भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 492, कुल 506 में से

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अष्टम उच्छ्वासः ४४७ घटनघटीयन्त्रराजिरज्जवः सर्वपञ्चजनानाम्। पञ्चमहाभूतपञ्चकुलाधिष्ठि- तान्तःकरणव्यवहारदर्शननिपुणाः सर्वंकषा विषमा धर्मराजस्थितयः। क्षणमपि क्षममाणा गलन्त्यायुष्कलाकलनकुशला निलये निलये काल- नालिकाः। जगति सर्वजन्तुजीवितोपहारपातिनी संचरति झटिति चण्डिका यमाज्ञा। रटन्त्यनवरतमखिलप्राणिप्रयाणप्रकटनपटवः प्रेतपति- पटहाः। प्रतिदिशं पर्यटन्ति पेटकैः प्रतप्तलोहलोहिताक्षाः कालकूट- कान्तिकालकायाः कालपाशपाणयः कालपुरुषाः। प्रतिभवनं भ्रमन्ति भीषणकिंकरकरघटितयमघटापुटपुटुटंकारभयंकराः सर्वसत्त्वसंघसंहर- णाय घोराघातघोषणाः। दिशि दिशि वहन्ति बहुचिताधूमधूसरितप्रेत- पतिपताकापटुपतितगृध्रदृष्टयः शोककृतकोलाहलाकुलकुटुम्बिनीविकीर्ण- केशकलापशबलशवशिबिकासहस्रसंकुलाः किलकिलायमानश्मशानशि- विरशिवाशावकाः परलोकावसथपथिकसार्थप्रस्थानविशिखा वीथयः। स्युः पुमांसः पञ्चजनाः पुरुषाः पूरुषा नरः॥' इति। पञ्चकुलोऽध्यक्षः। अन्तःकरणं मनः। कला भागाः, कलनं संख्यानम्। नालिका होराः। चण्डिका भीषणा, रौद्रदेवताभेदश्च। पेटकैः समूहैः। घोषणा राजाज्ञया पश्चादिसंबद्धः पटहादिशब्दो दिशि दिश्येवंविधा रीतिर्विधेयेति। विशिखा वीथयः रथ्या मार्गा वहन्तीति संगतिः। कुटुम्बिन्योऽपहेलाः। शिबिका वाहनम्। श्मशानमेव शिविरं येषां ते। घूम रही है। पंचमहाभूतों के द्वारा जितने मानस व्यवहार हो रहे हैं वे सब यमराज के विषम अनुशासन से नियंत्रित होकर विलय को प्राप्त हो जाते हैं। घर-घर में आयु को नापने की घड़ियां लगी हुई हैं जो एक-एक क्षण का हिसाब रखती हैं। सब प्राणियों के प्राणों के उपहार लेने के लिए यमराज की भीषण आज्ञा चारों ओर घूम रही है। समस्त प्राणियों के प्रस्थान की सूचना देने वाले यमराज के नगाड़े निरन्तर बज रहे हैं। तपे हुए लोहे के समान लाल आँखों वाले विष की भाँति काले शरीर वाले कालपुरुष हाथों में काल- पाश लिये झुण्ड के झुण्ड चारों ओर प्रत्येक नगर में घूम रहे हैं। हर घर में यमराज के भयंकर दूत यमघण्टा बजा कर सब जीवों के संहरण के लिए घोर घोषणा कर रहे हैं। हर दिशा में परलोक के यात्रियों की पगडंडियां बनी हुई हैं, जहाँ चिता के निकलते हुए धूम से मलिन यमराज की पताकाओं पर गीध अपनी दृष्टि डाले हुए हैं, जिन पर शोक से रुदन करती हुई व्याकुल विधवाओं के टूट कर बिखरे केशों से शबलित अर्थियाँ जा रही हैं, जहाँ मरघट की झाड़ियों में सियारियों के बच्चे चिखा रहे हैं। काकुत्स्थि की चिता के कोयलों