हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 484, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्युभारभरितान्तःकरणा करुणं काहलेन स्वरेण कतिचित्कालमतिदीर्घं रुरोद । विगते च मन्युवेगे वन्हेः समीपादाक्षिप्य भ्रात्रा नीता निकटवर्तिनि तरुतले निषसाद । शनैराचार्यस्तु तथा हर्ष इति विज्ञाय विवर्धितादरः सुतरां मुहूर्तमिव- वातिबाह्य निभृतसंज्ञाज्ञापितेन शिष्येणोपनीतं नलिनीदलैः स्वयमेवादाय नम्रो मुखप्रक्षालनायोदकमुपनिन्ये । नरेन्द्रोऽपि सादरं गृहीत्वा प्रथममन- वरतरोदनाताम्रं चिरप्रवृत्ताश्रुजलजालं रक्तपङ्कजमिव स्वसुर्मुखम्प्रक्षाल्यत्प- श्चादात्मनः । प्रक्षालितमुखशशिनि च महीपाले सर्वतो निःशब्दः संब- भूव सकलो लिखित इव लोकः । ततो नरेन्द्रो मन्दमन्दमब्रवीत्स्वसारम्— ‘वत्से ! वन्दस्वात्रभवन्तं भदन्तम् । एष ते भर्तुर्हृदयं द्वितीयमस्माकं च गुरुः’ इति । राजवचनात्तु राजदुहितरि पतिपरिचयश्रवणोद्घातेन पुन- रानीतनेत्राम्भसि नमन्त्यामाचार्यः प्रयत्नधारितागमागतबाष्पाम्भःसंभार- भज्यमानधैर्यार्द्रलोचनः किंचित्परावृत्तनयनो दीर्घं निःशश्वास । स्थित्वा च क्षणमेकं प्रदर्शितप्रश्रयो मृदुवादी मधुरया वाचा व्याजहार—‘कल्या- प्रकटनं यस्माद्वाष्पोत्पीडादिति समासः । काहलेन महता । उद्घातः प्रस्तावः । यतोऽयं राजलोकश्चिरं रुदित्वा नाद्यापि रोदनान्निवर्तते तत्स्नानविधिः क्रियतामिति । बाष्प से रुँधे हुए गले वाली और अत्यन्त शोकभार से भरे अन्तःकरण वाली राज्यश्री कुछ देर तक जोर-जोर से रोती रही । शोक का वेग जब कम हुआ तो हर्ष उसे अग्नि के पास से दूर हटा कर निकटवर्ती वृक्ष के नीचे ले गए । आचार्य दिवाकरमित्र ने हर्ष को उस प्रकार जान, क्षण भर ठहर, धीरे से अपने शिष्य को इशारा से आज्ञा दी, और उसके द्वारा लाए गए जल को कमलिनीपत्र के खदोने में लेकर स्वयं आदर और नम्रता के साथ राजा को अर्पित किया । राजा ने भी आदर के साथ उसे लेकर पहले निरन्तर रोने से लाल, देर तक आँसू बहने से रक्तकमल के समान राज्यश्री के नेत्र धोए और फिर अपने । राजा के मुँह धो लेने पर सब लोग चित्रलिखित की भाँति निःशब्द हो गए । तब राजा ने धीरे धीरे राज्यश्री से कहा— 'वत्से, भदन्त को प्रणाम करो । ये तुम्हारे पति के दूसरे हृदय और हमारे गुरु हैं।' हर्ष के वचन से राजपुत्री के नेत्र पति का परिचय सुनने के प्रस्ताव से फिर छलछला उठे और उसने प्रणाम किया । तब आचार्य ने भी निकलते हुए आँसुओं को प्रयत्न से रोक कर धैर्य छूटने से फिर भी आर्द्र होते हुए नेत्र को कुछ मोड़ कर जोर से सांस लिया । मृदुवादी ने