भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 506 में से

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पृष्ठ 488

अष्टम उच्छ्वासः ४४३ मन्त्रकोशसाधनप्रवृत्तस्याक्षमालामिव राजधर्मस्य, समुद्गालंकारभूतां संख्यालेख्यपट्टिकामिव कुबेरकोशस्य । पश्यंश्चैतां विस्मयमाजगाम मन- सा सुचिरम् । आचार्यस्तु तामुद्धृत्य बबन्ध बन्धुरे स्कन्धभागे भूपतेः । अथ नरपतिरपि प्रतिप्रीतिमुपदर्शयन्प्रत्यवादीत्—'आर्य ! रत्नानामीह- शानामनर्हाः प्रायेण पुरुषाः । तपःसिद्धिरियमार्यस्य देवताप्रसादो वा । के च वयमिदानीमात्मनोऽपि किमुत ग्रहणस्य प्रत्याख्यानस्य वा । दर्शनात्प्रभृति प्रभूतगुरुगुणगणहृतेन हृदयेन परवन्तो वयम् । संक- ल्पितमिदमामरणादार्योपयोगाय शरीरम् । अत्र कामचारो वः कर्तव्या- नाम्' इति । समतिक्रान्ते च कियत्यपि काले गते चैकावलीवर्णनालापे लोकस्या- नन्तरं लब्धविश्रम्भा राज्यश्रीस्ताम्बूलवाहिनीं पत्रलतामाहूयोपांशु किमपि कर्णमूले शनैरादिदेश । दर्शितविनया च पत्रलता पार्थिवं व्यज्ञापयत्— 'देव ! देवी विज्ञापयति न स्मराम्यार्यस्य पुरः कदाचिदुच्चैर्वचनमपि । निजकरः । चक्षूरागः प्रीतिस्तया विहसतिका नर्महासः । मन्त्रः कर्तव्यावधारणम् । कोशो गञ्जः । साधनं हस्त्यश्वादि । तेन प्रवृष्टाचरितस्य मन्त्रसमूहाराधनप्रस्तु- तस्य । समुद्गः सागरः, सह मुद्रया च यो वर्तते । बन्धुरे हृद्ये । प्रत्याख्यानस्य प्रतिषेधस्य । परवन्तोऽन्यायत्ताः । उपांशु गुप्तम् । दुर्लक्ष्य हो रही थी, मानों वह पृथिवी का प्रीतिजन्य नर्महास हो । मन्त्र, कोश और साधन में प्रवृत्त राजधर्म की अक्षमाला थी । वह कुबेर के कोष की संख्या बताने वाली मानों लेख्यपट्टिका थी, जो मुद्रा और अलङ्कारों से सुशोभित थी। राजा उसे देखते हुए देर तक आश्चर्य में पड़े रहे । आचार्य ने उसे उठाकर राजा के निम्नोन्नत स्कन्धभाग में बाँध दिया । तब राजा ने भी प्रेम प्रदर्शित करते हुए कहा—'आर्य, ऐसे रत्न प्रायः मनुष्यों को नहीं मिलते, यह तो आर्य की तपःसिद्धि है, या देवता का प्रसाद हो। जब से हमने आपको देखा है तभी से आपके महान् गुणों से हमारा हृदय आपके वशीभूत है । जीवनपर्यन्त आर्य के उपयोग के लिए इस शरीर का संकल्प करता हूँ। यथेष्ट कार्य के लिए आज्ञा करें।' कुछ समय बीतने पर जब एकावली के सम्बन्ध की चर्चा समाप्त हुई और राज्यश्री कुछ आश्वस्त हुई तब उसने अपनी ताम्बूलवाहिनी पत्रलता को पास बुलाकर कान में धीरे से कुछ कहा । विनय को प्रदर्शित करती हुई पत्रलेखा ने हर्ष से विनती की—'देव, देवी निवेदन करती हैं कि आर्य के सामने कभी भी सिर उठा कर बात नहीं की, विज्ञापन

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