय रोहिणि, हस्तावलम्बनम् । अम्ब, धात्रि, धीरा भव । भवन्त्येवंविधा एव कर्मणां विपाकाः पापकारिणीनाम् । आर्य- संस्थापनानां सांत्वनानाम् । ग्रहोऽभिनिवेशः । विदा के रही है, दृष्टि डालिए । आपकी प्रिय सखी विजयसेना प्राण त्याग कर रही है । नाटक की सूत्रधारी यह मुक्तिका आपके निकट गला फाड़कर चिल्ला रही है। हे राजपुत्री, आपकी अच्छी ताम्बूलवाहिनी पत्रलता चरणों पर गिर रही है । अरी कलिङ्गसेना, यह अन्तिम आलिङ्गन है। कसकर मुझे छाती से दबा। अरी बसन्तसेने, अब प्राण जा रहे हैं। अरी मंजुलिका, दुःसह दुःखों के उत्पन्न आँसू से नेत्र को कितनी बार साफ करेगी और कितनी बार मुझे अँकवार कर रोयेगी ? अरी यशोधना, विधि का यही विधान है । अरी माधविका, आज भी क्यों मुझे धीरज बँधाती है ? सान्त्वना देने की अवस्था अब कहाँ ? अरी कालिन्दी, सखियों के अनुनय की अञ्जलि का अवसर चला गया । अरी पागल मत्तपालिका, प्रिय सखियों के प्रणिपात के अनुरोध पीछे कर दिए गए । अरी ढीठ चकोरवती, मेरे पैर छोड़ । अरी कमलिनी, बार-बार दैव को कोसने से क्या काम ? सखियों का संगमसुख देर तक प्राप्त नहीं हो सका । आर्या, महत्तरिका, तरंगसेना, यह मेरा नमस्कार है । सखी सौदामिनी, तुझे देख लिया । अरी कुमुदिका, अग्निदेव की पूजा के फूल ला। अरी रोहिणी, चिता पर चढ़ने के लिए हाथ का सहारा दे । अम्ब धात्री, धीरज धरो। पापिनियों के कर्मों के विपाक ऐसे ही होते हैं । आर्यचरणों के लिए

चरणानामयमञ्जलिः । परः परलोकप्रयाणप्रणामोऽयं मातः । मरणसमये कस्माल्लवलिके, हलहलो बलीयानानन्दमयो हृदयस्य मे । हृष्यन्त्युच्चै- रोमाञ्चमुञ्चि किमङ्गीकृत्याङ्गानि । वामलिके, बामेन मे स्फुरितमक्ष्णा । वृथा विरससि वयस्य वायस, वृत्ते क्षीरिणि क्षयो क्षयो क्षीणपुण्यायाः पुरः। हरिणि, हेषितमिव हयानामुत्तरतः । कस्येदमातपत्रमुच्चमत्र पादपान्तरेण प्रभावति, विभाव्यते । कुरङ्गिके, केन सुगृहीतनाम्रो नाम गृहीतममृत- मयमार्थस्य । देवि, दिष्ट्या वर्धसे देवस्य हर्षस्यागमनमहोत्सवेन ।' इत्येतच्च श्रुत्वा सत्वरमुपससर्प । ददर्श च मुह्यन्तीमग्निप्रवेशायोद्यतां राजा राज्यश्रियम् । आललम्बे च मूर्च्छामीलितलोचनाया ललाटं हस्तेन तस्याः ससंभ्रमम् । अथ तेन भ्रातुः प्रेयसः प्रकोष्ठबद्धानामोषधीनां रसविरासमिव प्रत्यु- जीवनक्षमं क्षरता वमतेव पारिहार्यमणीनामचिन्त्यं प्रभावममृतमिव नख- चन्द्ररश्मिभिरुद्विरता बभ्रतेव चन्द्रोदयच्युतशिशिरशीकरं चन्द्रकान्तचूडा- मणि मूर्धनि मृणालमयाङ्गुलिनेवातिशीतलेन निर्वापयता दह्यमानं हृदयं हलहलक उत्कण्ठा । एवमादिना निमित्तेन हर्षागमनं सूच्यते । अथंत्यादौ—भ्रातुर्हस्तसंस्पर्शेन राज्यश्रीः सहसैव समुन्मिमीलेति संबन्धः । यह अञ्जलि है । हे माता, परलोक जाने का यह अन्तिम प्रणाम है । अरी लवलिका, मरने के समय मेरे हृदय में यह आनन्द से भरी उत्कण्ठा क्यों उत्पन्न हो रही है ? क्या सोचकर मेरे रोमांचित अंग प्रसन्न हो रहे हैं ? अरी वामनिका, मेरी बाईं आँख फड़क रही है । मित्र वायस, क्षीणपुण्य मेरे सामने दुधारे वृक्ष पर बैठ कर व्यर्थ काँव-काँव मचा रहे हो । अरी हरिणी, उत्तर की ओर घोड़ों की हिनहिनाहट सी सुन पड़ रही है । अरी प्रभावती, किसका यह ऊँचा छत्र वृक्षों की ओट में झलक रहा है ? अरी कुरङ्गिका, सुगृहीतनाम आर्य का किसने अमृतमय नाम लिया ? हे देवी, देव हर्ष के इस आगमन- महोत्सव से तुम्हारी भाग्यवृद्धि हो।' यह सुनकर हर्ष पास पहुँच गए और मूर्च्छित-सी अग्निप्रवेश के लिए तैयार राज्यश्री को देखा । झट दौड़कर मूर्च्छा से बन्द आँखों वाली उस राज्यश्री के ललाट को हाथ से ओढ़ लिया । इस अवस्था में बड़े भाई के आह्लादित करने वाले हाथ के स्पर्श से राज्यश्री की आँखें सहसा खुल गयीं । हर्ष के हाथ का वह स्पर्श ऐसा लगा मानों पुनः जीवित कर देने में समर्थ प्रकोष्ठ में बँधी हुई औषधियों का रस उड़ेल रहा हो । या मानों नख की ज्योत्स्नाओं के रूप में कङ्कण की मणियों का अमृत के समान अचिन्त्य प्रभाव उगल रहा हो।

४३६ हर्षचरितम् .

प्रत्यानयतेव कुतोऽपि जीवितमाह्लादकेन हस्तसंस्पर्शेन सहसैव समुन्मि- मील राज्यश्रीः । तथा चासंभावितागमनस्याचिन्तितदर्शनस्य सहसा प्राप्तस्य भ्रातुः स्वप्नदृष्टदर्शनस्येव कण्ठे समाश्लिष्य तत्कालाविर्भावनि- र्भरेणाभिभूतसर्वात्मना दुःखसंभारेण निर्दयं नदीमुखप्रणालाभ्यामिव मुक्ताभ्यां स्थूलप्रवाहमुत्सृजन्ती बाष्पवारि विलोचनाभ्याम् 'हा तात, हा अम्ब, हा सख्यः' इति व्याहरन्ती, मुहुर्मुहुरुच्चैस्तरां च समुद्भूतभगिनीस्ने- हसद्भावभारभावितमन्युना मुक्तकण्ठमतिचिरं विक्रुश्य 'वत्से, स्थिरा भव त्वम्' इति भ्रात्रा करस्थगितमुखी समाश्वास्यमानापि, 'कल्याणि, कुरु वचनमग्रजस्य गुरोः' इत्याचार्येण याच्यमानापि, 'देवि, न पश्यसि देव- स्यावस्थाम् । अलमतिरुदितेन' इति राजलोकेनाभ्यर्थ्यमानापि, 'स्वामिनि, भ्रातरमवेक्षस्व' इति परिजनेन विज्ञाप्यमानापि, 'दुहितर्, विश्रम्य पुनरा- रटितव्यम्' इति निवार्यमाणापि बान्धववृद्धाभिः, 'प्रियसखि, कियद्रोदिषि, तूष्णीमास्स्व । दृढं दूयते देव' इति सखीभिरनुनीयमानापि, चिरं संभा- वितानेकदुःसहदुःखनिबर्हणबाष्पोत्पीडपीड्यमानकण्ठभागा, प्रभूत- परिहार्य कटकम् । तथा चेत्यादौ साकरोदिति संबन्धः । दुःखनिवहस्य निर्वहणं

