भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 443

३६६ हर्षचरितम्

अथापरेद्युरुषस्येव भण्डिर्भूतपालमुपसृत्य व्यज्ञापयत्—'पश्यतु देवः श्रीराज्यवर्धनभुजबलार्जितं साधनं सपरिबर्हं मालवराजस्य' इति । नर- पतिना स 'एवं क्रियताम्' इत्यभ्यनुज्ञातो दर्शयांबभूव । तद्यथा—अन- वरतगलितमदमदिरामोदमुखरमधुकरजूटाजटिलकरटपट्टपङ्किलगण्डान् , गण्डशैलानिव जङ्गमान् , गम्भीरगर्जितरवाञ्जलधरानिव महीमवतीर्णा- नुत्फुल्लसप्तच्छदवनामोदमुचः, शरदिवसानिव पुञ्जीभूतान् , अनेकसहस्र- संख्यान्करिणः, चारुचामीकरचित्रचामरमण्डलमनेहरांश्च हरिणरंहसो हरीन् , बालआतपविसरवर्षिणां च किरणैरनेकेन्द्रायुधीकृतदशदिशामलं- काराणां विशेषान् , विस्मयकृतः स्मरोन्मादितमालवोकुचपरिमलदुर्ललि- तांश्च निजज्योत्स्नापूरप्लावितदिगन्तानपि तारान्हारान् , उडुपतिपादसं- चयशुचीनि निजयशांसीव बालव्यजनानि, जातरूपमयनालं च निवा- मपुण्डरीकमिव श्रियः श्वेतमातपत्रम् , अप्सरस इव बहुसमररससाहसा- नुरागावतीर्णा वारविलासिनीः, सिंहासनशयनासन्दीप्रभृतीनि सद्योप- करणानि, कालायसनिगडनिश्चलीकृतचरणयुगलं च सकलं मालवराजलो-

उसके बाद दूसरे दिन पौ फटते ही भण्डि ने राजा के पास आकर निवेदन किया— 'श्री राज्यवर्धन के भुजबल से मालवराज की जो सेना साज-सामान के साथ जीती गई है उसे देव देखने की कृपा करें।' राजा ने 'ऐसा ही करो' जब यह आज्ञा दी तो उसने वह सब सामान दिखाया। हजारों की संख्या में अनेक हाथी, जिनके गण्डस्थल को हमेशा बहते हुए मदजल की मादक गंध से आकृष्ट होकर लूझते हुए भौंरे पंकिल बना रहे थे, जो चलते-फिरते गण्डशैल की भांति लग रहे थे और इस प्रकार चिग्घाड़ रहे थे मानों पृथिवी पर उतरे हुए मेघ हों, और खिले हुए तमाल वन की तरह जिनकी गंध फैल रही थी। हरिण की भांति तेज चाल वाले घोड़े सुन्दर सुनहली चौरियों से सजे थे। बहुत से अलंकार, जिनकी किरणें बालआतप के रूप में निकल रही थीं, अपनी रंग-बिरंगी प्रभा से दिशाओं में इन्द्रायुधों का निर्माण कर रहे थे। आश्चर्य करने वाले शुद्ध मोतियों से पोहे गए तारहार जिनमें काम से मतवाली मालवी स्त्रियों के कुचों के परिमल लगे हुए थे और जो अपनी ज्योत्स्ना के प्रभाव से दिशाओं को प्लावित कर रहे थे। चन्द्रमा के किरणसमूह के समान सफेद चँवर जो हर्ष के अपने यश की भांति प्रतीत हो रहे थे। सुवर्ण दण्ड वाला श्वेत छत्र, जो मानों लक्ष्मी के निवास का कमल हो। वेश्याएँ, जो मानों अनेक युद्धों के देखने के साहस और अनुराग से पृथिवी पर उतरी हुई अप्सराएँ हों। सिंहासन, शयनासन आदि राज्य का सामान पैरों में