भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 491, कुल 506 में से

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पृष्ठ 491

४४६ हर्षचरितम् दोषचक्रवर्तिनः कार्श्यश्वासप्रलापोपद्रवसहस्रस्य दीर्घरोगस्यासद्ग्रहस्य सकललोकक्षयधूमकेतोर्जीवितापहारवक्षस्त्वाक्षणरुचेरनभ्रवज्रपातस्य स्फुर- दनवद्यविद्याविद्युद्द्योतमानानि गहनग्रन्थगूढगर्भग्रहणगम्भीराणि भूरि- काव्यकथाकठोराणि बहुशास्त्रोद्वहनदृढन्ति विदुषामपि हृदयानि नालं सोढुमापातं किमुत नवमालिकाकुसुमकोमलानां सरसबिसतन्तुदुर्बल- कमबलानां हृदयम् । एवं सति सत्यव्रते ! वद् किमत्र क्रियते, कतम उपालभ्यते, कस्य पुर उच्चैराक्रन्द्यते, हृदयदाहि दुःखं वा ख्याप्यते ? सर्वमक्षिणी निमील्य सोढव्यममूढेन मर्त्यधर्मणा । पुण्यवति ! पुरातन्यः स्थितय एताः केन शक्यन्तेऽन्यथाकर्तुम् । संसरन्त्यो नक्तंदिवं द्राघीयस्यो जन्मजरामरण- दोषचक्रवर्ती, चक्रवर्ती च सार्वभौमः, उपद्रवो बाधा, व्याधेरुपर्यन्त्यो व्याधिश्च । उक्तं च—'व्याधेरुपरि यो व्याधिर्भवत्युत्तरकालजः । उपक्रमविरोधित्वात्स ह्युपद्रव उच्यते ॥' इति । दीर्घरोगः क्षयादिः । असद्ग्रहोऽनर्थासक्तिः, धूमकेतुश्च । अशोभनो गृहः । न विद्यमाना क्षणमपि रुचिर्योजनाभिलाषः, क्षणरुचिस्तडित् । स्फुरन्त्याः प्रकाशमानाया अनवद्याया विद्याया विद्युता किंचिन्मात्रज्ञानेन विद्युदपि सकृदेव स्फुरति । तथा गहनानां दुरवग्रहाणां ग्रन्थानां ये विषमतमाः प्रदेशास्तेषां गुप्तो यो गर्भः तद्ग्रहणेन गम्भीराणि । पुण्यवति, पुरातन्य इत्यादौ । ध्वनिश्च्छायाजन्मजरामरणघटनान्येव घटीयन्त्र- राज्या रज्जवः । पञ्चजना मानुषाः । 'मनुष्या मानुषा मर्त्या मनुजा मानवा नराः । सांस और बड़बड़ाहट उत्पन्न करता है। यह समस्त लोकों का क्षय करने वाला दुष्ट ग्रह धूमकेतु है । प्राणों का अपहरण करने वाला बिजली एवं मेघ से रहित यह वज्रपात है । अनिन्द्य विद्याओं के प्रकाश से चमकने वाले, शास्त्रों के गहन तत्त्व को समझने से गम्भीर, अनेक काव्यकथाओं को जानने से कठोर, बहुत से शास्त्र का अभ्यास करने वाले विद्वानों के हृदय भी शोक को नहीं सह सकते, तो नवमालिका के फूलों के सदृश कोमल मृणाल- तन्तु की भाँति दुर्बल अबलाओं के हृदय की तो बात ही क्या ! अतएव हे सत्यव्रते, तुम्हीं कहो अब क्या किया जाय ? किसे उलाहना दें ? किसके आगे जोर-जोर से रोवें ? किसे हृदय का जलाने वाला दुःख कहें ? मनुष्य को सब कुछ आँखें मूंद कर सहना चाहिए । हे पुण्यवती, इन पुरानी स्थितियों को कौन मेंट सकता है ? सभी मनुष्यों के लिए रात-दिन, जन्म, जरा, मृत्यु रूपी रहट की घड़ियों की लम्बी धाक

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