या मानों उदित होते हुए चन्द्र की ठंडी किरणें जिसमें पड़ गई हों ऐसी चन्द्रकान्त की चूड़ामणि को मस्तक में बाँध रहा हो । या प्राणों को कहीं से लौटा रहा हो । भाई हर्ष के आगमन की पहले से कोई सम्भावना न थी और उनके दर्शन की बात सोची भी न थी कि वे आ गए, मानों स्वप्न में दिखाई पड़ रहे हों । राज्यश्री उनके कण्ठ में जोर से लिपटकर तत्काल प्रकट हुए सबको अभिभूत कर देनेवाले अपने दुःखभार से नदी की जल निकलने वाली नाली की तरह आँसू के स्थूल प्रवाह को अपने नेत्रों से बहाती हुई विलाप करने लगी- 'हा पिता, हा माता, हा सखियाँ !' बार-बार बहिन के स्नेह से शोक उत्पन्न हो जाने के कारण हर्ष भी देर तक मुक्तकंठ से रोते रहे और कहा—'अब धीरज धरो, अपने को सम्हालो ।' इस प्रकार भाई ने हाथ से मुँह ढँकी हुई उसे सान्त्वना दी । आचार्य ने याचना की—'कल्याणि, बड़े भाई की बात मानो ।' राजाओं ने अभ्यर्थना की—'देवी, देव की अवस्था को नहीं देख रही हो ? अत्यन्त रोना व्यर्थ है ।' परिजनों ने निवेदन किया—'स्वामिनी, भाई को देखो ।' सगी बुढाओं ने मना करते हुए कहा— 'पुत्री, विश्राम करके फिर रो लेना ।' सखियों ने अनुनय किया—'कितना रोओगी, चुप हो जाओ, देव को कष्ट हो रहा है ।' फिर भी बहुत दिनों के अनुभूत दुःसह दुःख के कारण

मन्युभारभरितान्तःकरणा करुणं काहलेन स्वरेण कतिचित्कालमतिदीर्घं रुरोद । विगते च मन्युवेगे वन्हेः समीपादाक्षिप्य भ्रात्रा नीता निकटवर्तिनि तरुतले निषसाद । शनैराचार्यस्तु तथा हर्ष इति विज्ञाय विवर्धितादरः सुतरां मुहूर्तमिव- वातिबाह्य निभृतसंज्ञाज्ञापितेन शिष्येणोपनीतं नलिनीदलैः स्वयमेवादाय नम्रो मुखप्रक्षालनायोदकमुपनिन्ये । नरेन्द्रोऽपि सादरं गृहीत्वा प्रथममन- वरतरोदनाताम्रं चिरप्रवृत्ताश्रुजलजालं रक्तपङ्कजमिव स्वसुर्मुखम्प्रक्षाल्यत्प- श्चादात्मनः । प्रक्षालितमुखशशिनि च महीपाले सर्वतो निःशब्दः संब- भूव सकलो लिखित इव लोकः । ततो नरेन्द्रो मन्दमन्दमब्रवीत्स्वसारम्— ‘वत्से ! वन्दस्वात्रभवन्तं भदन्तम् । एष ते भर्तुर्हृदयं द्वितीयमस्माकं च गुरुः’ इति । राजवचनात्तु राजदुहितरि पतिपरिचयश्रवणोद्घातेन पुन- रानीतनेत्राम्भसि नमन्त्यामाचार्यः प्रयत्नधारितागमागतबाष्पाम्भःसंभार- भज्यमानधैर्यार्द्रलोचनः किंचित्परावृत्तनयनो दीर्घं निःशश्वास । स्थित्वा च क्षणमेकं प्रदर्शितप्रश्रयो मृदुवादी मधुरया वाचा व्याजहार—‘कल्या- प्रकटनं यस्माद्वाष्पोत्पीडादिति समासः । काहलेन महता । उद्घातः प्रस्तावः । यतोऽयं राजलोकश्चिरं रुदित्वा नाद्यापि रोदनान्निवर्तते तत्स्नानविधिः क्रियतामिति । बाष्प से रुँधे हुए गले वाली और अत्यन्त शोकभार से भरे अन्तःकरण वाली राज्यश्री कुछ देर तक जोर-जोर से रोती रही । शोक का वेग जब कम हुआ तो हर्ष उसे अग्नि के पास से दूर हटा कर निकटवर्ती वृक्ष के नीचे ले गए । आचार्य दिवाकरमित्र ने हर्ष को उस प्रकार जान, क्षण भर ठहर, धीरे से अपने शिष्य को इशारा से आज्ञा दी, और उसके द्वारा लाए गए जल को कमलिनीपत्र के खदोने में लेकर स्वयं आदर और नम्रता के साथ राजा को अर्पित किया । राजा ने भी आदर के साथ उसे लेकर पहले निरन्तर रोने से लाल, देर तक आँसू बहने से रक्तकमल के समान राज्यश्री के नेत्र धोए और फिर अपने । राजा के मुँह धो लेने पर सब लोग चित्रलिखित की भाँति निःशब्द हो गए । तब राजा ने धीरे धीरे राज्यश्री से कहा— 'वत्से, भदन्त को प्रणाम करो । ये तुम्हारे पति के दूसरे हृदय और हमारे गुरु हैं।' हर्ष के वचन से राजपुत्री के नेत्र पति का परिचय सुनने के प्रस्ताव से फिर छलछला उठे और उसने प्रणाम किया । तब आचार्य ने भी निकलते हुए आँसुओं को प्रयत्न से रोक कर धैर्य छूटने से फिर भी आर्द्र होते हुए नेत्र को कुछ मोड़ कर जोर से सांस लिया । मृदुवादी ने

४४० हर्षचरितम् तान्कथमपि रसातलनिवासी वासुकिर्नाम विषमुचामीशः। स च तैर्मु- क्ताफलैः पातालतलेऽपि तारागणमिव दर्शयद्भिरैकावलीमकल्पयत्। चकार च मन्दाकिनीति नाम तस्याः। सा च भगवतः सोमस्य सर्वासामोष- धीनामधिपतेः प्रभावादत्यन्तविषघ्नी हिमामृतसंभवत्वाच्च स्पर्शेन सर्वस- त्त्वसंतापहारिणी बभूव। यतः स तां सर्वदा विषोष्मशान्तये वासुकिः पर्यधत्त। समतिक्रामति च कियत्यपि काले कदाचिन्नामैकावलीं तस्मान्नाग- राजान्नागार्जुनो नाम नागैरेवानीतः पातालतलं भिक्षुरभिक्षत लेभे च। निर्गत्य च रसातलात्त्रिसमुद्राधिपतये सातवाहननाम्ने नरेन्द्राय सुहृदे स ददौ ताम्। सा चास्माकं कालेन शिष्यपरम्परया कथमपि हस्तमुप- गता। यद्यपि च परिभव इव भवति भवादृशां दत्त्रिम उपचारस्तथाप्यो- षधिबुद्ध्या बुद्धिमता सर्वसत्त्वराशिरक्षाप्रवृत्तेन रक्षणीयशरीरेणायुष्मता विषरक्षापेक्षया गृह्यताम्' इत्यभिधाय भिक्षोरभ्याशवर्तिनश्चीवरपटान्तसं- यतां मुमोच तामेकावलीं मन्दाकिनीम्। उन्मुच्यमानाया एव यस्याः प्रभालेपिनि लब्धावकाशो विशदमहसि दानेन निर्वृत्तो दत्त्रिमः। अभ्याशो निकटः। रहने वाले नागराज वासुकि के हाथ लगे। उसने उन मुक्ताफलों को गूँथ कर एकलड़ी माला बनाई, जिसका नाम मन्दाकिनी रखा। वह एकलड़ी माला समस्त औषधियों के अधिपति भगवान् चन्द्रमा के प्रभाव से अत्यन्त विषघ्नी है और हिमरूपी अमृत से उत्पन्न होने के कारण समस्त प्राणियों की सन्तापहारिणी है। इसलिये विषज्वालाओं को शान्त रखने के लिए वासुकि सदा उसे पहने रहता है। कुछ समय के बाद कभी नागों से ही पाताल में लाये गये नागार्जुन नाम के किसी भिक्षु ने वासुकि से उस माला को माँगकर प्राप्त कर लिया। पाताल से निकल कर नागार्जुन ने तीन समुद्रों के अधिपति अपने मित्र सातवाहन नाम के राजा को वह एकावली माला प्रदान की और वही माला किसी प्रकार शिष्यपरम्परा द्वारा हमारे हाथ आई। यद्यपि आपको किसी वस्तु का देना अपमान है तथापि औषधि समझकर विष से अपनी रक्षा के लिए आप कृपया इसे स्वीकार करें।' यह कहकर उन्होंने शिष्य के चीवर वस्त्रों में लेकर वह मन्दाकिनी राजा को दी। निकालते ही उस माला की उज्ज्वल किरणें अवकाश पाकर फैल गयीं। उसके प्रकाश

