हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 456, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम उच्छ्वासः ४०६ यति प्रव्रज्या, किं पुनः सकलजनमनोमुषि विदुषि जने । यतो नः कुतू- हलि हृदयमभूत्सततमस्य दर्शनं प्रति प्रासङ्गिकमेवेदमपतितमतिकल्याणं पश्यामः प्रयत्नप्रार्थितदर्शनं जनमिति । प्रकाशं चाब्रवीत्—'अङ्ग ! समुप- दिश तमुद्देशं यत्रास्ते स पिण्डपाती' इति । एवमुक्त्वा च तेनैवोपदिश्य- मानवर्त्मा प्रावर्तत गन्तुम् । अथ क्रमेण गच्छत एव तस्य अनवकेशिनः कुड्मलितकर्णिकाराः, प्रचुरचम्पकाः स्फीतफलेग्रयहः, फलभरभरितनमेरवः नीलदलनलदनारि- केलनिकराः, हरिकेसरसरलपरिकराः कोरकनिकुरम्बरोमाञ्चितकुरबकरा- जयः, रक्ताशोकपल्लवलावण्यलिप्यमानदशदिशः, प्रविकसितकेसररजो- विसरबध्यमानचारुधूसरिमाणः स्वरजः सिकतिलातलकतालाः, प्रविचलि- अथ क्रमेण गच्छत एवास्यैवंविधास्तरवो दर्शनमवतेरुरिति संबन्धः । अवकेशी निष्फलतरुः । उक्तं च—'वन्ध्योऽफलोऽवकेशी च कर्णिकारो द्रुमोत्पलः । परिष्याधः' इति पर्यायः । 'स्यादवन्ध्यः फलेग्रहिः' । नमेरुस्तरुभेदः । 'नलदः सल्लकी मांसी नारिकेलस्तु लाङ्गली' इत्यमरः (?) । हरिकेसरः । उक्तं च—'चाम्पेयः केसरो नागकेसरः काञ्चनाह्वयः' । सरला देवदारवः । कोरकः कलिका । कुरबका ये योषि- तामालिङ्गनैः पुष्यन्ति । रक्ताशोका ये सालक्तककामिनीचरणहताः फुल्लन्ति । केसरा बकुलाः । ये कान्तागण्डूषशीधुसेकेन विकसन्ति । तिलकाः क्षुरकाः । ये हैं और भिक्षु का वेष किसका पूज्य नहीं ! धर्म का घरनो भगवती प्रव्रज्या जब मूर्ख व्यक्ति में भी गौरव उत्पन्न कर देती है तो समस्त जन के चित्त को हर लेने वाले विद्वान् की क्या बात है जो हमारा हृदय उनके दर्शनों के लिए कुतूहल से भर गया है । हम प्रयत्न से दर्शन देने वाले उनको ( दिवाकरमित्र को ) प्रसङ्गतः प्राप्त अपने कल्याण के रूप में देखते हैं । उन्होंने कहा—'भाई, वे भिक्षु जहाँ हों, उस स्थान को बताओ ।' यह कहकर निर्घात के द्वारा बताए गये मार्ग पर चलने लगे । उसके साथ मार्ग में चलते हुए ही हर्ष ने फले-फूले अनेक वृक्षों पर दृष्टिपात किया । कर्णिकार कोढ़ी ले रहे थे । चम्पक फलों से लद गए थे । नमेरु फलों के भार से झुक गये थे । साँवले पत्तों वाले सल्लकी और नारियल के पेड़ झुण्ड के झुण्ड थे । नागकेसर और सरल चारों ओर छाए हुए थे, कुरबक वृक्षों की कोंदियाँ उनके रोमाञ्च की भाँति निकल रही थीं । रक्ताशोक के पल्लवों की लाली दिशाओं में जैसे लिप रही थी । खिले हुए केसरवृक्षों के पराग उड़कर वन को धूसर कर रहे थे । तिलकवृक्षों के पराग बालू के