भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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३६४ हर्षचरितम् रिपुशरशल्यपूरितेन निखातबहुलोहकीलकपरिकररक्षितस्फुटनेनेव हृद- येन, हृदयलग्नैः स्वामिसत्कृतैरिव श्मश्रुभिः, शुचं समुपदर्शयन्दूरीकृत- व्यायामशिथिलभुजदण्डदोलायमानमङ्गलवलयैकशेषालंकृतिरनादरोपयु- क्तताम्बूलविरलरागेण शोकदहनदह्यमानस्य हृदयस्याङ्गारेणेव, दीर्घनिः- श्वासवेगनिर्गतेनाधरेण शुष्यता स्वामिविरहविधृतजीवितापराधवैलक्ष्या- दिव, बाष्पवारिपटलेन पटेनेव प्रावृतवदनः, विशन्निव दुर्बलीभूतैः स्वाङ्गै- मपत्रपयाङ्गैरेवमग्निव च व्यर्थीभूतभुजोषमाणमायतैर्निःश्वसितैः, पातकीव, अपराधीव, द्रोहीव, मुषित इव, छलित इव, यूथपतिपतनविषण्ण इव वेगदण्डवारणः, सूर्यास्तमयनिःश्रीक इव कमलाकरः, दुर्योधननिधनदु- र्मना इव द्रौणिः, अपहृतरत्न इव सागरो राजद्वारमाजगाम । अवतीर्य च तुरङ्गमादवनतमुखो विवेश राजमन्दिरम् । दूरादेव च विमुक्ताक्रन्दः पपात पादयोः । श्मश्रुरिति । शोकवशेन ततो विच्छित्त्वाद्वा । राजद्वार पर आया । उसके कपड़े मलिन थे, उसकी छाती में शत्रु के बाणों के घाव थे । लोहे के कड़े कीलों वाले परिकर के धारण कर लेने से वह बच निकला था । स्वामी के आदर से मानों उसकी दाढ़ी छाती तक बढ़ आई थी, जिससे उसके शोक का पता चल रहा था। बहुत दिनों से व्यायाम के छूट जाने के कारण उसके हाथ पतले पड़ गए थे और उसका मंगलवलय खिसक कर नीचे कलाई में आ गया था । बिना मन के चबाए हुए पान की लाली शोक की अग्नि से जले हुए हृदय के अंगारे की भांति लग रही थी । उसका अधर लम्बी सांस के निकलते रहने से सूख रहा था, मानों स्वामी के विरह के बाद भी जीवित रहने के अपराध से लज्जित था। आँसुओं की झड़ी ऐसे लगी थी मानों उसके मुँह पर शोकपट ढँका हो । लज्जा के मारे उसके अङ्ग अपने आप में सिमटते जा रहे थे । वह लम्बी सांसों से मानों व्यर्थ पड़ी भुज की गरमी को छोड़ रहा था। वह पातकी, अप- राधी, द्रोही, लुटा हुआ, छला हुआ जैसा लग रहा था। उसकी ऐसी दीन दशा थी जैसे यूथपति के मरने पर तरुण हाथी की हो जाती है। वह उस सरोवर के समान था जो सूर्य के अस्त हो जाने से हो जाता है, जैसे दुर्योधन के मर जाने से अश्वत्थामा दुःखी हुआ उसी प्रकार वह भी राज्यवर्धन के निधन से विषादमग्न था। वह उस समुद्र की भांति था जिसमें से रत्न हर लिया गया हो । घोड़े से उतर कर वह मुँह लटकाए ही राजमंदिर के भीतर गया। दूर ही से धाड़ मार कर वह पैरों पर गिर पड़ा ।