अष्टम उच्छ्वासः ४४१ महीयसि विसर्पति रश्मिमण्डले युगपद्धवलायमानेषु दिङ्मुखेषु मुकुलि- तलतावधूतकण्ठितैरामूलाद्विकसितमिव तरुभिः, अभिनवमृणाललुब्धैर्धा- वितमिव धुतपक्षपुटपटलधवलितगगनं वनसरसीहंसयूथैः, स्फुटितमिव भरवशविशीर्यमाणधूलिधवलैर्गर्भभेदसूचितसूचीसंचयशुचिभिः केतकी- बाटैः, उल्लसितदलदन्तुराभिः प्रबुद्धमिव कुमुदिनीभिः, विधुतसितस- टाभारभरितदिक्षकैश्चलितमिव केसरिकुलैः, प्रहसितमिव सितदशनां- शुमालालोकलिप्यमानवनं वनदेवताभिः, विकसितमिव शिथिलितकुसु- मकोशकेसराट्टहासनिरङ्कुशं काशकाननैः, भ्रान्तमिव संभ्रमभ्रमितबाल- पल्लवपरिवेश्वेतायमानैश्चमरीकदम्बकैः, प्रसृतमिव स्फायमानफेनिलतर- लतरतरङ्गोद्वारिणा गिरिनदीपूरेण, अपरतारागणलोभमुदितेनोदितमिव विकचमरीचिचक्राक्रान्तककुभा पूर्णचन्द्रेण, प्रक्षालित इव दावानलधूलि- धूसरितदिगन्तो दिवसः, पुनरिव धौतान्यश्रुजलक्लिष्टानि नारीणां मुखानि । राजा तु मांसलैस्तस्याः संमुखैर्मयूखैराकुलीक्रियमाणं मुहुर्मुहुरु- महत्तरः सरसी । केतक्यो वृक्षभेदाः । काशास्तृणभेदाः । परिवेशः परिवलनम् । स्फायमाना वर्धमानाः । से दिशायें धवलित हो गईं । खिलती हुई लतावधुओं के लिए उत्कण्ठित होकर वृक्ष मानों नीचे तक विकसित हो गए । नये मृणालों के लोभी वनसरसियों के इस झुण्ड के झुण्ड अपने पंखों से आकाश को सफेद करते हुए मानों दौड़ पड़े । केतकी के समूह, भार के कारण जिनके पराग झड़ रहे थे और जिनके गर्भ से सफेद सूचियाँ निकल रही थीं, मानों फूट पड़े । खिले हुए दलों वाली कुमुदिनियाँ मानों जग पड़ीं । अनेक सिंह अपनी गर्दन के उज्ज्वल सटाभार को दिशाओं में झलते हुए मानों चल पड़े । वनदेवतायें अपने उज्ज्वल दाँतों की किरणों से वन को उल्लासित करती हुई मानों हँस पड़ीं । काश के वन फूल-गुच्छों से अट्टहास के रूप में निकलते हुए परागों द्वारा मानों खिल उठे । चमरी गायें अपने हिलते हुए बालव्यंजनों से वन को श्वेत करती हुई मानों घूम पड़ीं । बढ़ती हुई फेनिल और चंचल तरंगों के रूप में पहाड़ी नदी का प्रवाह मानों फैल गया । दूसरे तारों के लोभ से प्रसन्न पूर्णचन्द्र मानों किरणों से दिशाओं को आक्रान्त करता हुआ उदित हो गया । दावानल की धूल से मटमैला बना दिन मानों धुल गया । आँसू के जल से कलुषित स्त्रियों के मुख मानों फिर से धुल गए । राजा की आँखें उसकी सामने पड़ती हुई किरणों से चौंधिया गयीं और बन्द होने

४४२ हर्षचरितम् न्मीलयन्निमीलयंश्च चक्षुः कथमपि प्रयत्नेन ददर्श सर्वाशापूरणीं पङ्क्ती- कृतामिव दिङ्नागकरशीकरसंहतिम्, घनमुक्तां शारदीमिव लेखीकृतां ज्योत्स्नाम्, प्रकटपदकचिह्नां संचारवीथीमिव बालेन्दोर्नििश्चलीभूतां सप्त- र्षिमालामिव हस्तमुक्ताम्, अभिभूतसकलभुवनभूषणभूतिप्रभावामिवै- शानीं शशिकलाम्, धवलतागुणपरिगृहीतां कान्तिमिव निर्गतां क्षीरराशेः, अनेकमहामहीभृत्परम्परागतां गङ्गामिव दुर्गतिहराम्, अनवरतस्फुरित- तरलांशुकां पुरःसरपताकामिव महेश्वरभावागमस्य, घनसारशुद्धां दन्तप- ङ्क्तिमिवाभिमुखस्येश्वरस्य, वरमनोरथपूरणसमर्थां स्वयंवरस्रजमिव भुवन- श्रियः, निजकरपल्लवावरणदुर्लक्ष्यां चक्षूरागविहसतिकामिव वसुधायाः,

आशा आस्थाः, दिशश्च । घनमुक्तां निरन्तरमौक्तिकां, मेघमुक्तां च । पदकं मध्यमणिः । पदमेव च पदकम् । हस्तमुक्ताम् । परिवर्तुलत्वाद्धस्ते यः स्थितिं न बध्नाति । हस्तो हस्तसंज्ञा वा, नक्षत्रं च हस्तः । सकलभुवनभूषणं कौस्तुभादिः, हरश्च । भूतिः समृद्धिः, भस्म च । गुणो धर्मः, तन्तुश्च । महीभृतो राजानः, पर्वताश्च । दुर्गतिर्दारिद्र्यम्, नरकादिगतिश्च । तरलो हारमध्यगतो मणिः, चञ्च- लश्च । अंशुका रश्मयः, उत्तरीयम् चांशुकम् । घनसारवच्छुक्लां कर्पूरवच्छुभ्राम्, निरन्तरदृढधवलां च । अभिमुखस्य प्रतिमुखमागच्छतः, दन्तपङ्क्तिश्च मुखस्याभितो भवति । वरः श्रेष्ठः, जामाता च । निजाः कराः सहजा रश्मयः, स्वकश्च हस्तो

और खुलने लगीं । किसी प्रकार बड़े प्रयत्न से उसे देखा । सब दिशाओं को भर देने वालो पंक्ति के रूप में एकत्रित की हुई बह मानों दिग्गजों की सूँड़ से निकली हुई शीकरसंहति हो, घने मोतियों को गूँथकर बनाई हुई बह मानों शरत्कालीन ज्योत्स्ना की मेघमुक्त रेखा हो । वह मानों बालचन्द्रमा के संचरण करने की विधि हो, या हाथ से गिरकर (या हस्त नक्षत्र से मुक्त होकर) स्थिर हुई सप्तर्षिमाला हो, या समस्त भुवन के भूषणों के ऐश्वर्य को अपने प्रभाव से अभिभूत कर देने वाली वह मानों शिव के ललाट की चन्द्रकला हो, या धवलता गुण को लेकर हुई क्षीरसमुद्र की बह मानों कान्ति हो । दुर्गति (दुर्दशा या दरिद्रता) को दूर करने वाली गङ्गा के समान वह अनेक महीभृतों (राजाओं या पर्वतों) की कुलपरम्परा से आयी हुई थी । साम्राज्यलाभ के आगे-आगे चलने वाली निरन्तर फहराती हुई मानों पताका थी । सामने आते हुए शिव की कपूर की भाँति श्वेत मानों दन्तपंक्ति हो, भुवनलक्ष्मी की वर (श्रेष्ठ पुरुष या विवाह करने वाले) के मनोरथ को पूर्ण करने में समर्थ मानों स्वयंवर की माला हो । अपनी ही किरणों के आवरण से वह

