हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 490, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम उच्छ्वासः ४४५ सहचरो विनायकः, अयमबुधसेवितो ग्रहवर्गः, अयमयोगसमुत्थो ज्योतिःप्रकारः, अयं स्नेहाद्वायुप्रकोपः, मानसादग्निसंभवः, आर्द्रभावा- द्रजःक्षोभः, रसादभिशोषः, रागात्कालपरिणामः । तदस्याजस्रास्र- स्राविणो हृदयमहाव्रणस्य बहलदोषान्धकारलब्धप्रवेशप्रसरस्य प्राण- तस्करस्य शून्यताहेतोर्महाभूतग्रामघातकस्य सकलविग्रहक्षपणदक्षस्य मारयतीति विनायकः, विनायको विघ्नो वा, गणपतिश्च विनायकः। बुधः पण्डितः, ग्रहभेदश्च बुधः। ग्रहो व्यसनम् , सूर्यादिश्च। अयोगोऽनुकूलं दैवम् , चित्तवृत्ति- निरोधाभावश्च। ज्योतिःप्रकारोऽग्निभेदः, परं ज्ञानं च। स्नेहः प्रीतिः, पुष्टिहेतुश्च घृतादिः। वायुप्रकोप उन्मादोऽत्र। मानसं चेतः, देवसरश्च। आर्द्रभावो वत्सल- त्वम् , सरसत्वं च। रजो गुणविशेषो धूलिश्च। रसः प्रीतिः, रसायनं च। रागोऽभि- ष्वङ्गः, लौहित्यं च। कालोऽन्तकः, कृष्णश्च। तदस्तेत्यादौ। तत्तस्मादस्य शोकस्य पारं विदुषामपि हृदयानि सोढुं नालम् , किं पुनरबलानां हृदयमिति संबन्धः । अजस्रंसदा। अस्रं बाष्पः, रक्तं च। व्रणं च रक्तं स्रवति। एवमुत्तरत्रापि ज्ञेयम् । बहलदोषा बहवोऽपगुणाः, कृष्णपक्षरात्रयश्च। अन्धकारो मोहः, तमश्च। शून्यता किंकर्तव्यतामूढता। महाभूतग्रामो जन्तुसमूहः तद्घातकश्चायं, महान्तो भूताः प्राणिनो यस्मिन् । ग्रामे जनपदसमूहे तस्य यो घातकः स शून्यताया जनरहि- तस्य हेतुर्भवति। विग्रहः शरीरम् , विरोधश्च। दोषचक्रे मुख्यतया वर्तते यः स (त्रिदोषजन्य व्याधि या सबका नाश करने वाला) है, जो अनल के सदृश है। यह वह विनायक (गणेश या मार डालने वाला) है जो शिव (शंकर या श्रेय) के साथ नहीं रहता। यह वह ग्रहों का समूह है जिसमें बुध (ग्रहविशेष या पण्डित) नहीं रहता। यह दुर्भाग्य से उत्पन्न हुआ एक प्रकार का अग्नि है। यह स्नेह से उत्पन्न होने वाला वायुप्रकोप या उन्माद है। मानस से उत्पन्न अग्नि है। वात्सल्य से उत्पन्न होने वाला रजोगुण का क्षोभ है (अथवा आर्द्रता के कारण धूल का मर जाना है)। यह अनुराग से होने वाला शोषण है (जो शरीर को क्षीण कर देता है)। राग से उत्पन्न होने वाली परिणामस्वरूप मृत्यु है (अथवा लाली से होने वाला कृष्ण वर्ण का परिणाम है)। यह हृदय का महाव्रण (नासूर) है, जो सदा आँसू का रक्त बहाता रहता है। यह प्राणों का वह तस्कर है जो दोषों के घने अन्धकार में प्रवेश करता है। यह महाभूतों (क्षिति आदि पांच) के ग्राम का घातक है, जो शून्यता (निर्जनता या निश्चेतनता) की अवस्था का कारण है। यह दोषों का सम्राट् है जो समस्त विग्रहों (शरीर या कलहों) को नष्ट करने में चतुर है। यह एक बड़ा रोग है जो दुबलापन,