हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 446, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ३६६
सहकारफलजूटीजटिलस्थाणूनाम्, विश्राम्यत्कार्पटिकपेटकपरिपाटीपीय- मानपयसामटवीप्रवेशप्रपाणां शैत्येन त्याजयन्तमिव ग्रैष्ममूष्माणं क्वचि- दन्यत्र ग्राहयन्तमिवाङ्गारीयदारुसंग्रहदाहिभिः व्योकारैः, सर्वतश्च प्रातिवे- श्यविषयवासिना समासन्नग्रामगृहस्थगृहस्थापितस्थविरपरिपाल्यमानपाथे- यस्थगितेन कृतदारुणदारुव्यायामयोग्याङ्गाभ्यङ्गेन स्कन्धाध्यासितकठोर- कुठारकण्ठलम्बमानप्रातराशपुटेन पाटच्चरप्रत्यवायप्रतिपन्नपटच्चरेण काल- वेत्रकत्रिगुणप्रततिवलयपाशग्रथितग्रीवाग्रथितैः पत्रवीटावृतमुखैः, बोटकूटै- रूढवारिणा पुरःसरबलद्वलीवर्दयुगसरेण नैकटिककुटुम्बिकलोकेन काष्ठ- संग्रहार्थमटवीं प्रविशता श्वापदव्यधनव्यवधानबहलीसमारोपितकुटीकृत- कूटपाशैश्च गृहीतमृगतन्तुतन्त्रीजालवलयवागुरैः, बहिर्व्याधैर्विचरद्भिरंसा-
ऊपर जल सुवासित करने के लिए पाटल के फूल रखे गये थे । भीतर थूनियों के सिरों पर बाल सहकार के फलों की डालें झूल रहीं थीं और हरे पत्तों पर पानी का छींटा देकर उनके झुगते हुए फलों को ताजा रखा जा रहा था । झुंड के झुंड यात्री प्याऊ में आकर पानी पी रहे थे । प्रपाओं की ठण्डक से ग्रीष्म की गरमी कम पड़ रही थी । दूसरी ओर लकड़ी के ढेरों में आग लगाकर अङ्गार बनाने वाले लुहार फिर उतनी ही तपन पैदा कर रहे थे । पड़ोसी प्रदेश में रहने वाले निकटवासी कुणबी (कुटुम्बिक) जाति के लोग काष्ठ- संग्रह के लिए जंगल में आ रहे थे। निकट के गांवों में रहने वाले गृहस्थों के घर पर अपने भोजन के सामान रख आये थे और बूढ़ों को रखवाली के लिए बैठा आये थे । लकड़ियों के साथ कुल्हाड़ा भाँजने की कसरत के बर्दाश्त के लिए शरीर में तेल की मालिश कर रखी थी । उनके कन्धों पर भारी कुठार रखे थे और गले में कलेवे में पोटकी लटक- रही थी। चोरों के डर से फटे-पुराने कपड़े पहन रखे थे । उनके गले में काले बेंत की तिलड़ी माला लपेटी हुई थी और उसी से पानी की लम्बोतरी घड़ियों जिनके मुँह में डाट लगी थी, लटकी हुई थीं। उनके आगे लकड़ी लादने के लिए बैलों की जोड़ी चल रही थी। आधे ग्राम के बाहर वाले जंगल में विचर रहे थे । जंगल के खूंखार जानवरों के शिकार में घुसने के लिए टट्टियाँ लगाई थीं और शिकारी कूटपाशी की गेडुरी बनाकर साथ में लिये थे । उनके हाथ में पशुओं के नसों की डोरियों, जाल और फन्दे थे । कुछ दूसरी तरह के बहेलिये चिड़ियों फसाने वाले शाकुनिक विचर रहे थे, जो कन्धेपर बीतंसक जाल या डला लटकाये थे, जो उनके बालपाशिक आभूषण से उलझ-उलझ जाते थे । उनके हाथों में बाज, तीतर और भुजंगा आदि के पिंजड़े थे । चिड़ीमारों के लड़के बेलों पर लासा लगाकर गौरैया पकड़ने के इरादे में इधर से उधर फुदक रहे थे । चिड़ियों
१. 'पीत' इति ।