अष्टम उच्छ्वासः ४४३ मन्त्रकोशसाधनप्रवृत्तस्याक्षमालामिव राजधर्मस्य, समुद्गालंकारभूतां संख्यालेख्यपट्टिकामिव कुबेरकोशस्य । पश्यंश्चैतां विस्मयमाजगाम मन- सा सुचिरम् । आचार्यस्तु तामुद्धृत्य बबन्ध बन्धुरे स्कन्धभागे भूपतेः । अथ नरपतिरपि प्रतिप्रीतिमुपदर्शयन्प्रत्यवादीत्—'आर्य ! रत्नानामीह- शानामनर्हाः प्रायेण पुरुषाः । तपःसिद्धिरियमार्यस्य देवताप्रसादो वा । के च वयमिदानीमात्मनोऽपि किमुत ग्रहणस्य प्रत्याख्यानस्य वा । दर्शनात्प्रभृति प्रभूतगुरुगुणगणहृतेन हृदयेन परवन्तो वयम् । संक- ल्पितमिदमामरणादार्योपयोगाय शरीरम् । अत्र कामचारो वः कर्तव्या- नाम्' इति । समतिक्रान्ते च कियत्यपि काले गते चैकावलीवर्णनालापे लोकस्या- नन्तरं लब्धविश्रम्भा राज्यश्रीस्ताम्बूलवाहिनीं पत्रलतामाहूयोपांशु किमपि कर्णमूले शनैरादिदेश । दर्शितविनया च पत्रलता पार्थिवं व्यज्ञापयत्— 'देव ! देवी विज्ञापयति न स्मराम्यार्यस्य पुरः कदाचिदुच्चैर्वचनमपि । निजकरः । चक्षूरागः प्रीतिस्तया विहसतिका नर्महासः । मन्त्रः कर्तव्यावधारणम् । कोशो गञ्जः । साधनं हस्त्यश्वादि । तेन प्रवृष्टाचरितस्य मन्त्रसमूहाराधनप्रस्तु- तस्य । समुद्गः सागरः, सह मुद्रया च यो वर्तते । बन्धुरे हृद्ये । प्रत्याख्यानस्य प्रतिषेधस्य । परवन्तोऽन्यायत्ताः । उपांशु गुप्तम् । दुर्लक्ष्य हो रही थी, मानों वह पृथिवी का प्रीतिजन्य नर्महास हो । मन्त्र, कोश और साधन में प्रवृत्त राजधर्म की अक्षमाला थी । वह कुबेर के कोष की संख्या बताने वाली मानों लेख्यपट्टिका थी, जो मुद्रा और अलङ्कारों से सुशोभित थी। राजा उसे देखते हुए देर तक आश्चर्य में पड़े रहे । आचार्य ने उसे उठाकर राजा के निम्नोन्नत स्कन्धभाग में बाँध दिया । तब राजा ने भी प्रेम प्रदर्शित करते हुए कहा—'आर्य, ऐसे रत्न प्रायः मनुष्यों को नहीं मिलते, यह तो आर्य की तपःसिद्धि है, या देवता का प्रसाद हो। जब से हमने आपको देखा है तभी से आपके महान् गुणों से हमारा हृदय आपके वशीभूत है । जीवनपर्यन्त आर्य के उपयोग के लिए इस शरीर का संकल्प करता हूँ। यथेष्ट कार्य के लिए आज्ञा करें।' कुछ समय बीतने पर जब एकावली के सम्बन्ध की चर्चा समाप्त हुई और राज्यश्री कुछ आश्वस्त हुई तब उसने अपनी ताम्बूलवाहिनी पत्रलता को पास बुलाकर कान में धीरे से कुछ कहा । विनय को प्रदर्शित करती हुई पत्रलेखा ने हर्ष से विनती की—'देव, देवी निवेदन करती हैं कि आर्य के सामने कभी भी सिर उठा कर बात नहीं की, विज्ञापन

४४४ हर्षचरितम् कुतो विज्ञापनम्। इयं हि शुचामसहातां व्यापारयन्ती हतदैवदत्ता च दशा शिथिलयति विनयम्। अबलानां हि प्रायशः पतिरपत्यं चावलम्बनम्। उभयविकालानां तु दुःखानलेन्धनायमानं प्राणितमशालीनत्वमेव केवलम्। आर्यागमनेन च कृतोऽपि प्रतिहतो मरणप्रयत्नः। यतः काषायग्रहणाभ्य- नुज्ञयानुगृह्यतामय मपुण्यभाजनं जनः' इति। जनाधिपस्तु तदाकर्ण्य तूष्णीमेवावतिष्ठत्। अथाचार्यः सुधीरमभ्यधात्-'आयुष्मति ! शोको हि नाम पर्यायः पिशाचस्य, रूपान्तरमाक्षेपस्य, तारुण्यं तमसः विशेषणं विषस्य, अनन्तकः प्रेतनगरनायकः, अयमनिर्वृतिधर्मा दहनः, अयमक्षयो राज- यक्ष्मा, अयमलक्ष्मीनिवासो जनार्दनः, अयमपुण्यप्रवृत्तः क्षपणकः, अयमप्रतिबोधो निद्राप्रकारः, अयमनलसधर्मा संनिपातः, अयमशिव- प्राणितं जीवितम् । अशालीनत्वं धाष्टर्यम् । आक्षेपस्यापस्मारस्य । अनन्तान्कायति रावयतीत्यनन्तकः । अनिर्वृतिरस्वा- स्थ्यम् , निर्वाणाभावश्च । अक्षयश्चिरस्थायी, क्षयरहितश्च । जनान्दर्यति पीडयतीति जनार्दनः, कृष्णश्च । अपुण्यप्रवृत्तः पापप्रवृत्तः । क्षपणको यः क्षपयति, नग्नाटकरुश्च । प्रतिबोधो विवेकः, स्वापादुत्थानं च । निद्रां प्रकिरति हिनस्ति निद्राप्रकारः । कर्म- ण्यण् । निद्राविशेषश्च मोहरूपः । अनलेनाग्निना सधर्मा सदृशः । अलसलक्षणो धर्मं आलस्यं यस्य सोऽलसधर्मा, नालसधर्माऽनलसधर्मा । सम्यङ्निपातयति घातयति यः । त्रिदोषजो व्याधिश्व स संनिपातः । शिवः श्रेयः, हरश्च शिवः । विशेषेण नयति की बात दूर है। शोक को दुःसह बना देने वाली दैव के द्वारा की गई यह मेरी दशा नम्रता को शिथिल कर रही है। प्रायः अबलाओं के जीवित रहने का अवलम्बन पति होता है या सन्तान । जो इन दोनों से हीन हैं उनके लिए दुःखाग्नि के इन्धन के रूप में जीवित रहना केवल निर्लज्जता ही है। आर्य के आने से मरण का प्रयत्न निष्फल चला गया, इसलिए इस पुण्यहीन जन को काषाय वस्त्र धारण करने की अनुज्ञा मिले।' तब दिवाकरमित्र ने धीरे स्वर में कहा- 'आयुष्मति, शोक पिशाच का ही दूसरा नाम है, वातव्याधि (अपस्मार) का ही दूसरा रूप है, अंधकार का यौवन है और विष का ही विशेष प्रकार है। यह प्राणों का वियोग न करने वाला यमराज है। कभी न बुझने वाली अग्नि है। कभी न समाप्त होने वाला राजयक्ष्मा है। यह जन को पीड़ित करने वाला (जनार्दन, श्लेष से कृष्ण) है जो लक्ष्मी का नहीं। यह वह क्षपणक (सबका नाश करने वाला या क्षपणक साधुविशेष) है, जो अपुण्य कार्यों में लगा हुआ है या किसी अपुण्य से पहुँच पड़ता है। यह ऐसी नींद है जिससे कोई जागता नहीं। यह ऐसा सन्निपात

