हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
यदयमादिशति तदेवानुष्ठेयम् । यदि भ्रातेति यदि ज्येष्ठ इति यदि वत्स- इति यदि गुणवानिति यदि राजेति सर्वथा स्थातव्यमस्य नियोगे' इत्यु- क्त्वा व्यरंसीत् । उपरतवचसि च तस्मिन्निजगाद नरपतिः—'आर्यमपहाय कोऽन्य एवमभिदध्यात् । अनभ्यर्थितदैवनिर्मिता हि विषमविपदवलम्बनस्तम्भा भवन्तो लोकस्य । स्नेहार्द्रमूर्तयो मोहान्धकारध्वंसिनश्च धर्मप्रदीपाः । किंतु प्रणयप्रदानदुर्ललिता दुर्लभमपि मनोरथमतिप्रीतिरभिलषति । धीरस्यापि धार्ष्ट्यमारोपयति हृदयलघिमलङ्घितमतिवल्लभत्वम् । युक्ता- युक्तविचारशून्यत्वाच्च शालीनमपि शिक्षयन्ति स्वार्थतृष्णाः प्रागल्भ्यम् । अभ्यर्थनाया रक्षन्ति च जलनिधय इव मर्यादामार्याः । दत्तमेव च शरीरमिदमनभ्यर्थितेनं प्रथममेवातिथ्याय माननीयैन भवता मह्यम् । अतः किंचिदर्थये भदन्तमियं नः स्वसा बाला च बहुदुःखखिदिता च सर्वकार्यावधीरणपरोधेनापि यावल्लालनीया नित्यम् । अस्माभिश्च भ्रातृव- धापकारिरिपुकुलप्रलयकरणोद्यतस्य बाहोर्विधेयैर्भूत्वा सकललोकप्रत्यक्षं प्रतिज्ञा कृता । पूर्वावमानाभिभवमसहमानैरर्पित आत्मा कोपस्य । अनभ्यर्थितेत्यादौ ध्वनिच्छायावगन्तव्या । धीरस्य गम्भीरस्य । लङ्घितमाक्रा- न्तम् । शालीनमष्टष्टत्वम् । भदन्तेति बौद्धकर्मविशेषपूजावचनम् । अवधीरणमुपे- करना चाहिए। यदि इन्हें ज्येष्ठ, या भ्राता, या शिष्य, या गुणी, या राजा समझते हो तो सर्वथा इनके आदेश का पालन करना चाहिए।' इतना कहकर आचार्य चुप हो गए। उनके चुप हो जाने पर राजा ने कहा—'आर्य के सिवा कौन इस प्रकार के वचन कहेगा ? आर्य समस्त संसार को विषम विपत्तियों में सहारा देने वाले स्तम्भ हैं जिसे देव ने प्रार्थना के बिना ही बना दिया है। स्नेह से आर्द्र, और मोह रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाले दीपक हैं, किन्तु प्रणय के लाभ से बढ़ी हुई प्रीति दुर्लभ मनोरथ की भी अभिलाषा करने लगती है । हृदय के संकोच का अतिक्रमण करने वाला अतिप्रेम धीर पुरुष को भी धृष्ट कर देता है। युक्तायुक्त के विचार से रहित स्वार्थ की तृष्णाएँ शील वाले व्यक्ति को प्रगल्भ बना देती हैं। आर्य लोग समुद्र की तरह अभ्यर्थना की मर्यादा रखते हैं। माननीय आर्य ने याचना के बिना ही इस शरीर को आतिथ्य के लिए मुझे अर्पित किया है इसलिए सेवा में एक याचना करता हूँ। काम हरज करके भी अनेक कष्टों से दुखी मेरी इस छोटी बहिन का लालन करना मेरा कर्त्तव्य है। किन्तु भाई के वध का बदला लेने के लिए शत्रुकुल के नाश की प्रतिज्ञा मैं सब लोगों के समक्ष कर चुका हूँ। पहले शत्रु द्वारा किए गए अपने अपमान के अभिभव को न सह सकने के कारण हम २६ ह० च०
