हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 448, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ४०१ चक्रचीत्कारिणीनां शकटश्रेणीनां संपातैः, संपाद्यमानदुर्बलोर्वीविरूक्षक्षेत्र- संस्कारमारक्षिक्षिप्तदान्तवाहकद्ण्डोड्डीयमानहरिणेलालङ्घिततुङ्गवैणववृति- भिश्च निखातगौरकरङ्ककुशङ्कितशशक शकलिततुङ्गशुङ्गैः, प्रयत्नप्रभृतवि- शङ्कटविटपैर्वाटैरेक्षवैः सुबहुभिः श्यामायमानोपकण्ठमतिविप्रकृष्टान्तरैर्मर- कतस्निग्धसुहावाटवेष्टितैः, कार्मुककर्मण्यवंशविटपसंकटैः, कण्टकितकर- ञ्जराजिदुष्प्रवेश्यैः, उरुबूकवचावङ्गकसुरमसूरणशिग्रुग्रन्थिपर्णगवेधुकागर्मु- संक्रीडत्कूजत् । वृत्तिर्वाटोपान्ते लताकृतः प्राकारमयः । करङ्कः कङ्कालः । तदुप- लक्षिताः शङ्कवः । शुङ्गोऽग्रभागः । वृत्तिरित्यन्ये । प्रभृताः पोषिताः । विशङ्कटा विस्तीर्णाः । विटपाः शाखाः । अतिविप्रकृष्टत्यादि । अटवीकुटुम्बिनां गृहैरुपेतमिति वनग्रामविशेषणम् । स्नुहा सुधावृक्षः । उक्तं च—'स्नुक्स्नुहा च सुधावृक्षः शुंभी निस्त्रिंशपत्रकः । समन्तदुग्धी गण्डोरी सेहुण्डो वज्रकन्दकः' ॥ इति । कर्मणि साधुः कर्मण्यः । करञ्जो नक्तमालः । उक्तं च—'करञ्जो नक्तमालः स्यात्प्रतीतश्विरबिल्वकः' इति । उरुबूक एरण्डः । उक्तं च—'उरुबूकस्तथैरण्डो रुबको वातनाशनः । पञ्चाङ्गुलो वर्धमानश्चित्रो गन्धर्वपात्तथा ॥' वचा उग्रगन्धा । उक्तं च—'वचोग्रगन्धा गोलोमी जटिलोग्रा सलोमशा' इति । वङ्गको हरीतकीविशेषः । सुरसो भूतघ्नी । उक्तं च—'सुरसा तुलसीद्वुः स्यादलसो बहुमञ्जरी । अपेतो राक्षसो गौरी भूतघ्नी देवदुन्दुभिः ।' इति । सूरणः कन्दविशेषः । शिग्रुः सौभाञ्जनः । उक्तं च—'साभा- ञ्जनः कृष्णगन्धा मुखभञ्जोऽथ शिग्रुकः' इति । ग्रन्थिपर्णः मुस्ताकारः सुगन्धिकन्द- विशेषः । उक्तं च—'ग्रन्थिपर्णोऽशुकं बर्हिपुष्पं स्थौणेयकुन्दुरे' इति । गवेधुका लथपथ थे और चलने के लिए ललकारे जा रहे थे । डगमग पहिये घिसटते हुये चुं-चूं कर रहे थे । जिन खेतों की उपजाऊ शक्ति कम हो गई थी, उनमें लाद कर कूड़ा-कर्कट डाले जा रहे थे । गन्नों के खूब लहलहाते हुए बहुत से खेतों के बाड़े गाँव की हरियाली बढ़ा रहे थे । खेतों के रखवाले जब गन्नों में छिपे हुये हिरनों को ताककर बेलों को हाँकने का डण्डा उनकी ओर चलाते तो हिरन छलाँग मार कर ऊंची बाँसों की बाड़ से उस पार निकल जाते थे । जंगली भैसों के कंकाल खेत में काँटे की तरह गाड़े गये थे, उनसे डरे हुए खरहे गन्ने के ऊँचे अंकुरों को ही कुतर डालते थे । गन्नों के पौधे बड़े यत्न से बढ़ाये गये थे । वनग्राम के घर एक-दूसरे से काफी दूरी पर थे । उनके चारों ओर मरकत के जैसे चिकने हरे रङ्गवाली सेंहुड़ की बाड़ लगी थी । धनुष बनाने के काम में लाने योग्य बाँसों की बँसवारी पास में उग रही थी । करंजुए के कांटेदार वृक्षों की पंक्ति में रास्ता बना कर घुसना मुश्किल था । एरंड, बचा, बंगक (बैंगन), तुलसी, सूरनकन्द, मोंडिजन. गंठिनवन, गरबेरुआ और मरुश्रा धान के गुश्म घरों २६ ह० च०