हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१८ हर्षचरितम् सनादिदानोपचारचेष्टितम् । अतिभूमिर्भूमिरेवासनं भवादृशां पुरः संभा- षणासृताभिषेकप्रक्षालितसकलवपुषश्च मे प्रदेशवृत्तिः । पाद्यमप्यपार्थकम् । आसतां भवन्तो यथासुखम् । आसीनोऽहम्' इत्यभिधाय क्षितावेवोपविशत् । 'अलंकारो हि परमार्थतः प्रभवतां प्रश्रयातिशयः, रत्नादिकस्तु शिला- भारः' इत्याकलय्य पुनः पुनरभ्यर्थ्यमानोऽपि यदा न प्रत्यपद्यत पार्थिवो वचनं तदा स्वमेवासनं पुनरपि भेजे भदन्तः । भूपतिमुखनलिननिहित- निभृतनयनयुगलनिगडनिश्चलीकृतहृदयश्च स्थित्वा कांचित्कालकलां कलि- कालकल्मषकालुष्यमिव क्षालयन्नमलाभिर्दन्तमयूखमालाभिर्मूलफलाभ्यव- हारसंभवमुद्द्रमन्निव च परिमलसुभगं विकचकुसुमपटलपाण्डुरं लतावन- मवादीत्—'अद्यप्रभृति न केवलमयमनिन्द्यो वन्द्योऽपि प्रकाशितसत्सारः संसारः । किं नाम नालोक्यते जीवद्भिरद्भुतं येन रूपमचिन्तितोपनतमिदं दृक्पथमुपगतम् । एवंविधैरनुमीयन्ते जन्मान्तरावस्थितसुकृतानि हृदयो- भूमिमतिक्रान्तातिभूमिः । स्वर्गादिस्थानरूपः प्रदेशवृत्तिः एकदेशो वा । नयनयुगलमेव निगडो बन्धनशृङ्खला । निवृत्तिः चित्तविभ्रमः । आसनादि देने के उपचार मुझे पृथक् करने के समान प्रतीत होते हैं । आप जैसे लोगों के सामने भूमि पर बैठना ही परस्पर बातचीत के अमृताभिषेक से प्रक्षालित शरीर वाले मेरे लिए मर्यादा से बाहर है । चरणोदक भी व्यर्थ है । आप सुख-पूर्वक बिराजें, मैं तो बैठता ही हूँ ।' यह कह कर जमीन पर ही बैठ गए । 'परमार्थतः बड़े लोगों का अलंकार विनयातिशय है, रत्नादिक तो शिलाभार है।' यह सोचकर बार-बार आग्रह करने पर भी जब राजा ने आसन पर बैठना स्वीकार नहीं किया तब फिर भदन्त अपने ही आसन पर विराजमान हुए । कुछ समय तक राजा के मुख की ओर अविचल दृष्टि से देखते रहे, मानों उनका हृदय जंजीर में बँध कर निश्चल हो गया था । तब वे अपने निर्मल दांतों की किरणों से कलिकाल के पापजन्य कालुष्य को मानों प्रक्षालित करते हुए और फल एवं मूल के आहार करने से मुँह से परि- मल भरा, खिले हुए पुष्पों से उज्ज्वल लतावन का दृश्य उत्पन्न करते हुए वे बोले—'आज तक सज्जनों के उत्कर्ष को प्रकाश में लाने वाला यह संसार केवल अनिन्द्य ही नहीं, बल्कि वन्दनीय भी है । जीवित रहने वाले लोग कौन-सा आश्चर्य नहीं देख लेते ! उदा- हरण के रूप में बिना सोचे ही यह रूप हमारी आँखों का गोचर हो गया । हृदय के इन्हीं आनन्दों से लोग जन्मान्तर के पुण्यों का अनुमान करते हैं । हमारे इस तपस्या के क्लेश ने इस जन्म में भी असुलभदर्शन देवानांप्रिय आपके दर्शन के रूप में फल दे दिया ।