४५० हर्षचरितम् अतो नियुङ्क्तां कियन्तमपि कालमात्मानमार्योऽपि कार्ये मदीये । दीयता- मतिथये शरीरमिदम् । अद्यप्रभृति यावदयं जनो लघयति प्रतिज्ञाभारम्, आश्वासयति च तातविनाशदुःखविप्लवाः प्रजाः, तावदिमामत्रभवतः कथाभिश्च धर्म्याभिः, कुशलप्रतिबोधविधायिभिरुपदेशैश्च दूरापसारितर- जोभिः, शीलोपशमदायिनीभिश्च देशनाभिः, क्लेशप्रहाणहेतुभूतैश्च तथा- गतैर्दर्शनैः, अस्मत्पार्श्वोपयायिनीमेव प्रतिबोध्यमानामिच्छामि । इयं तु ग्रहीष्यति मयैव समं समाप्तकृत्येन काषायाणि । अर्थिजने च किमिव नातिसृजन्ति महान्तः । सुरनाथमात्मास्थिभिरपि यावत्कृतार्थमकरोद्धै- र्योदधिर्दधीचः । मुनिनाथोऽप्यनपेक्षितआत्मस्थितिरनुकम्प्येति कृत्वा कृपा- वानात्मानं वठरसत्त्वेभ्यः कतिकृत्वो न दत्तवान् । अतः परं भवन्त एव बहुतरं जानन्ति ।' इत्युक्त्वा तूष्णीं बभूव भूपतिः । भूयस्तु बभाषे भदन्तः- 'भव्या न द्विरुच्चारयन्ति वाचम् । चेतसा प्रथममेव प्रतिग्राहिता गुणास्तावकाः कायबलिमिमाम् । अमुना जनेनो- च्छणम् । विधेयेरायत्तैः । नियुक्तां स्वीकरोतु । देशनाभिः शिक्षाभिः । क्लेशा अविद्या- दयस्तेषां प्रहाणम् । तथागतैबौद्धैरात्मास्थिभिरपि । यावदित्यत्र यावच्छब्दोऽव- धारणे । मुनिनाथः सुगतः । वठरसत्त्वा जडप्राणिनः सिंहाद्याः । एवं किल श्रूयते- पुरा काचन सिंही प्रसवकाले बुभुक्षातुरा स्वशावकान्भक्षयितुं प्रवृत्ता, सौगतेन च समालोक्यातिकारुण्यात्स्वमांसप्रदानेन तस्मान्निवारितेति । भव्या भाग्यवन्तः । काय एव बलिहेतुत्वाद्विलिखिरिव कायबलिस्ताम् । अपने क्रोध के वशीभूत हैं। कुछ समय तक आर्य भी मेरे इस काम में सहायक हों । मैं आपका अतिथि हूँ, कृपया मुझे अपने शरीर का दान दें । आज से लेकर जब तक मैं अपनी प्रतिज्ञा के बोझ को हल्का न बनाऊँ, पिता की मृत्यु के दुःख से व्याकुल प्रजाओं को ढाढ़स न दूँ, तब तक मैं चाहता हूँ कि आप मेरे साथ ही रहने वाली मेरी बहिन को धार्मिक कथाओं से रजोगुणरहित कुशल को उत्पन्न करने वाले उपदेशों से, शील और शम देने वाली शिक्षाओं से, क्लेशों को मिटाने वाले भगवान् तथागत के सिद्धान्तों से समझाते रहें । जब मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लूँगा तो मेरे साथ ही यह भी काषाय ग्रहण करेगी । बड़े लोग प्रार्थी के लिए क्या नहीं दे डालते हैं ? धैर्य के समुद्र दधीचि ने इन्द्र को अपनी हड्डियाँ दे डाली थीं। क्या मुनिनाथ बुद्ध ने शरीर की कुछ परवाह न करके अनुकम्पावश अपने आपको कितनी बार हिंस्र पशुओं के लिए नहीं दे डाला ? उदाहरण तो आप स्वयं इससे अधिक जानते हैं ।' यह कह कर हर्ष चुप हो गए । भदन्त ने फिर कहा-'भाग्यशाली को दो बार बात कहने की आवश्यकता नहीं।
