भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 495

४५० हर्षचरितम् अतो नियुङ्क्तां कियन्तमपि कालमात्मानमार्योऽपि कार्ये मदीये । दीयता- मतिथये शरीरमिदम् । अद्यप्रभृति यावदयं जनो लघयति प्रतिज्ञाभारम्, आश्वासयति च तातविनाशदुःखविप्लवाः प्रजाः, तावदिमामत्रभवतः कथाभिश्च धर्म्याभिः, कुशलप्रतिबोधविधायिभिरुपदेशैश्च दूरापसारितर- जोभिः, शीलोपशमदायिनीभिश्च देशनाभिः, क्लेशप्रहाणहेतुभूतैश्च तथा- गतैर्दर्शनैः, अस्मत्पार्श्वोपयायिनीमेव प्रतिबोध्यमानामिच्छामि । इयं तु ग्रहीष्यति मयैव समं समाप्तकृत्येन काषायाणि । अर्थिजने च किमिव नातिसृजन्ति महान्तः । सुरनाथमात्मास्थिभिरपि यावत्कृतार्थमकरोद्धै- र्योदधिर्दधीचः । मुनिनाथोऽप्यनपेक्षितआत्मस्थितिरनुकम्प्येति कृत्वा कृपा- वानात्मानं वठरसत्त्वेभ्यः कतिकृत्वो न दत्तवान् । अतः परं भवन्त एव बहुतरं जानन्ति ।' इत्युक्त्वा तूष्णीं बभूव भूपतिः । भूयस्तु बभाषे भदन्तः- 'भव्या न द्विरुच्चारयन्ति वाचम् । चेतसा प्रथममेव प्रतिग्राहिता गुणास्तावकाः कायबलिमिमाम् । अमुना जनेनो- च्छणम् । विधेयेरायत्तैः । नियुक्तां स्वीकरोतु । देशनाभिः शिक्षाभिः । क्लेशा अविद्या- दयस्तेषां प्रहाणम् । तथागतैबौद्धैरात्मास्थिभिरपि । यावदित्यत्र यावच्छब्दोऽव- धारणे । मुनिनाथः सुगतः । वठरसत्त्वा जडप्राणिनः सिंहाद्याः । एवं किल श्रूयते- पुरा काचन सिंही प्रसवकाले बुभुक्षातुरा स्वशावकान्भक्षयितुं प्रवृत्ता, सौगतेन च समालोक्यातिकारुण्यात्स्वमांसप्रदानेन तस्मान्निवारितेति । भव्या भाग्यवन्तः । काय एव बलिहेतुत्वाद्विलिखिरिव कायबलिस्ताम् । अपने क्रोध के वशीभूत हैं। कुछ समय तक आर्य भी मेरे इस काम में सहायक हों । मैं आपका अतिथि हूँ, कृपया मुझे अपने शरीर का दान दें । आज से लेकर जब तक मैं अपनी प्रतिज्ञा के बोझ को हल्का न बनाऊँ, पिता की मृत्यु के दुःख से व्याकुल प्रजाओं को ढाढ़स न दूँ, तब तक मैं चाहता हूँ कि आप मेरे साथ ही रहने वाली मेरी बहिन को धार्मिक कथाओं से रजोगुणरहित कुशल को उत्पन्न करने वाले उपदेशों से, शील और शम देने वाली शिक्षाओं से, क्लेशों को मिटाने वाले भगवान् तथागत के सिद्धान्तों से समझाते रहें । जब मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लूँगा तो मेरे साथ ही यह भी काषाय ग्रहण करेगी । बड़े लोग प्रार्थी के लिए क्या नहीं दे डालते हैं ? धैर्य के समुद्र दधीचि ने इन्द्र को अपनी हड्डियाँ दे डाली थीं। क्या मुनिनाथ बुद्ध ने शरीर की कुछ परवाह न करके अनुकम्पावश अपने आपको कितनी बार हिंस्र पशुओं के लिए नहीं दे डाला ? उदाहरण तो आप स्वयं इससे अधिक जानते हैं ।' यह कह कर हर्ष चुप हो गए । भदन्त ने फिर कहा-'भाग्यशाली को दो बार बात कहने की आवश्यकता नहीं।