हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०० हर्षचरितम् वसकवीतंसव्यालम्बमानबालपाशिकैश्च संगृहीतग्राह्रकक्रकरकपिञ्जलादि- पञ्जरकैः शाकुनिकैः, संचरद्भिश्चयुतलासकलेशालितलतावधूलद्बालम्पटानां चपेटकैः, पाशकशिणूनामटद्भिः तृणस्तम्बान्तरिततित्तिरतरलायमानकौले यककुलचाटुकारैश्चलद्विहगमृगयां मृगयुयुवभिः क्रीडद्भिः, परिणतचक्रवाक- कण्ठकषायरूचां शीधव्यानां वल्कलानां कलापान्, नातिचिरोद्धृतानां च धातुत्विषां धातकीकुसुमानां गोणीरगणिताः पिचव्यानां चातसीगण- पट्टमूलकानां पुष्कलान्संभारान्, भारांश्च मधुनो माक्षिकस्य मयूराङ्गज्- स्याक्लिष्टमधूच्छिष्टचक्रमालानां लम्बमानलामजकमुञ्जजटानामपत्वचां खदिरकाष्ठानां कुष्ठस्य कठोरकेसरिसटाभारबभ्रुणश्च रोध्रस्य भूयसो भारकान्, लोकेनादाय व्रजता प्रविचितविविधवनफलपूरितपिटकमस्त- काभिश्चाभ्यर्णग्रामगत्वरीभिस्त्वरमाणाभिर्विक्रयचिन्ताव्यग्राभिर्भ्रामेयकाभि- र्व्याप्तदिगन्तरमितस्ततश्च युक्तशूरशकुरशाकराणां पुराणपांसूत्किरकरीष- कूटवाहिनीनां धूर्गतधूलिधूसरसैरिरभसरोपस्वरसार्यमाणानां संक्रीडकटुल- मधुनः क्षौद्रस्य । मयूराङ्गजस्य बर्हिपिच्छस्य । मधूच्छिष्टं सिक्थकम् । लामज्ज केति । 'लामज्जकं लघुलयम्' इत्यमरः। उशीरभेद इत्यन्ये । बभ्रुगः कपिलस्य । रोध्रस्येति । रोध्रो लोध्रः । शाबरकः 'शिल्लकः शिल्लुकस्त्वरः । तिरीटः कानहीरश्च शिल्लो शाबरपादपः' । शकुरास्तरुगाः । शाकरा बलीवर्दाः । करीषं शुष्कगोमयम् । उक्तं च—'गोविष्ठोमयमस्त्रियाम् । तत्तु शुष्कं करीषोऽस्त्री' इति । सैरिको हालिकः । के शिकार के शौकीन नवयुवक लोग शिकारी कुत्तों को जो बीच-बीच में झाड़ी में उड़ते हुए तीतरों की फड़फड़ाहट से बेचैन हो उठते थे, पुचकार रहे थे। गाँव के लोग वन की उपज के बोझ सिर पर उठाये जा रहे थे। कोई पुराने चक्रवाक के गले की तरह लाल पीली सेंहुड़ की छाल का गट्ठा लिए था। किसी के पास तुरत तोड़े हुए गेरू की तरह लाल वर्ण वाले धाय के फूलों की बोरियाँ थीं। कई लोग रुई, अलसी, सन के मुट्ठों का बोझा लिए थे । मधुमक्खी की शहद, मोर के पिच्छ, छाल उधेड़ी हुई कत्थे की लकड़ी, जिसपर खस की जटायें लटक रही थीं, कूठ (एक पौधा) पुराने सिंह के केसर के समान पीले- पीले लोध के भार सिरों पर उठाये बोझिये जा रहे थे। गाँवई स्त्रियों ने अनेक प्रकार के जंगली फूलों को बीन-बीन कर टोकरे भर लिए थीं और उन्हें बेचने की चिन्ता में व्यग्र होकर जल्दी-जल्दी डेग रखती हुई पास के गाँवों में चली जा रही थीं। एक ओर छोटी-छोटी गाड़ियाँ इधर-उधर चली जा रही थीं। उनमें पुष्ट और तरुण बैल जुते थे । वे पुराने खाद कूड़े के ढेर ढो रही थीं। उनमें जुते हुए बैल धूल से