अष्टम उच्छ्वासः ४४५ सहचरो विनायकः, अयमबुधसेवितो ग्रहवर्गः, अयमयोगसमुत्थो ज्योतिःप्रकारः, अयं स्नेहाद्वायुप्रकोपः, मानसादग्निसंभवः, आर्द्रभावा- द्रजःक्षोभः, रसादभिशोषः, रागात्कालपरिणामः । तदस्याजस्रास्र- स्राविणो हृदयमहाव्रणस्य बहलदोषान्धकारलब्धप्रवेशप्रसरस्य प्राण- तस्करस्य शून्यताहेतोर्महाभूतग्रामघातकस्य सकलविग्रहक्षपणदक्षस्य मारयतीति विनायकः, विनायको विघ्नो वा, गणपतिश्च विनायकः। बुधः पण्डितः, ग्रहभेदश्च बुधः। ग्रहो व्यसनम् , सूर्यादिश्च। अयोगोऽनुकूलं दैवम् , चित्तवृत्ति- निरोधाभावश्च। ज्योतिःप्रकारोऽग्निभेदः, परं ज्ञानं च। स्नेहः प्रीतिः, पुष्टिहेतुश्च घृतादिः। वायुप्रकोप उन्मादोऽत्र। मानसं चेतः, देवसरश्च। आर्द्रभावो वत्सल- त्वम् , सरसत्वं च। रजो गुणविशेषो धूलिश्च। रसः प्रीतिः, रसायनं च। रागोऽभि- ष्वङ्गः, लौहित्यं च। कालोऽन्तकः, कृष्णश्च। तदस्तेत्यादौ। तत्तस्मादस्य शोकस्य पारं विदुषामपि हृदयानि सोढुं नालम् , किं पुनरबलानां हृदयमिति संबन्धः । अजस्रंसदा। अस्रं बाष्पः, रक्तं च। व्रणं च रक्तं स्रवति। एवमुत्तरत्रापि ज्ञेयम् । बहलदोषा बहवोऽपगुणाः, कृष्णपक्षरात्रयश्च। अन्धकारो मोहः, तमश्च। शून्यता किंकर्तव्यतामूढता। महाभूतग्रामो जन्तुसमूहः तद्घातकश्चायं, महान्तो भूताः प्राणिनो यस्मिन् । ग्रामे जनपदसमूहे तस्य यो घातकः स शून्यताया जनरहि- तस्य हेतुर्भवति। विग्रहः शरीरम् , विरोधश्च। दोषचक्रे मुख्यतया वर्तते यः स (त्रिदोषजन्य व्याधि या सबका नाश करने वाला) है, जो अनल के सदृश है। यह वह विनायक (गणेश या मार डालने वाला) है जो शिव (शंकर या श्रेय) के साथ नहीं रहता। यह वह ग्रहों का समूह है जिसमें बुध (ग्रहविशेष या पण्डित) नहीं रहता। यह दुर्भाग्य से उत्पन्न हुआ एक प्रकार का अग्नि है। यह स्नेह से उत्पन्न होने वाला वायुप्रकोप या उन्माद है। मानस से उत्पन्न अग्नि है। वात्सल्य से उत्पन्न होने वाला रजोगुण का क्षोभ है (अथवा आर्द्रता के कारण धूल का मर जाना है)। यह अनुराग से होने वाला शोषण है (जो शरीर को क्षीण कर देता है)। राग से उत्पन्न होने वाली परिणामस्वरूप मृत्यु है (अथवा लाली से होने वाला कृष्ण वर्ण का परिणाम है)। यह हृदय का महाव्रण (नासूर) है, जो सदा आँसू का रक्त बहाता रहता है। यह प्राणों का वह तस्कर है जो दोषों के घने अन्धकार में प्रवेश करता है। यह महाभूतों (क्षिति आदि पांच) के ग्राम का घातक है, जो शून्यता (निर्जनता या निश्चेतनता) की अवस्था का कारण है। यह दोषों का सम्राट् है जो समस्त विग्रहों (शरीर या कलहों) को नष्ट करने में चतुर है। यह एक बड़ा रोग है जो दुबलापन,

४४६ हर्षचरितम् दोषचक्रवर्तिनः कार्श्यश्वासप्रलापोपद्रवसहस्रस्य दीर्घरोगस्यासद्ग्रहस्य सकललोकक्षयधूमकेतोर्जीवितापहारवक्षस्त्वाक्षणरुचेरनभ्रवज्रपातस्य स्फुर- दनवद्यविद्याविद्युद्द्योतमानानि गहनग्रन्थगूढगर्भग्रहणगम्भीराणि भूरि- काव्यकथाकठोराणि बहुशास्त्रोद्वहनदृढन्ति विदुषामपि हृदयानि नालं सोढुमापातं किमुत नवमालिकाकुसुमकोमलानां सरसबिसतन्तुदुर्बल- कमबलानां हृदयम् । एवं सति सत्यव्रते ! वद् किमत्र क्रियते, कतम उपालभ्यते, कस्य पुर उच्चैराक्रन्द्यते, हृदयदाहि दुःखं वा ख्याप्यते ? सर्वमक्षिणी निमील्य सोढव्यममूढेन मर्त्यधर्मणा । पुण्यवति ! पुरातन्यः स्थितय एताः केन शक्यन्तेऽन्यथाकर्तुम् । संसरन्त्यो नक्तंदिवं द्राघीयस्यो जन्मजरामरण- दोषचक्रवर्ती, चक्रवर्ती च सार्वभौमः, उपद्रवो बाधा, व्याधेरुपर्यन्त्यो व्याधिश्च । उक्तं च—'व्याधेरुपरि यो व्याधिर्भवत्युत्तरकालजः । उपक्रमविरोधित्वात्स ह्युपद्रव उच्यते ॥' इति । दीर्घरोगः क्षयादिः । असद्ग्रहोऽनर्थासक्तिः, धूमकेतुश्च । अशोभनो गृहः । न विद्यमाना क्षणमपि रुचिर्योजनाभिलाषः, क्षणरुचिस्तडित् । स्फुरन्त्याः प्रकाशमानाया अनवद्याया विद्याया विद्युता किंचिन्मात्रज्ञानेन विद्युदपि सकृदेव स्फुरति । तथा गहनानां दुरवग्रहाणां ग्रन्थानां ये विषमतमाः प्रदेशास्तेषां गुप्तो यो गर्भः तद्ग्रहणेन गम्भीराणि । पुण्यवति, पुरातन्य इत्यादौ । ध्वनिश्च्छायाजन्मजरामरणघटनान्येव घटीयन्त्र- राज्या रज्जवः । पञ्चजना मानुषाः । 'मनुष्या मानुषा मर्त्या मनुजा मानवा नराः । सांस और बड़बड़ाहट उत्पन्न करता है। यह समस्त लोकों का क्षय करने वाला दुष्ट ग्रह धूमकेतु है । प्राणों का अपहरण करने वाला बिजली एवं मेघ से रहित यह वज्रपात है । अनिन्द्य विद्याओं के प्रकाश से चमकने वाले, शास्त्रों के गहन तत्त्व को समझने से गम्भीर, अनेक काव्यकथाओं को जानने से कठोर, बहुत से शास्त्र का अभ्यास करने वाले विद्वानों के हृदय भी शोक को नहीं सह सकते, तो नवमालिका के फूलों के सदृश कोमल मृणाल- तन्तु की भाँति दुर्बल अबलाओं के हृदय की तो बात ही क्या ! अतएव हे सत्यव्रते, तुम्हीं कहो अब क्या किया जाय ? किसे उलाहना दें ? किसके आगे जोर-जोर से रोवें ? किसे हृदय का जलाने वाला दुःख कहें ? मनुष्य को सब कुछ आँखें मूंद कर सहना चाहिए । हे पुण्यवती, इन पुरानी स्थितियों को कौन मेंट सकता है ? सभी मनुष्यों के लिए रात-दिन, जन्म, जरा, मृत्यु रूपी रहट की घड़ियों की लम्बी धाक

अष्टम उच्छ्वासः ४४७ घटनघटीयन्त्रराजिरज्जवः सर्वपञ्चजनानाम्। पञ्चमहाभूतपञ्चकुलाधिष्ठि- तान्तःकरणव्यवहारदर्शननिपुणाः सर्वंकषा विषमा धर्मराजस्थितयः। क्षणमपि क्षममाणा गलन्त्यायुष्कलाकलनकुशला निलये निलये काल- नालिकाः। जगति सर्वजन्तुजीवितोपहारपातिनी संचरति झटिति चण्डिका यमाज्ञा। रटन्त्यनवरतमखिलप्राणिप्रयाणप्रकटनपटवः प्रेतपति- पटहाः। प्रतिदिशं पर्यटन्ति पेटकैः प्रतप्तलोहलोहिताक्षाः कालकूट- कान्तिकालकायाः कालपाशपाणयः कालपुरुषाः। प्रतिभवनं भ्रमन्ति भीषणकिंकरकरघटितयमघटापुटपुटुटंकारभयंकराः सर्वसत्त्वसंघसंहर- णाय घोराघातघोषणाः। दिशि दिशि वहन्ति बहुचिताधूमधूसरितप्रेत- पतिपताकापटुपतितगृध्रदृष्टयः शोककृतकोलाहलाकुलकुटुम्बिनीविकीर्ण- केशकलापशबलशवशिबिकासहस्रसंकुलाः किलकिलायमानश्मशानशि- विरशिवाशावकाः परलोकावसथपथिकसार्थप्रस्थानविशिखा वीथयः। स्युः पुमांसः पञ्चजनाः पुरुषाः पूरुषा नरः॥' इति। पञ्चकुलोऽध्यक्षः। अन्तःकरणं मनः। कला भागाः, कलनं संख्यानम्। नालिका होराः। चण्डिका भीषणा, रौद्रदेवताभेदश्च। पेटकैः समूहैः। घोषणा राजाज्ञया पश्चादिसंबद्धः पटहादिशब्दो दिशि दिश्येवंविधा रीतिर्विधेयेति। विशिखा वीथयः रथ्या मार्गा वहन्तीति संगतिः। कुटुम्बिन्योऽपहेलाः। शिबिका वाहनम्। श्मशानमेव शिविरं येषां ते। घूम रही है। पंचमहाभूतों के द्वारा जितने मानस व्यवहार हो रहे हैं वे सब यमराज के विषम अनुशासन से नियंत्रित होकर विलय को प्राप्त हो जाते हैं। घर-घर में आयु को नापने की घड़ियां लगी हुई हैं जो एक-एक क्षण का हिसाब रखती हैं। सब प्राणियों के प्राणों के उपहार लेने के लिए यमराज की भीषण आज्ञा चारों ओर घूम रही है। समस्त प्राणियों के प्रस्थान की सूचना देने वाले यमराज के नगाड़े निरन्तर बज रहे हैं। तपे हुए लोहे के समान लाल आँखों वाले विष की भाँति काले शरीर वाले कालपुरुष हाथों में काल- पाश लिये झुण्ड के झुण्ड चारों ओर प्रत्येक नगर में घूम रहे हैं। हर घर में यमराज के भयंकर दूत यमघण्टा बजा कर सब जीवों के संहरण के लिए घोर घोषणा कर रहे हैं। हर दिशा में परलोक के यात्रियों की पगडंडियां बनी हुई हैं, जहाँ चिता के निकलते हुए धूम से मलिन यमराज की पताकाओं पर गीध अपनी दृष्टि डाले हुए हैं, जिन पर शोक से रुदन करती हुई व्याकुल विधवाओं के टूट कर बिखरे केशों से शबलित अर्थियाँ जा रही हैं, जहाँ मरघट की झाड़ियों में सियारियों के बच्चे चिखा रहे हैं। काकुत्स्थि की चिता के कोयलों

