भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

४३६ हर्षचरितम् .

प्रत्यानयतेव कुतोऽपि जीवितमाह्लादकेन हस्तसंस्पर्शेन सहसैव समुन्मि- मील राज्यश्रीः । तथा चासंभावितागमनस्याचिन्तितदर्शनस्य सहसा प्राप्तस्य भ्रातुः स्वप्नदृष्टदर्शनस्येव कण्ठे समाश्लिष्य तत्कालाविर्भावनि- र्भरेणाभिभूतसर्वात्मना दुःखसंभारेण निर्दयं नदीमुखप्रणालाभ्यामिव मुक्ताभ्यां स्थूलप्रवाहमुत्सृजन्ती बाष्पवारि विलोचनाभ्याम् 'हा तात, हा अम्ब, हा सख्यः' इति व्याहरन्ती, मुहुर्मुहुरुच्चैस्तरां च समुद्भूतभगिनीस्ने- हसद्भावभारभावितमन्युना मुक्तकण्ठमतिचिरं विक्रुश्य 'वत्से, स्थिरा भव त्वम्' इति भ्रात्रा करस्थगितमुखी समाश्वास्यमानापि, 'कल्याणि, कुरु वचनमग्रजस्य गुरोः' इत्याचार्येण याच्यमानापि, 'देवि, न पश्यसि देव- स्यावस्थाम् । अलमतिरुदितेन' इति राजलोकेनाभ्यर्थ्यमानापि, 'स्वामिनि, भ्रातरमवेक्षस्व' इति परिजनेन विज्ञाप्यमानापि, 'दुहितर्, विश्रम्य पुनरा- रटितव्यम्' इति निवार्यमाणापि बान्धववृद्धाभिः, 'प्रियसखि, कियद्रोदिषि, तूष्णीमास्स्व । दृढं दूयते देव' इति सखीभिरनुनीयमानापि, चिरं संभा- वितानेकदुःसहदुःखनिबर्हणबाष्पोत्पीडपीड्यमानकण्ठभागा, प्रभूत- परिहार्य कटकम् । तथा चेत्यादौ साकरोदिति संबन्धः । दुःखनिवहस्य निर्वहणं

या मानों उदित होते हुए चन्द्र की ठंडी किरणें जिसमें पड़ गई हों ऐसी चन्द्रकान्त की चूड़ामणि को मस्तक में बाँध रहा हो । या प्राणों को कहीं से लौटा रहा हो । भाई हर्ष के आगमन की पहले से कोई सम्भावना न थी और उनके दर्शन की बात सोची भी न थी कि वे आ गए, मानों स्वप्न में दिखाई पड़ रहे हों । राज्यश्री उनके कण्ठ में जोर से लिपटकर तत्काल प्रकट हुए सबको अभिभूत कर देनेवाले अपने दुःखभार से नदी की जल निकलने वाली नाली की तरह आँसू के स्थूल प्रवाह को अपने नेत्रों से बहाती हुई विलाप करने लगी- 'हा पिता, हा माता, हा सखियाँ !' बार-बार बहिन के स्नेह से शोक उत्पन्न हो जाने के कारण हर्ष भी देर तक मुक्तकंठ से रोते रहे और कहा—'अब धीरज धरो, अपने को सम्हालो ।' इस प्रकार भाई ने हाथ से मुँह ढँकी हुई उसे सान्त्वना दी । आचार्य ने याचना की—'कल्याणि, बड़े भाई की बात मानो ।' राजाओं ने अभ्यर्थना की—'देवी, देव की अवस्था को नहीं देख रही हो ? अत्यन्त रोना व्यर्थ है ।' परिजनों ने निवेदन किया—'स्वामिनी, भाई को देखो ।' सगी बुढाओं ने मना करते हुए कहा— 'पुत्री, विश्राम करके फिर रो लेना ।' सखियों ने अनुनय किया—'कितना रोओगी, चुप हो जाओ, देव को कष्ट हो रहा है ।' फिर भी बहुत दिनों के अनुभूत दुःसह दुःख के कारण