हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 442, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ३६५ अवनिपतिरपि दृष्ट्वा तमुत्थाय प्रविरलैः पदैः प्रत्युद्गम्योत्थाप्य च गाढमुपगूह्य कण्ठे करुणमतिचिरं रुरोद । शिथिलीभूतमन्युवेगश्च पुरैव पुनरागत्य निजासने निषसाद । प्रथमप्रक्षालितमुखे च भण्डौ मुखं प्रक्षा- लयत् । समतिक्रान्ते च कियत्यपि कालकलाकलापे भ्रातृमरणवृत्तान्त- मप्राक्षीत् । अथकथयच्च यथावृत्तमखिलं भण्डिः । अथ नरपतिस्त- मुवाच—'राज्यश्रीव्यतिकरः कः ?' इति । स पुनरवादीत्—'देव ! देव- भूयं गते देवे राज्यवर्धने गुप्तनाम्ना च गृहीते कुशस्थले देवी राज्यश्रीः परिभ्रश्य बन्धनाद्विन्ध्याटवीं सपरिवारा प्रविष्टेति लोकतो वार्तामशृण- वम् । अन्वेष्टारस्तु तां प्रति प्रभूताः प्रहिता जना नाद्यापि निवर्तन्ते' इति । तच्चाकर्ण्य भूपतिरब्रवीत्—'किमन्यैरनुपदिभिः यत्र सा तत्र परित्यक्तान्यकृत्यः स्वयमेवाहं यास्यामि । भवानपि कटकमादाय प्रवर्ततां गौडाभिमुखम्।' इत्युक्त्वा चोत्थाय स्नानभुवमगात् । कारितशोकश्म- श्रुवपनकर्मणा च महाप्रतीहारभवनस्नातेन, शारीरिकवसनकुसुमाङ्गरागा- लंकारप्रेषणप्रकटितप्रसादेन भण्डिना सार्धमभुक्त, निनाय च तेनैव सह वासरम् ।
हर्ष उसे देखकर उठे और लड़खड़ाते पैरों से आगे बढ़ उसे गले लगाया और स्वयं भी देर तक फूट-फूट कर रोते रहे । जब उनका शोक कुछ कम हुआ तब पहले की तरह आकर आसन पर बैठ गए । जब भण्डि अपना मुँह धो चुका तब उन्होंने भी धोया । कुछ देर के बाद भाई की मृत्यु का वृत्तान्त पूछा । जैसा हो चुका था भण्डि ने सब हाल कह सुनाया । तब राजा ने उससे फिर कहा—'राज्यश्री की क्या गति हुई ?' वह फिर बोला— 'देव, देव राज्य वर्धन के दिवंगत होने पर जब गुप्त नाम के व्यक्ति ने कान्यकुब्ज पर अधिकार कर लिया तो देवी राज्यश्री किसी प्रकार बन्धन से छूट कर अपने परिवार के साथ विन्ध्याचल के जंगल में चली गई । यह मैंने लोगों के मुँह से सुना है । बहुत खोज- पड़ताल करने वाले आदमी वहाँ भेजे गए जो अभी तक नहीं लौटे ।' यह सुनकर राजा ने कहा—'औरों के ढूँढने से क्या ? जहाँ राज्य श्री है मैं वहां दूसरे सब काम छोड़ कर स्वयं जाऊँगा । तुम भी सेना लेकर गौड़ पर चढ़ाई करो।' यह कहकर वे उठे और स्नानभूमि में चले गए । भण्डि ने हर्ष के कहने पर शोक से बढ़े हुए केशों का क्षौर कराया और महाप्रतीहार-भवन में स्नान किया । हर्ष ने उसके लिए वस्त्र, पुष्प, अंगराग और आभूषण भेज कर अपना प्रसाद प्रकट किया और साथ ही भोजन किया । एवं वह दिन उसके साथ ही बिताया ।