हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४२ हर्षचरितम् न्मीलयन्निमीलयंश्च चक्षुः कथमपि प्रयत्नेन ददर्श सर्वाशापूरणीं पङ्क्ती- कृतामिव दिङ्नागकरशीकरसंहतिम्, घनमुक्तां शारदीमिव लेखीकृतां ज्योत्स्नाम्, प्रकटपदकचिह्नां संचारवीथीमिव बालेन्दोर्नििश्चलीभूतां सप्त- र्षिमालामिव हस्तमुक्ताम्, अभिभूतसकलभुवनभूषणभूतिप्रभावामिवै- शानीं शशिकलाम्, धवलतागुणपरिगृहीतां कान्तिमिव निर्गतां क्षीरराशेः, अनेकमहामहीभृत्परम्परागतां गङ्गामिव दुर्गतिहराम्, अनवरतस्फुरित- तरलांशुकां पुरःसरपताकामिव महेश्वरभावागमस्य, घनसारशुद्धां दन्तप- ङ्क्तिमिवाभिमुखस्येश्वरस्य, वरमनोरथपूरणसमर्थां स्वयंवरस्रजमिव भुवन- श्रियः, निजकरपल्लवावरणदुर्लक्ष्यां चक्षूरागविहसतिकामिव वसुधायाः,
आशा आस्थाः, दिशश्च । घनमुक्तां निरन्तरमौक्तिकां, मेघमुक्तां च । पदकं मध्यमणिः । पदमेव च पदकम् । हस्तमुक्ताम् । परिवर्तुलत्वाद्धस्ते यः स्थितिं न बध्नाति । हस्तो हस्तसंज्ञा वा, नक्षत्रं च हस्तः । सकलभुवनभूषणं कौस्तुभादिः, हरश्च । भूतिः समृद्धिः, भस्म च । गुणो धर्मः, तन्तुश्च । महीभृतो राजानः, पर्वताश्च । दुर्गतिर्दारिद्र्यम्, नरकादिगतिश्च । तरलो हारमध्यगतो मणिः, चञ्च- लश्च । अंशुका रश्मयः, उत्तरीयम् चांशुकम् । घनसारवच्छुक्लां कर्पूरवच्छुभ्राम्, निरन्तरदृढधवलां च । अभिमुखस्य प्रतिमुखमागच्छतः, दन्तपङ्क्तिश्च मुखस्याभितो भवति । वरः श्रेष्ठः, जामाता च । निजाः कराः सहजा रश्मयः, स्वकश्च हस्तो
और खुलने लगीं । किसी प्रकार बड़े प्रयत्न से उसे देखा । सब दिशाओं को भर देने वालो पंक्ति के रूप में एकत्रित की हुई बह मानों दिग्गजों की सूँड़ से निकली हुई शीकरसंहति हो, घने मोतियों को गूँथकर बनाई हुई बह मानों शरत्कालीन ज्योत्स्ना की मेघमुक्त रेखा हो । वह मानों बालचन्द्रमा के संचरण करने की विधि हो, या हाथ से गिरकर (या हस्त नक्षत्र से मुक्त होकर) स्थिर हुई सप्तर्षिमाला हो, या समस्त भुवन के भूषणों के ऐश्वर्य को अपने प्रभाव से अभिभूत कर देने वाली वह मानों शिव के ललाट की चन्द्रकला हो, या धवलता गुण को लेकर हुई क्षीरसमुद्र की बह मानों कान्ति हो । दुर्गति (दुर्दशा या दरिद्रता) को दूर करने वाली गङ्गा के समान वह अनेक महीभृतों (राजाओं या पर्वतों) की कुलपरम्परा से आयी हुई थी । साम्राज्यलाभ के आगे-आगे चलने वाली निरन्तर फहराती हुई मानों पताका थी । सामने आते हुए शिव की कपूर की भाँति श्वेत मानों दन्तपंक्ति हो, भुवनलक्ष्मी की वर (श्रेष्ठ पुरुष या विवाह करने वाले) के मनोरथ को पूर्ण करने में समर्थ मानों स्वयंवर की माला हो । अपनी ही किरणों के आवरण से वह