हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम उच्छ्वासः ४१६ त्सवैः । इहापि जन्मनि दत्तमेवास्माकममुना तपःक्लेशेन फलमसुलभद- र्शनं दर्शयता देवानांप्रियम् । आ तृप्तेरापीतममृतमीक्षणाभ्याम् । जातं निरुत्कण्ठं मानसं निवृत्तिसुखस्य । महद्भिः पुण्यैर्विना न विश्राम्यन्ति सज्जने त्वादृशि दृशः । सुदिवसः स त्वं यस्मिञ्जातोऽसि । सा सुजाता जननी या सकलजीवलोकजीवितजनकमजनयदायुष्मन्तम् । पुण्यवन्ति पुण्यान्यपि तानि येषामसि परिणामः । सुकृततपसस्ते परमाणवो ये तव परिगृहीतसर्वावयवाः । तत्सुभगं सौभाग्यमाश्रितोऽसि येन । भव्यः स पुरुषभावो भवत्यवस्थितो यः । यत्सत्यं मुमुक्षोरपि मे पुण्यभाजमालोक्य पुनः श्रद्धा जाता मनुजजन्मनि । नेच्छद्भिरप्यस्माभिर्दृष्टः कुसुमायुधः । कृतार्थमद्य चक्षुर्व॑नदेवतानाम् । अद्य सफलं जन्म पादपानां येषामसि गतो गोचरम् । अमृतमयस्य भवतो वचसां माधुर्यं कार्यमेव । अस्य त्वीदृशे शैशवे विनयस्योपाध्यायं ध्यायन्नपि न संभावयामि भुवि । सर्वथा शून्यं आसीदजाते दीर्घायुषि गुणग्रामः । धन्यः स भूभृद्यस्य वंशे मणिरिव मुक्तामयः संभूतोऽसि । एवंविधस्य च पुण्यवतः कथंचित्प्राप्तस्य केन अमृतमयस्येति यतोऽमृतमयस्त्वमतो भवद्वचसां माधुर्यं कार्यं प्रयोज्यं कारणसदृशेन कार्येण भवितव्यमित्युक्तेः । शून्यः निराश्रयः । वंशो वेणुरपि । मुक्तामयस्त्यक्तदोषः, तृप्ति पर्यन्त मेरी आँखों ने आज अमृत का पान किया । अब चित्त में निर्वाण के सुख की उत्कण्ठा नहीं रही । अगर बहुत अधिक पुण्य न हो तो आप जैसे सत्पुरुषों पर दृष्टिपात करने का अवसर नहीं मिलता । वह दिन बड़ा ही अच्छा होगा जिस दिन आपका जन्म हुआ होगा । वह जननी सच्चे अर्थ में जननी है, जिसने समस्त जीवलोक के प्राण भायु- ष्मान् को जन्म दिया । वे पुण्य भी सचमुच पुण्यवान् हैं, जिनके फलस्वरूप तुम हो । जो परमाणु तुम्हारे अङ्ग-अङ्ग के बनने में लगाए गए हैं, निश्चय ही उन्होंने खूब तपस्या की होगी । वह सौभाग्य बड़ा ही शोभन होगा, जिसके आश्रय में तुम हो । वह पौरुष बड़ा ही भव्य है जो तुममें रहता है । सचमुच मुझ मुमुक्षु की भी पुण्यवान् आपको देख- कर मनुष्य के जन्म में श्रद्धा होती है । इच्छा न रखते हुए भी हमने आज कामदेव को साक्षात् देख लिया । आज देवताओं की आँखें कृतार्थ हो गईं । आज वृक्षों का भी जन्म सफल हुआ, जिनके सामने तुम गए । अमृतमय आपकी बातों में माधुर्य का होना स्वाभा- विक है । इस प्रकार के शैशवकाल में भी इस विनय की शिक्षा देने वाले आचार्य को पृथिवी भर में ढूँढ़ कर प्राप्त करना मुश्किल है । दीर्घायु आपकी उत्पत्ति के पूर्व सर्वथा गुणों का समूह किसी काम का न था । वह राजा धन्य है जिसके वंश में मणि की भाँति आप