४४८ : हर्षचरितम् : सकललोककवलावेलेहलम्पटा बहला वहंलिहा लेढि लोहिताक्षिता चिताङ्गारकाली कालरात्रिजिह्वा जीवितानि जीविनाम् । शशिरमशिक्षिता च भगवतः सर्वभूतभुजो बुभुक्षा मृत्योः । अतिद्रुतवाहिनी चानित्यता नदी । क्षणिकाश्च महाभूतग्रामगोष्ठयः । रात्रिषु भङ्गुराणि पात्रयन्त्रपञ्जरदारूणि देहिनाम् । अशुभशुभावेशविवशा विशरारवः शरीरनिर्माणपरमाणवः । छिदुरा जीवनबन्धनपाशतन्त्रीतन्तवः । सर्वमात्मनोऽनीश्वरं विश्वं नश्वरम् । एवमवधृत्य नात्यर्थमेवार्हसि मेधाविनि मृदुनि मनसि तमः प्रसरं दातुम् । एकोऽपि प्रतिसंख्यानक्षण आधारीभवति धृतेः अपि च दूरगते- ऽपि हि शोके नन्विदानीमपेक्षणीय एवायं ज्येष्ठः पितृकल्पो भ्राता भवत्या गुरुः । इतरथा को न बहु मन्येत कल्याणरूपमीदृशं संकल्पमत्रभवत्याः काषायग्रहणकृतम् । अखिलमनोज्वरप्रशमनकारणं हि भगवती प्रव्रज्या । ज्यायः खल्विदं पदमात्मवताम् । महाभागस्तु भिनत्ति मनोरथमधुना । बहला दीर्घा गौश्च । उक्तं च—'बहलाः कृत्तिका गावः' इति च । वहंलिहा छिद्रान्वे- षिणी, वहंलिहा च गौर्वत्सस्य भवति । देहिनां शरीरवतां जीवाः प्राणिन एव बन्धनपाशतन्त्रीतन्तवः । आत्मनोऽनीश्वरं न स्वायत्तम् । परतन्त्रमित्यर्थः । प्रति- संख्यानं विवेककुशला मतिः । दूरगते परंपरा रूढे । ज्येष्ठो भ्रातेत्याद्युत्तरोत्तरं साभिप्रायं व्याख्येयम् । के समान कालजिह्वा प्राणियों के जीवन चाट रही है जैसे गाय बछड़े को । समस्त प्राणियों को चट कर जाने वाले भगवान् मृत्युदेव की भूख कभी नहीं बुझती । अनित्यता रूपी नदी तेजी से बह रही है । पंचमहाभूतों की पंचायतें क्षण भर ही रहती हैं । साधु जैसे दिन में कमण्डलु रखने के लिए लकड़ियों को जोड़ कर पिंजड़ा बनाते हैं और रात को उसे खोल डालते हैं वैसा ही यह शरीर का यंत्र है । शरीर के परमाणु पुण्य और पाप के अनुसार विवश होकर एक दूसरे का घात करते हैं । जीव को बंधन में बांधने वाले पाश की डोरी के तन्तु एक दिन अवश्य टूटते हैं । सारा नश्वर संसार परतंत्र है । हे मेधावनि, ऐसा जान कर अपने सुकुमार मन में अन्धकार को न फैलने दो । विवेक का एक क्षण भी धृति के लिए बड़ा सहारा होता है । शोक के कम होने पर भी अब यह पितृतुल्य तुम्हारा ज्येष्ठ भ्राता ही तुम्हारा गुरु है, अन्यथा कौन ऐसा है जो काषायग्रहण के लिए आपके ऐसे कल्याणरूप संकल्प की सराहना न करे। प्रव्रज्या ही सब प्रकार के मानसिक ज्वरों को शान्त करने का उपाय है । मनस्वी के लिए यह उत्तम कार्य है । इस समय महाभाग (हर्ष) तुम्हारे मनोरथ विफल करते हैं। जो वे आदेश दें वही तुम्हें

यदयमादिशति तदेवानुष्ठेयम् । यदि भ्रातेति यदि ज्येष्ठ इति यदि वत्स- इति यदि गुणवानिति यदि राजेति सर्वथा स्थातव्यमस्य नियोगे' इत्यु- क्त्वा व्यरंसीत् । उपरतवचसि च तस्मिन्निजगाद नरपतिः—'आर्यमपहाय कोऽन्य एवमभिदध्यात् । अनभ्यर्थितदैवनिर्मिता हि विषमविपदवलम्बनस्तम्भा भवन्तो लोकस्य । स्नेहार्द्रमूर्तयो मोहान्धकारध्वंसिनश्च धर्मप्रदीपाः । किंतु प्रणयप्रदानदुर्ललिता दुर्लभमपि मनोरथमतिप्रीतिरभिलषति । धीरस्यापि धार्ष्ट्यमारोपयति हृदयलघिमलङ्घितमतिवल्लभत्वम् । युक्ता- युक्तविचारशून्यत्वाच्च शालीनमपि शिक्षयन्ति स्वार्थतृष्णाः प्रागल्भ्यम् । अभ्यर्थनाया रक्षन्ति च जलनिधय इव मर्यादामार्याः । दत्तमेव च शरीरमिदमनभ्यर्थितेनं प्रथममेवातिथ्याय माननीयैन भवता मह्यम् । अतः किंचिदर्थये भदन्तमियं नः स्वसा बाला च बहुदुःखखिदिता च सर्वकार्यावधीरणपरोधेनापि यावल्लालनीया नित्यम् । अस्माभिश्च भ्रातृव- धापकारिरिपुकुलप्रलयकरणोद्यतस्य बाहोर्विधेयैर्भूत्वा सकललोकप्रत्यक्षं प्रतिज्ञा कृता । पूर्वावमानाभिभवमसहमानैरर्पित आत्मा कोपस्य । अनभ्यर्थितेत्यादौ ध्वनिच्छायावगन्तव्या । धीरस्य गम्भीरस्य । लङ्घितमाक्रा- न्तम् । शालीनमष्टष्टत्वम् । भदन्तेति बौद्धकर्मविशेषपूजावचनम् । अवधीरणमुपे- करना चाहिए। यदि इन्हें ज्येष्ठ, या भ्राता, या शिष्य, या गुणी, या राजा समझते हो तो सर्वथा इनके आदेश का पालन करना चाहिए।' इतना कहकर आचार्य चुप हो गए। उनके चुप हो जाने पर राजा ने कहा—'आर्य के सिवा कौन इस प्रकार के वचन कहेगा ? आर्य समस्त संसार को विषम विपत्तियों में सहारा देने वाले स्तम्भ हैं जिसे देव ने प्रार्थना के बिना ही बना दिया है। स्नेह से आर्द्र, और मोह रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाले दीपक हैं, किन्तु प्रणय के लाभ से बढ़ी हुई प्रीति दुर्लभ मनोरथ की भी अभिलाषा करने लगती है । हृदय के संकोच का अतिक्रमण करने वाला अतिप्रेम धीर पुरुष को भी धृष्ट कर देता है। युक्तायुक्त के विचार से रहित स्वार्थ की तृष्णाएँ शील वाले व्यक्ति को प्रगल्भ बना देती हैं। आर्य लोग समुद्र की तरह अभ्यर्थना की मर्यादा रखते हैं। माननीय आर्य ने याचना के बिना ही इस शरीर को आतिथ्य के लिए मुझे अर्पित किया है इसलिए सेवा में एक याचना करता हूँ। काम हरज करके भी अनेक कष्टों से दुखी मेरी इस छोटी बहिन का लालन करना मेरा कर्त्तव्य है। किन्तु भाई के वध का बदला लेने के लिए शत्रुकुल के नाश की प्रतिज्ञा मैं सब लोगों के समक्ष कर चुका हूँ। पहले शत्रु द्वारा किए गए अपने अपमान के अभिभव को न सह सकने के कारण हम २६ ह० च०

