हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४८ : हर्षचरितम् : सकललोककवलावेलेहलम्पटा बहला वहंलिहा लेढि लोहिताक्षिता चिताङ्गारकाली कालरात्रिजिह्वा जीवितानि जीविनाम् । शशिरमशिक्षिता च भगवतः सर्वभूतभुजो बुभुक्षा मृत्योः । अतिद्रुतवाहिनी चानित्यता नदी । क्षणिकाश्च महाभूतग्रामगोष्ठयः । रात्रिषु भङ्गुराणि पात्रयन्त्रपञ्जरदारूणि देहिनाम् । अशुभशुभावेशविवशा विशरारवः शरीरनिर्माणपरमाणवः । छिदुरा जीवनबन्धनपाशतन्त्रीतन्तवः । सर्वमात्मनोऽनीश्वरं विश्वं नश्वरम् । एवमवधृत्य नात्यर्थमेवार्हसि मेधाविनि मृदुनि मनसि तमः प्रसरं दातुम् । एकोऽपि प्रतिसंख्यानक्षण आधारीभवति धृतेः अपि च दूरगते- ऽपि हि शोके नन्विदानीमपेक्षणीय एवायं ज्येष्ठः पितृकल्पो भ्राता भवत्या गुरुः । इतरथा को न बहु मन्येत कल्याणरूपमीदृशं संकल्पमत्रभवत्याः काषायग्रहणकृतम् । अखिलमनोज्वरप्रशमनकारणं हि भगवती प्रव्रज्या । ज्यायः खल्विदं पदमात्मवताम् । महाभागस्तु भिनत्ति मनोरथमधुना । बहला दीर्घा गौश्च । उक्तं च—'बहलाः कृत्तिका गावः' इति च । वहंलिहा छिद्रान्वे- षिणी, वहंलिहा च गौर्वत्सस्य भवति । देहिनां शरीरवतां जीवाः प्राणिन एव बन्धनपाशतन्त्रीतन्तवः । आत्मनोऽनीश्वरं न स्वायत्तम् । परतन्त्रमित्यर्थः । प्रति- संख्यानं विवेककुशला मतिः । दूरगते परंपरा रूढे । ज्येष्ठो भ्रातेत्याद्युत्तरोत्तरं साभिप्रायं व्याख्येयम् । के समान कालजिह्वा प्राणियों के जीवन चाट रही है जैसे गाय बछड़े को । समस्त प्राणियों को चट कर जाने वाले भगवान् मृत्युदेव की भूख कभी नहीं बुझती । अनित्यता रूपी नदी तेजी से बह रही है । पंचमहाभूतों की पंचायतें क्षण भर ही रहती हैं । साधु जैसे दिन में कमण्डलु रखने के लिए लकड़ियों को जोड़ कर पिंजड़ा बनाते हैं और रात को उसे खोल डालते हैं वैसा ही यह शरीर का यंत्र है । शरीर के परमाणु पुण्य और पाप के अनुसार विवश होकर एक दूसरे का घात करते हैं । जीव को बंधन में बांधने वाले पाश की डोरी के तन्तु एक दिन अवश्य टूटते हैं । सारा नश्वर संसार परतंत्र है । हे मेधावनि, ऐसा जान कर अपने सुकुमार मन में अन्धकार को न फैलने दो । विवेक का एक क्षण भी धृति के लिए बड़ा सहारा होता है । शोक के कम होने पर भी अब यह पितृतुल्य तुम्हारा ज्येष्ठ भ्राता ही तुम्हारा गुरु है, अन्यथा कौन ऐसा है जो काषायग्रहण के लिए आपके ऐसे कल्याणरूप संकल्प की सराहना न करे। प्रव्रज्या ही सब प्रकार के मानसिक ज्वरों को शान्त करने का उपाय है । मनस्वी के लिए यह उत्तम कार्य है । इस समय महाभाग (हर्ष) तुम्हारे मनोरथ विफल करते हैं। जो वे आदेश दें वही तुम्हें