अष्टम उच्छ्वासः ४५१ पयोगस्तु निरुपयोगस्यास्य लघुनि गुरुणि वा कृत्य गुणवदायत्तः' इति । अथ तथा तस्मिन्नभिनन्दितप्रणये प्रीयमाणः पार्थिवस्तत्र तामुषित्व। विभावरीमुषसि च वसनालङ्कारादिप्रदानपरितोषितं विसर्ज्य निर्घातमा- चार्येण सह स्वसारमादाय प्रयाणकैः कतिपयैरेव कटकमनुजाह्नवि निविष्टं प्रत्याजगाम् । तत्र च राज्यश्रीप्राप्तिव्यतिकरकथां कथयत एव प्रणयिभ्यो रविरपि ततार गगनतलम् । बहलमधुपङ्कपङ्किलः पङ्कजाकर इव संचुकोच चक्र- वाकवल्लभो वासरः । प्रकीर्णानि नवरधिरसारुणवर्णानि लोकालोकजूंषि यजूंषीव कुपितयाज्ञवल्क्यवक्त्रवान्तानि निजवपुषि पूषा पापमूंषि पुनरपि संजहार जालकानि रोचिषाम् । क्रमेण च समुपोढ्यमानमांसलरागरो- चिष्णुरुष्णांशुरुष्णीषबन्धसहजचूडामणिरिव वृकोदरकरपुटोत्पाटितः, प्रत्यग्रशोणितशोणाङ्गरागरौद्रो द्रौणायनस्य रुद्रभिक्षादानशौण्डपुरमथन- मद्यषण्डोऽपि चक्रवाकप्रियो मुकुलितो भवति । रुधिररसवसेन चारुणवर्णा- नीति यजूंषीति वेदोपलक्षणार्थः । याज्ञवल्क्यः शाकल्यस्य मुनेर्वेदानधीत्याज्ञामकु- र्वन्गुरुणोपालब्धः 'वेदान्परित्यज' इति । ततस्तेन चत्वारोऽपि वेदा रक्तोपलिप्ता उद्दान्ताः । ते च शाकल्यमुनिना स्वे वपुषि संक्रान्ता इति श्रुतिः । क्रमेणेत्यादावु- ष्णांशुर्मुहूर्तमेवंविधो दृश्यत इति संबन्धः । समुपोढ्यमानो वर्धमान इत्यर्थः । उष्णीषो बध्यते यत्र स उष्णीषबन्धो मस्तकः । वृकोदरो भीमसेनः । द्रौणायनोऽ- श्शत्थामा । अत्र कथा—अश्वत्थामा सौप्तिके हतपुत्रया द्रौपद्या भीमसेनोऽभ्यधायि मैं पहले ही अपने मन में इस शरीर को आपके गुणों के समर्पित कर चुका हूं। किसी उपयोग में न आने वाला यह शरीर छोटे या बड़े जिस काम में इसका उपयोग हो सके आपके अधीन है।' इस प्रकार दिवाकरमित्र से अभिनन्दित होकर हर्ष उस रात को वहाँ रहे । अगले दिन वस्त्र, अलंकार आदि देकर निर्घात को विदा किया । तब आचार्य और राज्यश्री को साथ लेकर कुछ पड़ाव करते हुए गंगा के किनारे अपने कटक में लौट आए । कटक में राज्यश्री के मिलने की कथा को प्रेमीजन सुन-सुना रहे थे कि सूर्य भी आकाश को पार कर गए । चक्रवाकों को प्रिय लगने वाला दिन मधु के पंक की भाँति कलछहूँ वर्ण के कमल-समूह की तरह संकुचित हो गया । सूर्य ने नये रुधिर के समान लाल वर्ण वाली, लोकालोक पर्वत तक फैली हुई, पाप का क्षय करने वाली अपनी किरणों के जाल को पुनः अपने शरीर में सिकोड़ लिया । जैसे कुपित याज्ञवल्क्य के मुख से वान्त यजुष मन्त्रों को शाकल्य ने पुनः पान कर किया था। क्रम से सूर्य की लाली मांस की लाली के समान और बढ़ी और वह ऐसा जान पड़ने लगा कि भीमसेन के द्वारा निकाली गई
