भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 486

अष्टम उच्छ्वासः ४४१ महीयसि विसर्पति रश्मिमण्डले युगपद्धवलायमानेषु दिङ्मुखेषु मुकुलि- तलतावधूतकण्ठितैरामूलाद्विकसितमिव तरुभिः, अभिनवमृणाललुब्धैर्धा- वितमिव धुतपक्षपुटपटलधवलितगगनं वनसरसीहंसयूथैः, स्फुटितमिव भरवशविशीर्यमाणधूलिधवलैर्गर्भभेदसूचितसूचीसंचयशुचिभिः केतकी- बाटैः, उल्लसितदलदन्तुराभिः प्रबुद्धमिव कुमुदिनीभिः, विधुतसितस- टाभारभरितदिक्षकैश्चलितमिव केसरिकुलैः, प्रहसितमिव सितदशनां- शुमालालोकलिप्यमानवनं वनदेवताभिः, विकसितमिव शिथिलितकुसु- मकोशकेसराट्टहासनिरङ्कुशं काशकाननैः, भ्रान्तमिव संभ्रमभ्रमितबाल- पल्लवपरिवेश्वेतायमानैश्चमरीकदम्बकैः, प्रसृतमिव स्फायमानफेनिलतर- लतरतरङ्गोद्वारिणा गिरिनदीपूरेण, अपरतारागणलोभमुदितेनोदितमिव विकचमरीचिचक्राक्रान्तककुभा पूर्णचन्द्रेण, प्रक्षालित इव दावानलधूलि- धूसरितदिगन्तो दिवसः, पुनरिव धौतान्यश्रुजलक्लिष्टानि नारीणां मुखानि । राजा तु मांसलैस्तस्याः संमुखैर्मयूखैराकुलीक्रियमाणं मुहुर्मुहुरु- महत्तरः सरसी । केतक्यो वृक्षभेदाः । काशास्तृणभेदाः । परिवेशः परिवलनम् । स्फायमाना वर्धमानाः । से दिशायें धवलित हो गईं । खिलती हुई लतावधुओं के लिए उत्कण्ठित होकर वृक्ष मानों नीचे तक विकसित हो गए । नये मृणालों के लोभी वनसरसियों के इस झुण्ड के झुण्ड अपने पंखों से आकाश को सफेद करते हुए मानों दौड़ पड़े । केतकी के समूह, भार के कारण जिनके पराग झड़ रहे थे और जिनके गर्भ से सफेद सूचियाँ निकल रही थीं, मानों फूट पड़े । खिले हुए दलों वाली कुमुदिनियाँ मानों जग पड़ीं । अनेक सिंह अपनी गर्दन के उज्ज्वल सटाभार को दिशाओं में झलते हुए मानों चल पड़े । वनदेवतायें अपने उज्ज्वल दाँतों की किरणों से वन को उल्लासित करती हुई मानों हँस पड़ीं । काश के वन फूल-गुच्छों से अट्टहास के रूप में निकलते हुए परागों द्वारा मानों खिल उठे । चमरी गायें अपने हिलते हुए बालव्यंजनों से वन को श्वेत करती हुई मानों घूम पड़ीं । बढ़ती हुई फेनिल और चंचल तरंगों के रूप में पहाड़ी नदी का प्रवाह मानों फैल गया । दूसरे तारों के लोभ से प्रसन्न पूर्णचन्द्र मानों किरणों से दिशाओं को आक्रान्त करता हुआ उदित हो गया । दावानल की धूल से मटमैला बना दिन मानों धुल गया । आँसू के जल से कलुषित स्त्रियों के मुख मानों फिर से धुल गए । राजा की आँखें उसकी सामने पड़ती हुई किरणों से चौंधिया गयीं और बन्द होने