भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 506 में से

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यदयमादिशति तदेवानुष्ठेयम् । यदि भ्रातेति यदि ज्येष्ठ इति यदि वत्स- इति यदि गुणवानिति यदि राजेति सर्वथा स्थातव्यमस्य नियोगे' इत्यु- क्त्वा व्यरंसीत् । उपरतवचसि च तस्मिन्निजगाद नरपतिः—'आर्यमपहाय कोऽन्य एवमभिदध्यात् । अनभ्यर्थितदैवनिर्मिता हि विषमविपदवलम्बनस्तम्भा भवन्तो लोकस्य । स्नेहार्द्रमूर्तयो मोहान्धकारध्वंसिनश्च धर्मप्रदीपाः । किंतु प्रणयप्रदानदुर्ललिता दुर्लभमपि मनोरथमतिप्रीतिरभिलषति । धीरस्यापि धार्ष्ट्यमारोपयति हृदयलघिमलङ्घितमतिवल्लभत्वम् । युक्ता- युक्तविचारशून्यत्वाच्च शालीनमपि शिक्षयन्ति स्वार्थतृष्णाः प्रागल्भ्यम् । अभ्यर्थनाया रक्षन्ति च जलनिधय इव मर्यादामार्याः । दत्तमेव च शरीरमिदमनभ्यर्थितेनं प्रथममेवातिथ्याय माननीयैन भवता मह्यम् । अतः किंचिदर्थये भदन्तमियं नः स्वसा बाला च बहुदुःखखिदिता च सर्वकार्यावधीरणपरोधेनापि यावल्लालनीया नित्यम् । अस्माभिश्च भ्रातृव- धापकारिरिपुकुलप्रलयकरणोद्यतस्य बाहोर्विधेयैर्भूत्वा सकललोकप्रत्यक्षं प्रतिज्ञा कृता । पूर्वावमानाभिभवमसहमानैरर्पित आत्मा कोपस्य । अनभ्यर्थितेत्यादौ ध्वनिच्छायावगन्तव्या । धीरस्य गम्भीरस्य । लङ्घितमाक्रा- न्तम् । शालीनमष्टष्टत्वम् । भदन्तेति बौद्धकर्मविशेषपूजावचनम् । अवधीरणमुपे- करना चाहिए। यदि इन्हें ज्येष्ठ, या भ्राता, या शिष्य, या गुणी, या राजा समझते हो तो सर्वथा इनके आदेश का पालन करना चाहिए।' इतना कहकर आचार्य चुप हो गए। उनके चुप हो जाने पर राजा ने कहा—'आर्य के सिवा कौन इस प्रकार के वचन कहेगा ? आर्य समस्त संसार को विषम विपत्तियों में सहारा देने वाले स्तम्भ हैं जिसे देव ने प्रार्थना के बिना ही बना दिया है। स्नेह से आर्द्र, और मोह रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाले दीपक हैं, किन्तु प्रणय के लाभ से बढ़ी हुई प्रीति दुर्लभ मनोरथ की भी अभिलाषा करने लगती है । हृदय के संकोच का अतिक्रमण करने वाला अतिप्रेम धीर पुरुष को भी धृष्ट कर देता है। युक्तायुक्त के विचार से रहित स्वार्थ की तृष्णाएँ शील वाले व्यक्ति को प्रगल्भ बना देती हैं। आर्य लोग समुद्र की तरह अभ्यर्थना की मर्यादा रखते हैं। माननीय आर्य ने याचना के बिना ही इस शरीर को आतिथ्य के लिए मुझे अर्पित किया है इसलिए सेवा में एक याचना करता हूँ। काम हरज करके भी अनेक कष्टों से दुखी मेरी इस छोटी बहिन का लालन करना मेरा कर्त्तव्य है। किन्तु भाई के वध का बदला लेने के लिए शत्रुकुल के नाश की प्रतिज्ञा मैं सब लोगों के समक्ष कर चुका हूँ। पहले शत्रु द्वारा किए गए अपने अपमान के अभिभव को न सह सकने के कारण हम २६ ह० च०

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