४५० हर्षचरितम् अतो नियुङ्क्तां कियन्तमपि कालमात्मानमार्योऽपि कार्ये मदीये । दीयता- मतिथये शरीरमिदम् । अद्यप्रभृति यावदयं जनो लघयति प्रतिज्ञाभारम्, आश्वासयति च तातविनाशदुःखविप्लवाः प्रजाः, तावदिमामत्रभवतः कथाभिश्च धर्म्याभिः, कुशलप्रतिबोधविधायिभिरुपदेशैश्च दूरापसारितर- जोभिः, शीलोपशमदायिनीभिश्च देशनाभिः, क्लेशप्रहाणहेतुभूतैश्च तथा- गतैर्दर्शनैः, अस्मत्पार्श्वोपयायिनीमेव प्रतिबोध्यमानामिच्छामि । इयं तु ग्रहीष्यति मयैव समं समाप्तकृत्येन काषायाणि । अर्थिजने च किमिव नातिसृजन्ति महान्तः । सुरनाथमात्मास्थिभिरपि यावत्कृतार्थमकरोद्धै- र्योदधिर्दधीचः । मुनिनाथोऽप्यनपेक्षितआत्मस्थितिरनुकम्प्येति कृत्वा कृपा- वानात्मानं वठरसत्त्वेभ्यः कतिकृत्वो न दत्तवान् । अतः परं भवन्त एव बहुतरं जानन्ति ।' इत्युक्त्वा तूष्णीं बभूव भूपतिः । भूयस्तु बभाषे भदन्तः- 'भव्या न द्विरुच्चारयन्ति वाचम् । चेतसा प्रथममेव प्रतिग्राहिता गुणास्तावकाः कायबलिमिमाम् । अमुना जनेनो- च्छणम् । विधेयेरायत्तैः । नियुक्तां स्वीकरोतु । देशनाभिः शिक्षाभिः । क्लेशा अविद्या- दयस्तेषां प्रहाणम् । तथागतैबौद्धैरात्मास्थिभिरपि । यावदित्यत्र यावच्छब्दोऽव- धारणे । मुनिनाथः सुगतः । वठरसत्त्वा जडप्राणिनः सिंहाद्याः । एवं किल श्रूयते- पुरा काचन सिंही प्रसवकाले बुभुक्षातुरा स्वशावकान्भक्षयितुं प्रवृत्ता, सौगतेन च समालोक्यातिकारुण्यात्स्वमांसप्रदानेन तस्मान्निवारितेति । भव्या भाग्यवन्तः । काय एव बलिहेतुत्वाद्विलिखिरिव कायबलिस्ताम् । अपने क्रोध के वशीभूत हैं। कुछ समय तक आर्य भी मेरे इस काम में सहायक हों । मैं आपका अतिथि हूँ, कृपया मुझे अपने शरीर का दान दें । आज से लेकर जब तक मैं अपनी प्रतिज्ञा के बोझ को हल्का न बनाऊँ, पिता की मृत्यु के दुःख से व्याकुल प्रजाओं को ढाढ़स न दूँ, तब तक मैं चाहता हूँ कि आप मेरे साथ ही रहने वाली मेरी बहिन को धार्मिक कथाओं से रजोगुणरहित कुशल को उत्पन्न करने वाले उपदेशों से, शील और शम देने वाली शिक्षाओं से, क्लेशों को मिटाने वाले भगवान् तथागत के सिद्धान्तों से समझाते रहें । जब मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लूँगा तो मेरे साथ ही यह भी काषाय ग्रहण करेगी । बड़े लोग प्रार्थी के लिए क्या नहीं दे डालते हैं ? धैर्य के समुद्र दधीचि ने इन्द्र को अपनी हड्डियाँ दे डाली थीं। क्या मुनिनाथ बुद्ध ने शरीर की कुछ परवाह न करके अनुकम्पावश अपने आपको कितनी बार हिंस्र पशुओं के लिए नहीं दे डाला ? उदाहरण तो आप स्वयं इससे अधिक जानते हैं ।' यह कह कर हर्ष चुप हो गए । भदन्त ने फिर कहा-'भाग्यशाली को दो बार बात कहने की आवश्यकता नहीं।

अष्टम उच्छ्वासः ४५१ पयोगस्तु निरुपयोगस्यास्य लघुनि गुरुणि वा कृत्य गुणवदायत्तः' इति । अथ तथा तस्मिन्नभिनन्दितप्रणये प्रीयमाणः पार्थिवस्तत्र तामुषित्व। विभावरीमुषसि च वसनालङ्कारादिप्रदानपरितोषितं विसर्ज्य निर्घातमा- चार्येण सह स्वसारमादाय प्रयाणकैः कतिपयैरेव कटकमनुजाह्नवि निविष्टं प्रत्याजगाम् । तत्र च राज्यश्रीप्राप्तिव्यतिकरकथां कथयत एव प्रणयिभ्यो रविरपि ततार गगनतलम् । बहलमधुपङ्कपङ्किलः पङ्कजाकर इव संचुकोच चक्र- वाकवल्लभो वासरः । प्रकीर्णानि नवरधिरसारुणवर्णानि लोकालोकजूंषि यजूंषीव कुपितयाज्ञवल्क्यवक्त्रवान्तानि निजवपुषि पूषा पापमूंषि पुनरपि संजहार जालकानि रोचिषाम् । क्रमेण च समुपोढ्यमानमांसलरागरो- चिष्णुरुष्णांशुरुष्णीषबन्धसहजचूडामणिरिव वृकोदरकरपुटोत्पाटितः, प्रत्यग्रशोणितशोणाङ्गरागरौद्रो द्रौणायनस्य रुद्रभिक्षादानशौण्डपुरमथन- मद्यषण्डोऽपि चक्रवाकप्रियो मुकुलितो भवति । रुधिररसवसेन चारुणवर्णा- नीति यजूंषीति वेदोपलक्षणार्थः । याज्ञवल्क्यः शाकल्यस्य मुनेर्वेदानधीत्याज्ञामकु- र्वन्गुरुणोपालब्धः 'वेदान्परित्यज' इति । ततस्तेन चत्वारोऽपि वेदा रक्तोपलिप्ता उद्दान्ताः । ते च शाकल्यमुनिना स्वे वपुषि संक्रान्ता इति श्रुतिः । क्रमेणेत्यादावु- ष्णांशुर्मुहूर्तमेवंविधो दृश्यत इति संबन्धः । समुपोढ्यमानो वर्धमान इत्यर्थः । उष्णीषो बध्यते यत्र स उष्णीषबन्धो मस्तकः । वृकोदरो भीमसेनः । द्रौणायनोऽ- श्शत्थामा । अत्र कथा—अश्वत्थामा सौप्तिके हतपुत्रया द्रौपद्या भीमसेनोऽभ्यधायि मैं पहले ही अपने मन में इस शरीर को आपके गुणों के समर्पित कर चुका हूं। किसी उपयोग में न आने वाला यह शरीर छोटे या बड़े जिस काम में इसका उपयोग हो सके आपके अधीन है।' इस प्रकार दिवाकरमित्र से अभिनन्दित होकर हर्ष उस रात को वहाँ रहे । अगले दिन वस्त्र, अलंकार आदि देकर निर्घात को विदा किया । तब आचार्य और राज्यश्री को साथ लेकर कुछ पड़ाव करते हुए गंगा के किनारे अपने कटक में लौट आए । कटक में राज्यश्री के मिलने की कथा को प्रेमीजन सुन-सुना रहे थे कि सूर्य भी आकाश को पार कर गए । चक्रवाकों को प्रिय लगने वाला दिन मधु के पंक की भाँति कलछहूँ वर्ण के कमल-समूह की तरह संकुचित हो गया । सूर्य ने नये रुधिर के समान लाल वर्ण वाली, लोकालोक पर्वत तक फैली हुई, पाप का क्षय करने वाली अपनी किरणों के जाल को पुनः अपने शरीर में सिकोड़ लिया । जैसे कुपित याज्ञवल्क्य के मुख से वान्त यजुष मन्त्रों को शाकल्य ने पुनः पान कर किया था। क्रम से सूर्य की लाली मांस की लाली के समान और बढ़ी और वह ऐसा जान पड़ने लगा कि भीमसेन के द्वारा निकाली गई

