भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 468

च महावनभ्रमणपरिक्लेशस्य कारणमवधारयतु मतिमान् । मम हि विनष्ट- निखिलेष्टबन्धोर्जीवितानुबन्धस्य निबन्धनमेकैव यवीयसी स्वसावशेषा । सापि भर्तुर्विद्योगाद्धैरिपरिभवभयाद्भ्रमन्ती कथमपि विन्ध्यवनमिदम्, अशुभशबरबलबहुलम्, अगणितगजकुलकलिलम्, अपरिमितमृगपति- शरभभयम्, उद्दामहिषमुषितपथिकगमनम्, अतिनिशितशरकुशपरुषम्, अवटशतविषममविशत् । अतस्तामन्वेष्टुं वयमनिशं निशि निशि च सततमियामटवीमटामः । न चैनामासादयामः । कथयतु च गुरुरपि यदि कदाचित्कुतश्चिद्वने चरतः श्रुतिपथमुपगता तद्वार्ता' इति । अथ तच्छ्रुत्वा जातोद्वेग इव भदन्तः पुनरभ्यधात्—'धीमन् ! न खलु कश्चिदेवंरूपो वृत्तान्तोऽस्मानुपागतवान् । अभाजनं हि वयमीदृशानां प्रियाख्यानोपायनानां भवताम् ।' इत्येवं भाषमाण एव तस्मिन्नकस्मादा- गत्यापरः शमिनि वयसि वर्तमानः संभ्रान्तरूप इव पुरस्तादुपचिताञ्ज- लिर्जातकरुणः प्रक्षरितचक्षुर्भिक्षुरभाषत—'भगवन्भदन्त ! महत्करुणं वर्तते । बालैव च बलवद्व्यसनाभिभूता भूतपूर्वापि कल्याणरूपा स्त्री


अतिशयेनाल्पा यवीयसी कनिष्ठा । अयोगाद्विच्छेदविधिर्वैधुर्याद्विदं विन्ध्यवनम- निशं प्रविष्टेति पदयोजना । अनिशं सदा । अटवीमटामो गच्छामः ।


प्रकार इस विन्ध्यवन में आ गई, जहाँ दुराचारी शबर निवास करते हैं, असंख्य हाथियों से जो भरा है, जहाँ अनेक सिंहों और शरभों का डर बना रहता है, विकराल भैंसे राहियों को चलने नहीं देते, तीखे बाणों की तरह कुश-काँटे जहाँ बिछे हैं और सैकड़ों खाइयाँ हैं, इसलिए मैं उसे ढूँढ़ने के लिए रात-दिन इस जंगल का चप्पा-चप्पा छान रहा हूँ, पर अभी तक कोई पता नहीं मिला । यदि किसी वनचर से आपको कभी कोई समाचार मिला हो तो कृपया बतावें ।' यह सुनते ही भदन्त ने उद्विग्न मन से फिर कहा—'धीमन्, अभी तक ऐसा कोई वृत्तान्त मुझे नहीं मिला है। मैं इस प्रकार के प्रिय वृत्तान्त के उपहार आपको अर्पित करने के योग्य नहीं ।' जब वे यह कह ही रहे थे कि अकस्मात् एक अन्य भिक्षु जो शमभाव का उपासक था, सम्भ्रान्त जैसा दौड़ा-दौड़ा आया और हाथ जोड़कर करुणा से रोते हुए बोला—'भगवन्, भदन्त, अत्यन्त दुःख का विषय है। कोई एक अत्यन्त सुन्दरी बाल अवस्था की स्त्री विपत्ति में पड़ी हुई शोक के आवेश से अग्नि में जलने के लिए तैयार है । जब तक वह अपने प्राणों का परित्याग नहीं करती, कृपया चलकर उसे