भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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मुक्तमुण्डसिरानाडिरुधिरपूरणशोणितकपिलः, कपालकर्पर इव च पैतामहः, पितृवधरुषितरामरागरचितः, पृथुविकटकार्तवीर्यांसकूटकुट्टाककुठारतुण्ड- तष्टदुष्टक्षत्रियकण्ठकुहररुधिरकुल्याप्रणालसहस्रपूरितो ह्रद इव दूररोधी रौधिरो भयनिगूढकरचरणमुण्डमण्डलाकृतिर्गुरुगरुडनखपञ्जराक्षेपक्षपण- क्षिप्तक्षतजोक्षितो व्यसुर्विभावसुः, कमठ इव च लोठ्यमानः, नभस्यरुण- गर्भमांसपिण्ड इव च खण्डिमानमानीयतः, नियतकालातिपातदूयमान- दाक्षायणीक्षिप्तः, धातुतर इव च सुमेरोरसुरवधाभिचारचरुपचनपिशुनः, शोणितक्वाथकषायितकुक्षिरतिविसंकटः, कटाह इव च बार्हस्पत्यः, सद्यो- गलितगजदानवदेहलोहितोपलेपभीषणः, मुखमण्डलाभोग इव महाभैरवस्य यद्यश्वत्थाम्नः शिरश्शिखा नानीयते तदाहं जीवितं त्यजामीति । ततोऽहमेवं करो- मीति प्रतिज्ञायान्तं भीमं दृष्ट्वा व्यासाश्रमस्थो रणश्रान्तो घृताभ्यक्तोऽश्वत्थामा शस्त्राभावाद्विषीकाः संमन्त्र्य ब्राह्ममस्त्रं भीमवधाय ददौ। एकाकिनश्च भ्रातुर्गमना- न्प्रीतेनार्जुनेन कृष्णसहितेन तमेवानुसरता ब्रह्मशिरोऽस्त्रं मुमुचे । तदवसरागतैश्च नारदाद्यैर्मध्यस्थ्यैर्भूत्वाक्तं द्रौणेरस्त्रमभिमन्य प्रियाया गर्भे पतत्विति अर्जुनेनाप्या- त्मीयेऽस्त्रे संहृते भीमोऽश्वत्थाम्नः सहजं मूर्धमणिमुच्चीय नातिचिरेणाजगामेति । मुक्तं त्यक्तम् । मुण्डं शिरः । सिरा नाड्यः, रुधिरवादिन्यो नाड्यः, कुट्टाकश्छेदनशीलः । कुठारतुण्डं कुठारधारा । आक्षेपक्षपणमुत्क्षिप्य परित्यागः । क्षितं निःसृतम् । लोठ्य- मानः परिभ्रमन् । नियतकालातिपातः प्रलयागमः । दाक्षायणी काली । पिशुनः नये रक्त के लाल अगराग से रोद्र, अश्वत्थामा के ललाट पर सहज उत्पन्न हुई मणि हा । अथवा वह ब्रह्मा के मस्तकरूपी उस खप्पर की भाँति लग रहा था जिसे भिक्षा लेने के लिए शिव ने काटकर बहती हुई शिराओं के रक्त से भर दिया था। अथवा वह पितृवध से कुपित परशुराम द्वारा निर्मित दूर तक फैला हुआ रुधिर का ह्रद था जो सहस्रार्जुन के चौड़े और विकट कन्धों के चीरने वाले कुठार की धार से काटे हुए दुष्ट क्षत्रियों के गले से निकलती हुई रुधिर की सहस्रों प्रणालियों से भरा गया था। अथवा सूर्य का वह गोला गरुड के नखों से क्षतविक्षत, भय के मारे हाथ-पैर-मुण्डी सिकोड़े हुए विगत-प्राण विभावसु कछुए के आकाश में लुढ़कते हुए लोथड़े की तरह दिखाई पड़ रहा था। अथवा गर्भ की नियत अवधि के बीतने से दुःखी विनता के द्वारा आकाशमें टुकड़े करके फेंके हुए उस अण्डे की तरह लग रहा था जिसके भीतर गर्भ की दशा में अरुण का अपूर्ण मांसपिण्ड हो । अथवा वह गैरिकतट सुमेरु था जिसे प्रलय के अवसर में काली ने तोड़ डाला था । अथवा वह बृहस्पति के उस कटाह की तरह था जिसमें असुरों के नाश के लिए अभिचार कर्म करते हुए वे शोणित के क्वाथ में चरु पका रहे थे । अथवा डाक सूर्य की वह झाँकी महाभैरव के उस मुखमण्डल की तरह थी जो तुरन्त मारें हुए गजासुर के