भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 489

४४४ हर्षचरितम् कुतो विज्ञापनम्। इयं हि शुचामसहातां व्यापारयन्ती हतदैवदत्ता च दशा शिथिलयति विनयम्। अबलानां हि प्रायशः पतिरपत्यं चावलम्बनम्। उभयविकालानां तु दुःखानलेन्धनायमानं प्राणितमशालीनत्वमेव केवलम्। आर्यागमनेन च कृतोऽपि प्रतिहतो मरणप्रयत्नः। यतः काषायग्रहणाभ्य- नुज्ञयानुगृह्यतामय मपुण्यभाजनं जनः' इति। जनाधिपस्तु तदाकर्ण्य तूष्णीमेवावतिष्ठत्। अथाचार्यः सुधीरमभ्यधात्-'आयुष्मति ! शोको हि नाम पर्यायः पिशाचस्य, रूपान्तरमाक्षेपस्य, तारुण्यं तमसः विशेषणं विषस्य, अनन्तकः प्रेतनगरनायकः, अयमनिर्वृतिधर्मा दहनः, अयमक्षयो राज- यक्ष्मा, अयमलक्ष्मीनिवासो जनार्दनः, अयमपुण्यप्रवृत्तः क्षपणकः, अयमप्रतिबोधो निद्राप्रकारः, अयमनलसधर्मा संनिपातः, अयमशिव- प्राणितं जीवितम् । अशालीनत्वं धाष्टर्यम् । आक्षेपस्यापस्मारस्य । अनन्तान्कायति रावयतीत्यनन्तकः । अनिर्वृतिरस्वा- स्थ्यम् , निर्वाणाभावश्च । अक्षयश्चिरस्थायी, क्षयरहितश्च । जनान्दर्यति पीडयतीति जनार्दनः, कृष्णश्च । अपुण्यप्रवृत्तः पापप्रवृत्तः । क्षपणको यः क्षपयति, नग्नाटकरुश्च । प्रतिबोधो विवेकः, स्वापादुत्थानं च । निद्रां प्रकिरति हिनस्ति निद्राप्रकारः । कर्म- ण्यण् । निद्राविशेषश्च मोहरूपः । अनलेनाग्निना सधर्मा सदृशः । अलसलक्षणो धर्मं आलस्यं यस्य सोऽलसधर्मा, नालसधर्माऽनलसधर्मा । सम्यङ्निपातयति घातयति यः । त्रिदोषजो व्याधिश्व स संनिपातः । शिवः श्रेयः, हरश्च शिवः । विशेषेण नयति की बात दूर है। शोक को दुःसह बना देने वाली दैव के द्वारा की गई यह मेरी दशा नम्रता को शिथिल कर रही है। प्रायः अबलाओं के जीवित रहने का अवलम्बन पति होता है या सन्तान । जो इन दोनों से हीन हैं उनके लिए दुःखाग्नि के इन्धन के रूप में जीवित रहना केवल निर्लज्जता ही है। आर्य के आने से मरण का प्रयत्न निष्फल चला गया, इसलिए इस पुण्यहीन जन को काषाय वस्त्र धारण करने की अनुज्ञा मिले।' तब दिवाकरमित्र ने धीरे स्वर में कहा- 'आयुष्मति, शोक पिशाच का ही दूसरा नाम है, वातव्याधि (अपस्मार) का ही दूसरा रूप है, अंधकार का यौवन है और विष का ही विशेष प्रकार है। यह प्राणों का वियोग न करने वाला यमराज है। कभी न बुझने वाली अग्नि है। कभी न समाप्त होने वाला राजयक्ष्मा है। यह जन को पीड़ित करने वाला (जनार्दन, श्लेष से कृष्ण) है जो लक्ष्मी का नहीं। यह वह क्षपणक (सबका नाश करने वाला या क्षपणक साधुविशेष) है, जो अपुण्य कार्यों में लगा हुआ है या किसी अपुण्य से पहुँच पड़ता है। यह ऐसी नींद है जिससे कोई जागता नहीं। यह ऐसा सन्निपात