भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 449, कुल 506 में से

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पृष्ठ 449

४०२ हर्षचरितम् दृगुल्मगहनगृहवाटिकाैः, निखातोच्चकाष्ठारोपितकाष्ठालुकलताप्रतानविहित- च्छायैः, परिमण्डलबदरीमण्डपकतलनिखातखादिरकील बद्धवत्सरूपैः, कथमपि कुक्कुटरटितानुमीयमानसंनिवेशैरङ्गनाशस्तिस्तम्भतलविरचितप- क्षिपूपिकावापिकैर्विकीर्णबदरपाटलपटलैः, वेगुपोटदलनकलितशरमयुष्टु- तिविहितभित्तिभिः, किंशुकगोरोचनारचितमण्डलमण्डपबल्वजबद्धाङ्काररा- शिभिः, शाल्मलीफलतूलसंचयबहुलैः, संनिहितनलशालिशालूकखण्ड- कुमुदबीजवेगुतण्डुलैः, संगृहीततमालबीजैः, भस्ममलिनम्लानकाश्मर्य- कूटव्याधृतकटैराश्यानराजादनमदनफलस्फीतैर्मधूकासवमद्यप्रायैः, कुसुमभ- तृणधान्यभेदः । गर्मुङ्गतागुल्मः । ‘अप्रकाण्डे स्तम्बगुल्मौ’ इति काष्ठालुकलता अलाबुवल्ली । स्वल्पा वत्सा वत्सरूपा । संनिवेशो रचना । अगस्तिर्मुनितरुः । पक्षिपूपिका पक्षिणां वेत्रवलानि भाण्डभेदः । पोटः शकलः । किंशुकानि पलाश- वृक्षपुष्पाणि । बल्वजस्तृणभेदः । बन्धकाष्ठ इति प्रसिद्धः । शाल्मली रक्त- पुष्पा । उक्तं च—‘शाल्मली रक्तपुष्पा च कुर्कुटी स्थिरजीविता । पिच्छिला तूलिनी मोचा कण्टकाढ्या सुपूरिणी ॥’ इति । तूलं कर्पासः । नलशालिः शालिभेदः । शालूकं पद्ममूलम् । उक्तं च—‘पद्ममूलं तु शालूकं सकिलं तत्किरात- कम् । शालीनं पद्मकन्दं च जालालूकं निगद्यते ॥’ इति । काश्मर्यः कश्मीरीहीरः । ‘काश्मीरी मधुमत्यपि । श्रीपर्णी सर्वतोभद्रा गम्भीरी कृष्णमृत्तिका ॥’ इति । कूटाः कुनालानि । राजादनः कपीष्टः । उक्तं च—‘क्षीरोदस्त्व राजन्यः क्षीरमृत्स्नः कपी- नृपः । राजादनो दृढस्कन्धः कपीष्टः प्रियदर्शनः ॥’ इति । मदनो रोधः । उक्तं च— ‘मदनः शल्यको रोधो गालः पिण्डीतकः फलम् । भसरः करहाटश्च सुमनोऽति- के साथ लगी हुई बगीचियों में भरे हुए थे। गाड़ी गई ऊँची बल्लियों पर चढ़ाई हुई लौकी की बेलें फैल कर छाया दे रही थीं। बेरी की गेल में मंडपों के नीचे खैर के खूँटे गाड़कर बछड़े बांध दिए गए थे। मुर्गों की कुकड़ूँकूँ से पहचान मिलती थी कि घर कहाँ कहाँ बसे हैं। आंगन में लगे अगस्त्य वृक्ष के नीचे चिड़ियों का चुग्गा खिलाने और पानी पिलाने की हौदियाँ बनी हुई थीं और लाल बेरों की चादरसी बिछी थी। घरों की दीवारें बांस के फट्टे, नरकुल और सरकंडों को जोड़ कर बना ली गई थीं। कोयले के ढेरों पर बबइ घास के मड़वे छाए थे, जिनपर पलास के फूल और गोरोचना की सजावट थी। घरों में सेमल की रूई ढेर के ढेर पड़ी थी। नलशालिकमल की जड़, खंड शर्करा, कमलबीज, बाँस, तंडुल और तमाल के बीज आदि बटोर कर रखा लिए गए थे। चटाइयों पर गंभीरी के ढेर के ढेर सूख रहे थे और धूल पड़ने से कुछ मटमैले लग रहे थे। खिरनी और मेनफल सुखा कर रखे गए थे। महुए का आसव और चुवाया हुआ मद प्रायः हर

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