भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 467, कुल 506 में से

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पृष्ठ 467

४२० हर्षचरितम् प्रियं समाचराम इति पारिप्लवं चेतो नः। सकलवनचरसार्थसाधारणस्य कन्दमूलफलस्य गिरिसरिदम्भसो वा के वयम्। अपरोपकरणीकृतस्तु कायकलिरयमस्माकम्। सर्वस्वमवशिष्टमिष्टातिथ्याय। स्वायत्ताश्च विद्यन्ते विद्याबिन्दवः कतिचित्। उपयोगं तु न प्रीतिर्विचारयति। यदि च नोप- रुणद्धि कंचित्कार्यलवमरक्षणीयाक्षरं वा कथनीयं तत्कथयतु भवान् स श्रोतुमभिलषति हृदयं सर्वमिदं नः। केन कृत्यातिभारेण भव्यो भूषित- वान्भूमिरिमेतामभ्रमणयोग्याम्? कियदवधिर्वाऽयं शून्याटवीपर्यटनक्लेशः कल्याणराशेः? कस्माच्च संतप्तरूपेष ते तनुरियमसंतापार्हा विभाव्यते?' इति। राजा तु सादरतरमब्रवीत्—'आर्य! दर्शितसंभ्रमेणानेन मधुरसवि- सरममृतमिव हृदयधृतिकरमनवरतं वर्षता वचसैव ते सर्वमनुष्ठितम्। धन्योऽस्मि यदेवमभ्यर्हितमनुपचरणीयमपि मान्यो मन्यते माम्। अस्य मौखिकरूपश्च। पारिप्लवं दोलाधिरूढमित्यर्थः। अनेकदुःखहेतुत्वात्। काय एव कलिः। आरक्षणीयाक्षरमिति। यदस्माकमुपरि विश्वासोऽस्तीत्यर्थः। उत्पन्न हुए हैं। हमारे मन में यह विकलता है कि इस प्रकार के पुण्यवान् आप किसी तरह पधारे हों तो हम आपके योग्य कौन-सा प्रिय करें? जो कन्द, मूल, फल और झरने के जल समस्त वनचरों के लिए सुलभ हैं, उनके देने के अधिकारी ही नहीं। केवल हमारा यह शरीर दूसरे के अधीन नहीं है। प्रिय अतिथि-सत्कार के लिए यह सर्वस्व हमारे पास बचा है। विद्या के कुछ कण ही अपने अधीन रह गए हैं। हमारी प्रीति उनका कोई उपयोग नहीं समझती। यदि कोई कार्य की बाधा न हो और बात कहने योग्य हो तो आप उसे कहें, हमारा हृदय वह सब कुछ सुनना चाहता है। भ्रमण के अयोग्य इस भूमि को भव्य आपने किस आवश्यक कार्य से आकर अलंकृत किया है? कल्याणराशि आप इस निर्जन अटवी में कब से पर्यटन का क्लेश उठा रहे हैं? सन्ताप के सहन न करने के योग्य यह आपकी देह किस कारण इस प्रकार कष्ट उठा रही है?' राजा ने आदर के साथ कहा—'आर्य, अमृत के समान निरन्तर मधुरस बरसाने वाले, मेरे प्रति आदर से भरे और हृदय को धैर्य देने वाले आपके इस वचन ने सब कुछ कर दिया। मैं धन्य हूँ कि मान्य आप उपचार के अयोग्य भी मुझे आदर के योग्य समझते हैं। इस महावन में घूमने का कारण मतिमान् आप सुनें। परिवार के सब इष्ट व्यक्तियों के नष्ट हो जाने के बाद मेरे जीवन का एकमात्र सहारा मेरी छोटी बहन बची थी, वह भी पति के वियोग से और शत्रु के द्वारा पकड़े जाने के भय से मारी-मारी किसी

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