हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 482, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंचरणानामयमञ्जलिः । परः परलोकप्रयाणप्रणामोऽयं मातः । मरणसमये कस्माल्लवलिके, हलहलो बलीयानानन्दमयो हृदयस्य मे । हृष्यन्त्युच्चै- रोमाञ्चमुञ्चि किमङ्गीकृत्याङ्गानि । वामलिके, बामेन मे स्फुरितमक्ष्णा । वृथा विरससि वयस्य वायस, वृत्ते क्षीरिणि क्षयो क्षयो क्षीणपुण्यायाः पुरः। हरिणि, हेषितमिव हयानामुत्तरतः । कस्येदमातपत्रमुच्चमत्र पादपान्तरेण प्रभावति, विभाव्यते । कुरङ्गिके, केन सुगृहीतनाम्रो नाम गृहीतममृत- मयमार्थस्य । देवि, दिष्ट्या वर्धसे देवस्य हर्षस्यागमनमहोत्सवेन ।' इत्येतच्च श्रुत्वा सत्वरमुपससर्प । ददर्श च मुह्यन्तीमग्निप्रवेशायोद्यतां राजा राज्यश्रियम् । आललम्बे च मूर्च्छामीलितलोचनाया ललाटं हस्तेन तस्याः ससंभ्रमम् । अथ तेन भ्रातुः प्रेयसः प्रकोष्ठबद्धानामोषधीनां रसविरासमिव प्रत्यु- जीवनक्षमं क्षरता वमतेव पारिहार्यमणीनामचिन्त्यं प्रभावममृतमिव नख- चन्द्ररश्मिभिरुद्विरता बभ्रतेव चन्द्रोदयच्युतशिशिरशीकरं चन्द्रकान्तचूडा- मणि मूर्धनि मृणालमयाङ्गुलिनेवातिशीतलेन निर्वापयता दह्यमानं हृदयं हलहलक उत्कण्ठा । एवमादिना निमित्तेन हर्षागमनं सूच्यते । अथंत्यादौ—भ्रातुर्हस्तसंस्पर्शेन राज्यश्रीः सहसैव समुन्मिमीलेति संबन्धः । यह अञ्जलि है । हे माता, परलोक जाने का यह अन्तिम प्रणाम है । अरी लवलिका, मरने के समय मेरे हृदय में यह आनन्द से भरी उत्कण्ठा क्यों उत्पन्न हो रही है ? क्या सोचकर मेरे रोमांचित अंग प्रसन्न हो रहे हैं ? अरी वामनिका, मेरी बाईं आँख फड़क रही है । मित्र वायस, क्षीणपुण्य मेरे सामने दुधारे वृक्ष पर बैठ कर व्यर्थ काँव-काँव मचा रहे हो । अरी हरिणी, उत्तर की ओर घोड़ों की हिनहिनाहट सी सुन पड़ रही है । अरी प्रभावती, किसका यह ऊँचा छत्र वृक्षों की ओट में झलक रहा है ? अरी कुरङ्गिका, सुगृहीतनाम आर्य का किसने अमृतमय नाम लिया ? हे देवी, देव हर्ष के इस आगमन- महोत्सव से तुम्हारी भाग्यवृद्धि हो।' यह सुनकर हर्ष पास पहुँच गए और मूर्च्छित-सी अग्निप्रवेश के लिए तैयार राज्यश्री को देखा । झट दौड़कर मूर्च्छा से बन्द आँखों वाली उस राज्यश्री के ललाट को हाथ से ओढ़ लिया । इस अवस्था में बड़े भाई के आह्लादित करने वाले हाथ के स्पर्श से राज्यश्री की आँखें सहसा खुल गयीं । हर्ष के हाथ का वह स्पर्श ऐसा लगा मानों पुनः जीवित कर देने में समर्थ प्रकोष्ठ में बँधी हुई औषधियों का रस उड़ेल रहा हो । या मानों नख की ज्योत्स्नाओं के रूप में कङ्कण की मणियों का अमृत के समान अचिन्त्य प्रभाव उगल रहा हो।