हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४० हर्षचरितम् तान्कथमपि रसातलनिवासी वासुकिर्नाम विषमुचामीशः। स च तैर्मु- क्ताफलैः पातालतलेऽपि तारागणमिव दर्शयद्भिरैकावलीमकल्पयत्। चकार च मन्दाकिनीति नाम तस्याः। सा च भगवतः सोमस्य सर्वासामोष- धीनामधिपतेः प्रभावादत्यन्तविषघ्नी हिमामृतसंभवत्वाच्च स्पर्शेन सर्वस- त्त्वसंतापहारिणी बभूव। यतः स तां सर्वदा विषोष्मशान्तये वासुकिः पर्यधत्त। समतिक्रामति च कियत्यपि काले कदाचिन्नामैकावलीं तस्मान्नाग- राजान्नागार्जुनो नाम नागैरेवानीतः पातालतलं भिक्षुरभिक्षत लेभे च। निर्गत्य च रसातलात्त्रिसमुद्राधिपतये सातवाहननाम्ने नरेन्द्राय सुहृदे स ददौ ताम्। सा चास्माकं कालेन शिष्यपरम्परया कथमपि हस्तमुप- गता। यद्यपि च परिभव इव भवति भवादृशां दत्त्रिम उपचारस्तथाप्यो- षधिबुद्ध्या बुद्धिमता सर्वसत्त्वराशिरक्षाप्रवृत्तेन रक्षणीयशरीरेणायुष्मता विषरक्षापेक्षया गृह्यताम्' इत्यभिधाय भिक्षोरभ्याशवर्तिनश्चीवरपटान्तसं- यतां मुमोच तामेकावलीं मन्दाकिनीम्। उन्मुच्यमानाया एव यस्याः प्रभालेपिनि लब्धावकाशो विशदमहसि दानेन निर्वृत्तो दत्त्रिमः। अभ्याशो निकटः। रहने वाले नागराज वासुकि के हाथ लगे। उसने उन मुक्ताफलों को गूँथ कर एकलड़ी माला बनाई, जिसका नाम मन्दाकिनी रखा। वह एकलड़ी माला समस्त औषधियों के अधिपति भगवान् चन्द्रमा के प्रभाव से अत्यन्त विषघ्नी है और हिमरूपी अमृत से उत्पन्न होने के कारण समस्त प्राणियों की सन्तापहारिणी है। इसलिये विषज्वालाओं को शान्त रखने के लिए वासुकि सदा उसे पहने रहता है। कुछ समय के बाद कभी नागों से ही पाताल में लाये गये नागार्जुन नाम के किसी भिक्षु ने वासुकि से उस माला को माँगकर प्राप्त कर लिया। पाताल से निकल कर नागार्जुन ने तीन समुद्रों के अधिपति अपने मित्र सातवाहन नाम के राजा को वह एकावली माला प्रदान की और वही माला किसी प्रकार शिष्यपरम्परा द्वारा हमारे हाथ आई। यद्यपि आपको किसी वस्तु का देना अपमान है तथापि औषधि समझकर विष से अपनी रक्षा के लिए आप कृपया इसे स्वीकार करें।' यह कहकर उन्होंने शिष्य के चीवर वस्त्रों में लेकर वह मन्दाकिनी राजा को दी। निकालते ही उस माला की उज्ज्वल किरणें अवकाश पाकर फैल गयीं। उसके प्रकाश