हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 496, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम उच्छ्वासः ४५१ पयोगस्तु निरुपयोगस्यास्य लघुनि गुरुणि वा कृत्य गुणवदायत्तः' इति । अथ तथा तस्मिन्नभिनन्दितप्रणये प्रीयमाणः पार्थिवस्तत्र तामुषित्व। विभावरीमुषसि च वसनालङ्कारादिप्रदानपरितोषितं विसर्ज्य निर्घातमा- चार्येण सह स्वसारमादाय प्रयाणकैः कतिपयैरेव कटकमनुजाह्नवि निविष्टं प्रत्याजगाम् । तत्र च राज्यश्रीप्राप्तिव्यतिकरकथां कथयत एव प्रणयिभ्यो रविरपि ततार गगनतलम् । बहलमधुपङ्कपङ्किलः पङ्कजाकर इव संचुकोच चक्र- वाकवल्लभो वासरः । प्रकीर्णानि नवरधिरसारुणवर्णानि लोकालोकजूंषि यजूंषीव कुपितयाज्ञवल्क्यवक्त्रवान्तानि निजवपुषि पूषा पापमूंषि पुनरपि संजहार जालकानि रोचिषाम् । क्रमेण च समुपोढ्यमानमांसलरागरो- चिष्णुरुष्णांशुरुष्णीषबन्धसहजचूडामणिरिव वृकोदरकरपुटोत्पाटितः, प्रत्यग्रशोणितशोणाङ्गरागरौद्रो द्रौणायनस्य रुद्रभिक्षादानशौण्डपुरमथन- मद्यषण्डोऽपि चक्रवाकप्रियो मुकुलितो भवति । रुधिररसवसेन चारुणवर्णा- नीति यजूंषीति वेदोपलक्षणार्थः । याज्ञवल्क्यः शाकल्यस्य मुनेर्वेदानधीत्याज्ञामकु- र्वन्गुरुणोपालब्धः 'वेदान्परित्यज' इति । ततस्तेन चत्वारोऽपि वेदा रक्तोपलिप्ता उद्दान्ताः । ते च शाकल्यमुनिना स्वे वपुषि संक्रान्ता इति श्रुतिः । क्रमेणेत्यादावु- ष्णांशुर्मुहूर्तमेवंविधो दृश्यत इति संबन्धः । समुपोढ्यमानो वर्धमान इत्यर्थः । उष्णीषो बध्यते यत्र स उष्णीषबन्धो मस्तकः । वृकोदरो भीमसेनः । द्रौणायनोऽ- श्शत्थामा । अत्र कथा—अश्वत्थामा सौप्तिके हतपुत्रया द्रौपद्या भीमसेनोऽभ्यधायि मैं पहले ही अपने मन में इस शरीर को आपके गुणों के समर्पित कर चुका हूं। किसी उपयोग में न आने वाला यह शरीर छोटे या बड़े जिस काम में इसका उपयोग हो सके आपके अधीन है।' इस प्रकार दिवाकरमित्र से अभिनन्दित होकर हर्ष उस रात को वहाँ रहे । अगले दिन वस्त्र, अलंकार आदि देकर निर्घात को विदा किया । तब आचार्य और राज्यश्री को साथ लेकर कुछ पड़ाव करते हुए गंगा के किनारे अपने कटक में लौट आए । कटक में राज्यश्री के मिलने की कथा को प्रेमीजन सुन-सुना रहे थे कि सूर्य भी आकाश को पार कर गए । चक्रवाकों को प्रिय लगने वाला दिन मधु के पंक की भाँति कलछहूँ वर्ण के कमल-समूह की तरह संकुचित हो गया । सूर्य ने नये रुधिर के समान लाल वर्ण वाली, लोकालोक पर्वत तक फैली हुई, पाप का क्षय करने वाली अपनी किरणों के जाल को पुनः अपने शरीर में सिकोड़ लिया । जैसे कुपित याज्ञवल्क्य के मुख से वान्त यजुष मन्त्रों को शाकल्य ने पुनः पान कर किया था। क्रम से सूर्य की लाली मांस की लाली के समान और बढ़ी और वह ऐसा जान पड़ने लगा कि भीमसेन के द्वारा निकाली गई