मुक्तमुण्डसिरानाडिरुधिरपूरणशोणितकपिलः, कपालकर्पर इव च पैतामहः, पितृवधरुषितरामरागरचितः, पृथुविकटकार्तवीर्यांसकूटकुट्टाककुठारतुण्ड- तष्टदुष्टक्षत्रियकण्ठकुहररुधिरकुल्याप्रणालसहस्रपूरितो ह्रद इव दूररोधी रौधिरो भयनिगूढकरचरणमुण्डमण्डलाकृतिर्गुरुगरुडनखपञ्जराक्षेपक्षपण- क्षिप्तक्षतजोक्षितो व्यसुर्विभावसुः, कमठ इव च लोठ्यमानः, नभस्यरुण- गर्भमांसपिण्ड इव च खण्डिमानमानीयतः, नियतकालातिपातदूयमान- दाक्षायणीक्षिप्तः, धातुतर इव च सुमेरोरसुरवधाभिचारचरुपचनपिशुनः, शोणितक्वाथकषायितकुक्षिरतिविसंकटः, कटाह इव च बार्हस्पत्यः, सद्यो- गलितगजदानवदेहलोहितोपलेपभीषणः, मुखमण्डलाभोग इव महाभैरवस्य यद्यश्वत्थाम्नः शिरश्शिखा नानीयते तदाहं जीवितं त्यजामीति । ततोऽहमेवं करो- मीति प्रतिज्ञायान्तं भीमं दृष्ट्वा व्यासाश्रमस्थो रणश्रान्तो घृताभ्यक्तोऽश्वत्थामा शस्त्राभावाद्विषीकाः संमन्त्र्य ब्राह्ममस्त्रं भीमवधाय ददौ। एकाकिनश्च भ्रातुर्गमना- न्प्रीतेनार्जुनेन कृष्णसहितेन तमेवानुसरता ब्रह्मशिरोऽस्त्रं मुमुचे । तदवसरागतैश्च नारदाद्यैर्मध्यस्थ्यैर्भूत्वाक्तं द्रौणेरस्त्रमभिमन्य प्रियाया गर्भे पतत्विति अर्जुनेनाप्या- त्मीयेऽस्त्रे संहृते भीमोऽश्वत्थाम्नः सहजं मूर्धमणिमुच्चीय नातिचिरेणाजगामेति । मुक्तं त्यक्तम् । मुण्डं शिरः । सिरा नाड्यः, रुधिरवादिन्यो नाड्यः, कुट्टाकश्छेदनशीलः । कुठारतुण्डं कुठारधारा । आक्षेपक्षपणमुत्क्षिप्य परित्यागः । क्षितं निःसृतम् । लोठ्य- मानः परिभ्रमन् । नियतकालातिपातः प्रलयागमः । दाक्षायणी काली । पिशुनः नये रक्त के लाल अगराग से रोद्र, अश्वत्थामा के ललाट पर सहज उत्पन्न हुई मणि हा । अथवा वह ब्रह्मा के मस्तकरूपी उस खप्पर की भाँति लग रहा था जिसे भिक्षा लेने के लिए शिव ने काटकर बहती हुई शिराओं के रक्त से भर दिया था। अथवा वह पितृवध से कुपित परशुराम द्वारा निर्मित दूर तक फैला हुआ रुधिर का ह्रद था जो सहस्रार्जुन के चौड़े और विकट कन्धों के चीरने वाले कुठार की धार से काटे हुए दुष्ट क्षत्रियों के गले से निकलती हुई रुधिर की सहस्रों प्रणालियों से भरा गया था। अथवा सूर्य का वह गोला गरुड के नखों से क्षतविक्षत, भय के मारे हाथ-पैर-मुण्डी सिकोड़े हुए विगत-प्राण विभावसु कछुए के आकाश में लुढ़कते हुए लोथड़े की तरह दिखाई पड़ रहा था। अथवा गर्भ की नियत अवधि के बीतने से दुःखी विनता के द्वारा आकाशमें टुकड़े करके फेंके हुए उस अण्डे की तरह लग रहा था जिसके भीतर गर्भ की दशा में अरुण का अपूर्ण मांसपिण्ड हो । अथवा वह गैरिकतट सुमेरु था जिसे प्रलय के अवसर में काली ने तोड़ डाला था । अथवा वह बृहस्पति के उस कटाह की तरह था जिसमें असुरों के नाश के लिए अभिचार कर्म करते हुए वे शोणित के क्वाथ में चरु पका रहे थे । अथवा डाक सूर्य की वह झाँकी महाभैरव के उस मुखमण्डल की तरह थी जो तुरन्त मारें हुए गजासुर के
