भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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अष्टम उच्छ्वासः ४५३ मुहूर्तमदृश्यत । जलनिधिजलप्रतिबिम्बितरविबिम्बराजिभास्वराभ्राव- लम्बिनी गृहीतार्द्रमांसभरेव चाबभासे वासरावसानवेला वेतालनिभा । ज्वलत्संध्यारागरज्यमानजलप्रवाहः पुनरिव पुराणपुरुषपीवरोरुसंपुटपिष्ट- मधुकैटभरुधिरपटलपाटलवपुरभवदधिपतिरर्णसाम् । समवसिते च संध्या- समये समनन्तरमपरिमितयशःपानतृपिताय मुक्ताशैलशिलाचषक इव निजकुलकीर्त्या, कृतयुगकरणोद्यतायादिराजरजतशासनमुद्रानिवेश इव राज्यश्रिया, सकलद्वीपजिगीषाचलिताय श्वेतद्वीपद्रूत इव चायत्या, श्वेत- भानुरुपानीयत निशया नरेन्द्रायेति भद्रमोम् ॥ इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृतौ हर्षचरितेऽष्टम उच्छ्वासः । सूचकः । वेतालोऽपि गृहीतार्द्रमांसभरो भवति । पटलं समूहः । समवसिते निवृत्ते । संध्यासमये निशया । नरेन्द्राय श्वेतभानुरुपानीयतोपायनीकृत इति संबन्धः । आदिराजस्य मनोः, वैन्यस्य वा । मुद्रानिवेशो राज्याधिकारमहामुद्रा । चलिताय निर्गताय । आयत्याऽऽगामिशुभदैवेनेति भद्रमोम् ॥ दुर्बोधे हर्षचरिते संप्रदायानुरोधतः । गूढार्थोन्मुद्रणां चक्रे शंकरो विदुषां कृते ॥ इति महाकविचूड़ामणिशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेतेऽष्टम उच्छ्वासः । टपकते हुए लोहू से भीषण दीखता है । दिन के अवसान में सन्ध्या, जो जल में प्रतिबिम्बित सूर्यमण्डल की किरणों से लाल मेघों में अवलम्बित हो रही थी, उस वैताल के साथ चिमटी जान पड़ती थी जिसने अभी कच्चा मांस खाया हो । संध्या की लाली से रञ्जित जलप्रवाह वाला समुद्र उस प्रकार लाल हो उठा जैसे विष्णु की मोटी जाँघ के बीच में दले हुए मधु-कैटभ के रुधिर से पहले कभी लाल हो गया था । सन्ध्या का विकराल समय ज्यों ही समाप्त हुआ त्यों ही रजनी हर्ष के लिये चन्द्रमा का उपहार लेकर आई, मानों अपने कुल की कीर्ति ही साक्षात् अपरिमित यश के प्यासे संगमरमर का मधुपात्र लायी हो, अथवा स्वयं राजलक्ष्मी सतयुग की स्थापना के लिये उद्यत उसके लिये चाँदी की गोल शासनमुद्रा लायी हो । अथवा उसके भाग्योदय की अधिष्ठात्री देवी ने सब द्वीपों की दिग्विजय के लिए कूच करते हुए उसकी सेवा में श्वेतद्वीप का प्रतिनिधि दूत भेजा हो । इस प्रकार उस रात्रि में शुभ चन्द्रोदय मालूम पड़ा । हर्षचरित हिन्दी अनुवाद अष्टम उच्छ्वासं समाप्त ।