हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६८ हर्षचरितम् ङ्गवैः दुरुपगमश्यामाकप्ररूढिभरलम्बुसबहुलेः, अविरहितकोकिलाक्षक्षुपै- र्विरलविरलैः केदारैः, कृच्छ्रात्कृष्यमाणैरैनातिप्रभूतप्रवृत्तगतागतप्रहतभुव- मुपचेत्रमुपरचितैरुञ्चैर्मञ्चैश्च सूच्यमानश्वापदोपद्रवं, दिशि दिशि च प्रति- मार्गद्रुमकूतानां पथिकपादप्रस्फोटनधूलिधूसरैर्नवपल्लवैर्लाञ्छितच्छाया- नाम्, अटवीसुलभसालकुसुमस्तबकाञ्चितनवखातकूपिकोपकण्ठप्रतिष्ठित- नागस्फुटानामच्छिद्रकटकल्पितकुटीरकाणाम्, कुटिलकीटवेणीवेष्ट्यमान- शक्तुशारशरावश्रेणीश्रितानाम्, अध्वगजनजग्ध जम्बूफलास्थिशबलसमीप- भुवाम्, उद्वूलितधूलीकदम्बस्तबकप्रकरपुलकिनीनाम्, कण्टकितकर्करी- चक्राक्रान्तकाष्ठमञ्चिकामुषिततृषाम्, तंभ्यत्तलशीतलसिकतिलकलशीश- मितश्रमागाम्, आश्यानशैवलश्यामलितलिञ्जरजायमानजलजडिम्नाम्, उदकुम्भाकृष्टपाटलशर्कराशकलशिशिरीकृतदिशाम्, घटमुखघटितकटहार- पाटलपुष्पपुटानाम्, शीकरपुलकितपल्लवपूलीपाल्यमानशोप्यसरसिशिशु- थे। उनमें फिर से पत्ते निकल रहे थे। खेतों में साँवा का जङ्गल लहरा रहा था। छुईमुई भी खूब बढ़ आई थी। तालमखाने के छोटे-छोटे पौधों से भी चलने में कठिनाई होती थी। खेत बड़ी कठिनाई से जोते जाते थे। आने जाने वाले कम थे, इसलिए पगडण्डियाँ साफ दिखायी न पड़ती थीं। खेतों के पास ऊँचे बँधे हुए मचानों से यह सूचित हो रहा था कि यहाँ जङ्गली जानवर उपद्रव करते हैं। जंगल के प्रवेशमार्गों पर प्याउओं का विशेष प्रबन्ध था। पेड़ों के झुरमुट में प्याऊ के स्थान बना लिए गये थे। पथिक वहाँ आते और पल्लवों की टहनी तोड़कर पैरों की धूल झाड़कर छाया में बैठते थे। नई खोदी हुई छोटी कुइयाँ पर जङ्गली साल के फूलों के गुच्छे टांग दिए गए थे और समीप में नागफनी से घेर दिया गया था। वहीं पर प्याऊ की मड़ैया घने घास-फूस से छा ली गई थी। सत्तू खाकर पथिकों ने जो सिकोरे फेंक दिए थे उन पर जंगली मक्खियाँ भिनभिना रही थी। प्याऊ के समीप की भूमि पथिकों को खाये जामुन की गुठलियों से रङ्गविरंग की हो रही थी। कदम्बों के फूलों से लदी हुई टहनियाँ तोड़कर धूल में फेंक दी गई थीं। काठ की बढ़ौचियों पर प्यास बुझाने के लिए मिट्टी की गगरियाँ, जिन पर काँटे जैसे बुन्दकियों की सजावट बनी थी, रखी हुई थीं। बालू की ठण्डी कलसियों में पानी पड़ जाने से जब वे रिसती थीं तो उन्हें ही देखकर पथिकों की थकान दूर हो जाती थी। कुछ सिम-सिम सिरवाकों के लपेट देने से नीले रङ्ग के नादों का जल खूब ठण्डा हो गया था। जल निकाल करके जलकुंभों में लाल शर्करा रखी गयी थी, जो चारों ओर ठंडक फैला रही थी। घड़े के मुँह गेहूँ की नालियों या तिनके के ढक्कन से ढँके थे, और उनके