अष्टम उच्छ्वासः ४५३ मुहूर्तमदृश्यत । जलनिधिजलप्रतिबिम्बितरविबिम्बराजिभास्वराभ्राव- लम्बिनी गृहीतार्द्रमांसभरेव चाबभासे वासरावसानवेला वेतालनिभा । ज्वलत्संध्यारागरज्यमानजलप्रवाहः पुनरिव पुराणपुरुषपीवरोरुसंपुटपिष्ट- मधुकैटभरुधिरपटलपाटलवपुरभवदधिपतिरर्णसाम् । समवसिते च संध्या- समये समनन्तरमपरिमितयशःपानतृपिताय मुक्ताशैलशिलाचषक इव निजकुलकीर्त्या, कृतयुगकरणोद्यतायादिराजरजतशासनमुद्रानिवेश इव राज्यश्रिया, सकलद्वीपजिगीषाचलिताय श्वेतद्वीपद्रूत इव चायत्या, श्वेत- भानुरुपानीयत निशया नरेन्द्रायेति भद्रमोम् ॥ इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृतौ हर्षचरितेऽष्टम उच्छ्वासः । सूचकः । वेतालोऽपि गृहीतार्द्रमांसभरो भवति । पटलं समूहः । समवसिते निवृत्ते । संध्यासमये निशया । नरेन्द्राय श्वेतभानुरुपानीयतोपायनीकृत इति संबन्धः । आदिराजस्य मनोः, वैन्यस्य वा । मुद्रानिवेशो राज्याधिकारमहामुद्रा । चलिताय निर्गताय । आयत्याऽऽगामिशुभदैवेनेति भद्रमोम् ॥ दुर्बोधे हर्षचरिते संप्रदायानुरोधतः । गूढार्थोन्मुद्रणां चक्रे शंकरो विदुषां कृते ॥ इति महाकविचूड़ामणिशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेतेऽष्टम उच्छ्वासः । टपकते हुए लोहू से भीषण दीखता है । दिन के अवसान में सन्ध्या, जो जल में प्रतिबिम्बित सूर्यमण्डल की किरणों से लाल मेघों में अवलम्बित हो रही थी, उस वैताल के साथ चिमटी जान पड़ती थी जिसने अभी कच्चा मांस खाया हो । संध्या की लाली से रञ्जित जलप्रवाह वाला समुद्र उस प्रकार लाल हो उठा जैसे विष्णु की मोटी जाँघ के बीच में दले हुए मधु-कैटभ के रुधिर से पहले कभी लाल हो गया था । सन्ध्या का विकराल समय ज्यों ही समाप्त हुआ त्यों ही रजनी हर्ष के लिये चन्द्रमा का उपहार लेकर आई, मानों अपने कुल की कीर्ति ही साक्षात् अपरिमित यश के प्यासे संगमरमर का मधुपात्र लायी हो, अथवा स्वयं राजलक्ष्मी सतयुग की स्थापना के लिये उद्यत उसके लिये चाँदी की गोल शासनमुद्रा लायी हो । अथवा उसके भाग्योदय की अधिष्ठात्री देवी ने सब द्वीपों की दिग्विजय के लिए कूच करते हुए उसकी सेवा में श्वेतद्वीप का प्रतिनिधि दूत भेजा हो । इस प्रकार उस रात्रि में शुभ चन्द्रोदय मालूम पड़ा । हर्षचरित हिन्दी अनुवाद अष्टम उच्छ्वासं समाप्त ।
परिशिष्टम् बाण-प्रशस्तयः १. श्लेषे केचन शब्दगुम्फविषये केचिद् रसे चापरेऽ- लङ्कारे कतिचित्सदर्थविषये चान्ये कथावर्णने । आः सर्वत्र गभीरधीरकविता विन्ध्याटवीचातुरी- सञ्चारी कविकुम्भिकुम्भभिदुरो बाणस्तु पञ्चाननः ॥ ( श्रीचन्द्रदेवस्य ) २. हेम्नो भारशतानि वा मदमुचां वृन्दानि वा दन्तिनां श्रीहर्षेण समर्पितानि कवये बाणाय कुत्राद्य तत् । या बाणेन तु तस्य सूक्तिनिकरैरुट्टङ्किताः कीर्तय- स्ताः कल्पप्रलयेऽपि यान्ति न मनाङ् मन्ये परिम्लानताम् ॥ ( रूय्यककृतव्यक्तिविवेकव्याख्याने ) ३. अर्थेश्वरं हन्त भजेऽभिनन्दं वागीश्वरं वाक्पतिराजमीडे । रसेश्वरं नौमि च कालिदासं बाणं तु सर्वेश्वरमानतोऽस्मि ॥ ( उदयसुन्दर्यां सोड्ढलस्य ) ४. परिशीलितेव सरसं कविराजैर्बहुभिरत्र वाग्देवी । बाणेन तु वैजात्यात् कथयति नामैव वाणीति ॥ ५. कादम्बरीसहोदर्या सुधया वै बुधे हृदि । हर्षाख्यायिकया ख्यातिं बाणोऽब्धिरिव लब्धवान् ॥ ६. शश्वद्बाणद्वितीयेन नमदाकारधारिणा । धनुषेव गुणाढ्येन निःशेषो रञ्जितो जनः ॥ ( त्रिविक्रमस्य ) ७. जाता शिखण्डिनी प्राग्यथा शिखण्डी तथाऽवगच्छामि । प्रागल्भ्यमधिकमाप्तुं वाणी बाणो बभूवेति ॥ ( गोवर्धनस्य )
परिशिष्टम् ८. हृदि लग्नेन बाणेन यन्मन्दोऽपि पदक्रमः । भवेत् कविकुरङ्गाणां चापलं तत्र कारणम् ॥ ६. सुबन्धुर्बाणभट्टश्च कविराज इति त्रयः । वक्रोक्तिमार्गनिपुणाश्चतुर्थो विद्यते न वा ॥ १०. सचित्रवर्णविच्छित्तिहारिणोरवनीपतिः । श्रीहर्ष इव संघट्टं चक्रे बाणमयूरयोः ॥ ( नवसाहसाङ्के ) ११. प्रतिकविभेदनबाणः कवितातरुगहनविहरणमयूरः । सहृदयलोकसुबन्धुर्जयति श्रीभट्टबाणकविराजः ॥ ( वीरनारायणचरिते ) १२. युक्तं कादम्बरीं श्रुत्वा कवयो मौनमाश्रिताः । बाणध्वनावन्ध्यायो भवतीति स्मृतियतः ॥ १३. रुचिरस्वरवर्णपदा रसभाववती जगन्मनो हरति । तत्किं तरुणी, नहि नहि, वाणी बाणस्य मधुरशीलस्य ॥ १४. सहर्षचरिता शश्वत्कृतकादम्बरीकथा । बाणस्य वाण्यनार्यैव स्वच्छन्दं भ्रमति क्षितौ ॥ १५. बाणं सत्कविगीर्वाणमनुबध्नाति कः कविः । सिन्धुमन्धुः किमन्वेति द्युमणिकतमो मणिः ॥ ( रघुनाथचरिते ) १६. शब्दार्थयोः समो गुम्फः पाञ्चाली रीतिरिष्यते । शिलाभट्टारिकावाचि बाणोक्तिषु च सा यदि ॥ १७. केवलोऽपि स्फुरन् बाणः करोति विमदान् कवीन् । किं पुनः क्लृप्तसन्धानपुलिन्ध्रकृतसन्निधिः ॥ ( धनपालस्य ) १८. दण्डीत्युपस्थिते सद्यः कवीनां कम्पतां मनः । प्रविष्टे त्वन्तरं बाणे कण्ठे वागेव रुध्यते ॥
शुद्धपत्रम् अशुद्धं शुद्धं पृष्ठं पंक्तिः निगूहन निगूहनैः ४ ६ नाटक नाटके ७ १४ हृदयस्थः स्मृतरपि हृदयस्थैः स्मृतैरपि ८ २६ वसना वसाना १६ २ गृहबुधि गृहबुधिं ३० १८ कुतूहलानलीयमान कुतूहलनिलीयमान ५१ २१ अभूत्यग्राम्यतया प्रभूत्यग्राम्यतया ५२ १८ शोकेनामीळ शोकेनाभीळ ६६ २२ सिद्धि सिद्धिं ७१ २ नासहन्तः नासहन्त ७४ ७ खरखरामयूखे खरखगमयूखे ७५ ४ गिरिकणिका गिरिकर्णिका ९० १० निमितम् निर्मितम् ११३ ५ रथ तुरग रथतुरग १५१ ४ तास्तूल ताम्बूल २०४ ६ दृषः दृर्षः २०९ ४ दपण दर्पण २२७ २ व्यतिरिक व्यतिरिक्तौ २२९ ७ निष्पृभान् निष्प्रभान् २४५ ४ पाश्च पार्श्व २५२ १३ स्कग्धै स्कन्धै २९० ३ हव इव २९३ ४. करीण करिण ३२० १० नाचरनश्चन्दनेन नाचरतश्चन्दनेन ३५१ २ सप्रेष्य संप्रैष्य " ८ निमित्त निमित्तं ३५३ ३ भारिकैर्महान भारिकैर्महान् ३६८ १ पनिषद पनिषदै ४१४ २ श्राम्यसदृिक्ष श्राम्यत्सद्दिक्ष " ५
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