भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 444

कम्, अशेषंश्च ससंख्यालेख्यपत्रान्, सालंकारापीडपीडान् कोशकल- शान् । अथालोच्य तत्सर्वमवनिपालः स्वीकृतं यथाधिकारमादिशदध्य- क्षान् । अन्यस्मिंश्चाहनि हयैरेव स्वसारमन्वेष्टुमुच्चचाल विन्ध्याटवीमवाप च परिमितैरेव प्रयाणकैस्ताम् । अथ प्रविशन्दूरादेव दह्यमानषष्टिकतुसविसरविसारिविभावसूनां वन्यधान्यबीजधानीनां धूमेन धूसरिमाणमादधानैः, शुष्कशाखासंचयर- चितगोवाटवेष्टितविकटवटैः, व्यापादितवत्सरूपकरोषाविष्टगोपालकल्पित- व्याघ्रयन्त्रैः, अयन्त्रितवनपालहठह्रियमाणपरग्रामीणकाष्ठिककुठारैः, गहन- तरुखण्डनिर्मितचामुण्डामण्डपैर्र्वनप्रदेशैः, प्रकाश्यमानमटवीप्रायप्रान्त- तया कुटुम्बभरणाकुलैः कुद्दालप्रायकृषिभिः कृषीवलैर्बलवद्भिरुच्चभागभा- षितेन भज्यमानभूरिशालिखलक्षेत्रखण्डलकमलपावकाशैश्च कापिलै., का- लायसैरिव कृष्णमृत्तिकाकठिनैः, स्थानस्थानस्थापितस्थाणूत्थितस्थूलप- लोहे की बेड़ी पहने हुए मालव के राजा लोग। कोष से भरे हुए कलसे, जिनपर ब्यौरे की पट्टियां लगी थीं और जिनके गले में आभूषणों की बनी मालाएँ पड़ी थीं। सब सामान को देखकर हर्ष ने अपने विभिन्न अधिकारी अध्यक्षों को उसे विधिपूर्वक स्वीकार करने की आज्ञा दी। दूसरे दिन घोड़ों से बहन राज्यश्री को ढूँढने के लिए प्रस्थान किया और कुछ ही पड़ावों के बाद विन्ध्याटवी में पहुँच गए। उसमें प्रवेश करते ही उन्होंने वनबस्ती के चारों ओर के वन-प्रदेश पर दृष्टिपात किया जो उसका दूर ही से परिचय दे रहे थे। वहाँ के लोग साठी चावल का भूसा जला लेते थे और उसकी फैलती हुई आग बनैले धान तक पहुँच कर वनप्रदेश को धुमैला बना रही थी। कहीं पुराने खंखाड़ बरगद के चारों ओर सूखी लकड़ियों के अम्बार लगाकर गायों का बाड़ा बनाया गया था। कहीं बाघों ने बछड़ों पर वार किया था तो उससे खीझकर ग्वालों ने बाघ को फँसाने का जाल लगा रखा था। स्वतन्त्र विचरण करने वाले वनपालों ने गाँवों से आकर लकड़ी काट ले जाने वाले लकड़हारों के कुठार जबर्दस्ती छीन लिये थे। पेड़ों के घने झुरमुट में चामुण्डा देवी का मण्डप बना हुआ था। वनग्राम के चारों ओर जङ्गल के सिवा और कुछ न था। इसलिए किसान कुटुम्ब का पेट पालने के लिये व्याकुल रहते थे और उसी चिन्ता में दुर्बल होकर जोर-जोर से आवाज करते हुए केवल कुदारी से खोदकर परती जमीन तोड़ते और खेत के टुकड़े निकाल लेते। खेत छोटे-छोटे और कहीं-कहीं पर थे। भूमि काश से भरी हुई थी। काली मिट्टी लोहे के तवे की तरह कड़ी थी। कुदारी ही उनका एक सहारा था। जगह-जगह पर काटने से पेड़ों के ठूँठ पड़े