मुक्तमुण्डसिरानाडिरुधिरपूरणशोणितकपिलः, कपालकर्पर इव च पैतामहः, पितृवधरुषितरामरागरचितः, पृथुविकटकार्तवीर्यांसकूटकुट्टाककुठारतुण्ड- तष्टदुष्टक्षत्रियकण्ठकुहररुधिरकुल्याप्रणालसहस्रपूरितो ह्रद इव दूररोधी रौधिरो भयनिगूढकरचरणमुण्डमण्डलाकृतिर्गुरुगरुडनखपञ्जराक्षेपक्षपण- क्षिप्तक्षतजोक्षितो व्यसुर्विभावसुः, कमठ इव च लोठ्यमानः, नभस्यरुण- गर्भमांसपिण्ड इव च खण्डिमानमानीयतः, नियतकालातिपातदूयमान- दाक्षायणीक्षिप्तः, धातुतर इव च सुमेरोरसुरवधाभिचारचरुपचनपिशुनः, शोणितक्वाथकषायितकुक्षिरतिविसंकटः, कटाह इव च बार्हस्पत्यः, सद्यो- गलितगजदानवदेहलोहितोपलेपभीषणः, मुखमण्डलाभोग इव महाभैरवस्य यद्यश्वत्थाम्नः शिरश्शिखा नानीयते तदाहं जीवितं त्यजामीति । ततोऽहमेवं करो- मीति प्रतिज्ञायान्तं भीमं दृष्ट्वा व्यासाश्रमस्थो रणश्रान्तो घृताभ्यक्तोऽश्वत्थामा शस्त्राभावाद्विषीकाः संमन्त्र्य ब्राह्ममस्त्रं भीमवधाय ददौ। एकाकिनश्च भ्रातुर्गमना- न्प्रीतेनार्जुनेन कृष्णसहितेन तमेवानुसरता ब्रह्मशिरोऽस्त्रं मुमुचे । तदवसरागतैश्च नारदाद्यैर्मध्यस्थ्यैर्भूत्वाक्तं द्रौणेरस्त्रमभिमन्य प्रियाया गर्भे पतत्विति अर्जुनेनाप्या- त्मीयेऽस्त्रे संहृते भीमोऽश्वत्थाम्नः सहजं मूर्धमणिमुच्चीय नातिचिरेणाजगामेति । मुक्तं त्यक्तम् । मुण्डं शिरः । सिरा नाड्यः, रुधिरवादिन्यो नाड्यः, कुट्टाकश्छेदनशीलः । कुठारतुण्डं कुठारधारा । आक्षेपक्षपणमुत्क्षिप्य परित्यागः । क्षितं निःसृतम् । लोठ्य- मानः परिभ्रमन् । नियतकालातिपातः प्रलयागमः । दाक्षायणी काली । पिशुनः नये रक्त के लाल अगराग से रोद्र, अश्वत्थामा के ललाट पर सहज उत्पन्न हुई मणि हा । अथवा वह ब्रह्मा के मस्तकरूपी उस खप्पर की भाँति लग रहा था जिसे भिक्षा लेने के लिए शिव ने काटकर बहती हुई शिराओं के रक्त से भर दिया था। अथवा वह पितृवध से कुपित परशुराम द्वारा निर्मित दूर तक फैला हुआ रुधिर का ह्रद था जो सहस्रार्जुन के चौड़े और विकट कन्धों के चीरने वाले कुठार की धार से काटे हुए दुष्ट क्षत्रियों के गले से निकलती हुई रुधिर की सहस्रों प्रणालियों से भरा गया था। अथवा सूर्य का वह गोला गरुड के नखों से क्षतविक्षत, भय के मारे हाथ-पैर-मुण्डी सिकोड़े हुए विगत-प्राण विभावसु कछुए के आकाश में लुढ़कते हुए लोथड़े की तरह दिखाई पड़ रहा था। अथवा गर्भ की नियत अवधि के बीतने से दुःखी विनता के द्वारा आकाशमें टुकड़े करके फेंके हुए उस अण्डे की तरह लग रहा था जिसके भीतर गर्भ की दशा में अरुण का अपूर्ण मांसपिण्ड हो । अथवा वह गैरिकतट सुमेरु था जिसे प्रलय के अवसर में काली ने तोड़ डाला था । अथवा वह बृहस्पति के उस कटाह की तरह था जिसमें असुरों के नाश के लिए अभिचार कर्म करते हुए वे शोणित के क्वाथ में चरु पका रहे थे । अथवा डाक सूर्य की वह झाँकी महाभैरव के उस मुखमण्डल की तरह थी जो तुरन्त मारें हुए गजासुर के

अष्टम उच्छ्वासः ४५३ मुहूर्तमदृश्यत । जलनिधिजलप्रतिबिम्बितरविबिम्बराजिभास्वराभ्राव- लम्बिनी गृहीतार्द्रमांसभरेव चाबभासे वासरावसानवेला वेतालनिभा । ज्वलत्संध्यारागरज्यमानजलप्रवाहः पुनरिव पुराणपुरुषपीवरोरुसंपुटपिष्ट- मधुकैटभरुधिरपटलपाटलवपुरभवदधिपतिरर्णसाम् । समवसिते च संध्या- समये समनन्तरमपरिमितयशःपानतृपिताय मुक्ताशैलशिलाचषक इव निजकुलकीर्त्या, कृतयुगकरणोद्यतायादिराजरजतशासनमुद्रानिवेश इव राज्यश्रिया, सकलद्वीपजिगीषाचलिताय श्वेतद्वीपद्रूत इव चायत्या, श्वेत- भानुरुपानीयत निशया नरेन्द्रायेति भद्रमोम् ॥ इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृतौ हर्षचरितेऽष्टम उच्छ्वासः । सूचकः । वेतालोऽपि गृहीतार्द्रमांसभरो भवति । पटलं समूहः । समवसिते निवृत्ते । संध्यासमये निशया । नरेन्द्राय श्वेतभानुरुपानीयतोपायनीकृत इति संबन्धः । आदिराजस्य मनोः, वैन्यस्य वा । मुद्रानिवेशो राज्याधिकारमहामुद्रा । चलिताय निर्गताय । आयत्याऽऽगामिशुभदैवेनेति भद्रमोम् ॥ दुर्बोधे हर्षचरिते संप्रदायानुरोधतः । गूढार्थोन्मुद्रणां चक्रे शंकरो विदुषां कृते ॥ इति महाकविचूड़ामणिशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेतेऽष्टम उच्छ्वासः । टपकते हुए लोहू से भीषण दीखता है । दिन के अवसान में सन्ध्या, जो जल में प्रतिबिम्बित सूर्यमण्डल की किरणों से लाल मेघों में अवलम्बित हो रही थी, उस वैताल के साथ चिमटी जान पड़ती थी जिसने अभी कच्चा मांस खाया हो । संध्या की लाली से रञ्जित जलप्रवाह वाला समुद्र उस प्रकार लाल हो उठा जैसे विष्णु की मोटी जाँघ के बीच में दले हुए मधु-कैटभ के रुधिर से पहले कभी लाल हो गया था । सन्ध्या का विकराल समय ज्यों ही समाप्त हुआ त्यों ही रजनी हर्ष के लिये चन्द्रमा का उपहार लेकर आई, मानों अपने कुल की कीर्ति ही साक्षात् अपरिमित यश के प्यासे संगमरमर का मधुपात्र लायी हो, अथवा स्वयं राजलक्ष्मी सतयुग की स्थापना के लिये उद्यत उसके लिये चाँदी की गोल शासनमुद्रा लायी हो । अथवा उसके भाग्योदय की अधिष्ठात्री देवी ने सब द्वीपों की दिग्विजय के लिए कूच करते हुए उसकी सेवा में श्वेतद्वीप का प्रतिनिधि दूत भेजा हो । इस प्रकार उस रात्रि में शुभ चन्द्रोदय मालूम पड़ा । हर्षचरित हिन्दी अनुवाद अष्टम उच्छ्वासं समाप्त ।