हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
हालखनित्रदात्रयष्टिवृष्टिभिरपि निःसरद्भिरायुषो बलात्कृतकलकलम् , अन्यत्र संघशो घासिकैर्बुसधूलिधूसरितघासजालजालकितजघनैश्च पुराण- पर्याणैकदेशदोलायमानदात्रैश्च शीर्णोर्णाशकलशिथिलमलिनमलकुथैश्च प्रभुप्रसादीकृतपाटितपटच्चरचलबोलकधारिभिश्च धावमानैरुद्धूयमानधूलि- पटलम्, क्वचिदेकान्तप्रवृत्ताश्ववारचक्रचर्च्यमाणागामिगौडविग्रहम्, क्व- चित्पङ्किलप्रदेशपूरणादेशाकुलसकललोकलूयमानतृणपूलकम्, क्वचित्तल- वर्तिवेत्रिवेत्रवित्रास्यमानशाखिशिखरगतविकोशद्विर्वाग्दग्धाब्राह्मणम्, क्वचि- त्कुलुण्ठकपाशविवेष्ट्यमानग्रामीणप्रामाकृष्टकौलेयकम्, क्वचिदन्योन्यविभ- वस्पर्धोद्धुरराजपुत्रवाह्यमानवाजिसंघट्टमण्डितम्, अनेकवृत्तान्ततया कौतु- कजननम्, प्रलयजलधिमिव जगद्ग्रासग्रहणाय प्रवृत्तम्, पातालमिव भाण्डम् । अन्यत्र घासिकैः उद्धूयमानधूलीपट्लमिति संबन्धः । संघशो बहुशः । घासे नियुक्ता घासिकाः । घासजालं घाससंघातः । एकदेशः पश्चिमा दिक् । 'मलकुथैः' इति पाठः । मलकुथा मलपट्टी । छुविरित्यर्थः । अंसोपरिवासं इत्यन्ये । पटच्चरं जीर्णवस्त्रम् । कुलुण्ठकाः शुनां बन्धनलगुडाः । उद्धुरा उद्दामप्रसराः । जगतो चाल से दौड़ कर घुड़सवारों के कुत्तों को झांसा देने लगे । यद्यपि उनपर चारों ओर से ढेले, डंडे, टेढ़ी छड़ी, कुठार, कील, कुदाल, फडुभा, दरांती, लाठी की बरसा होती रहती थी, तथापि आयु के बल से बच निकलते थे । एक ओर घसियारे धूल-धक्कड़ करते दौड़ रहे थे, उनकी जांघों पर भूसों की धूल से मिली हुई घास भर आई थी, घोड़े पर कसी हुई पुरानी काठी के पीछे की ओर उनके दरांत लटक रहे थे । रद्दी ऊन के टुकड़ों से जमाए हुए गुदगुदे और मैले नमदे उनके घोड़ों की पीठ पर पड़े हुए थे, प्रभु के प्रसाद के रूप में फटे हुए कपड़े का फीता उनके सिर से बंधा हिल रहा था । एक तरफ सवारों की टुकड़ी आने वाले गौड़युद्ध के विषय में चर्चा कर रही थी । कहीं पांक वाली जमीन पर पुआल की आँटियाँ बिछाने में लोग जुट जाते थे । कहीं नीचे खड़े दण्डधर सैनिकों के डंडे के डर से उजड्ड ब्राह्मण झट पेड़ों पर चढ़कर गाली-गलौज कर रहे थे । कहीं गांव के लोग कुत्तों को घसीट कर ला रहे थे और कुलुण्ठक ( कुत्ते पालने वाले ) उन्हें अपने फांसों में बांध रहे थे । कहीं परस्पर ऐश्वर्य की स्पर्धा से राजपुत्र घुड़दौड़ मचा रहे थे । नाना प्रकार के वृत्तान्तों से भरे चलते हुए कटक को देखकर कौतुक उत्पन्न होता था । मानों वह कटक प्रलयकाल में समुद्र के समान संसार को गड़प लेने के लिए चल पड़ा था । महाभोगी ( धनिकों, सर्पों ) की रक्षा के लिए पाताल का रूप मानों धारण कर रहा था । परमेश्वर ( सम्राट् , शंकर ) के निवास के लिए कैलास बन गया था । प्रजापतियों के
सप्तम उच्छ्वासः ३७१ ःमहाभोगिनां गुप्तये समुत्पादितम् , कैलासमिव परमेश्वरवसतये सृष्टम् , ःदृश्यमानसकलप्राणिपर्यायं चतुर्युगसर्गकोशमिव प्रजापतीनां क्लेशबहु- लमपि तपःकरणमिव क्रमकारिणं कल्याणानाम् , एवं च वीक्ष्यमाणः कटकं जगाम । आसन्नवर्तिनां च 'तत्रभवता मांधात्रा प्रवर्तिताः पन्थानो दिग्बिज- याय । अप्रतिहतरथरंहसा रघुणा लघुनैव कालेनाकारि ककुभां प्रसाद- नम् । शरासनद्वितीयः करदीचकार चक्रं क्रमागतभुजबलाभिजनधनमदा- वलिप्तानां भूभुजां पाण्डुः । पाण्डवः सव्यसाची चीनविषयमतिक्रम्य राजसूयसंपदे क्रुध्यद्गन्धर्वधनुष्कोटिटांकारकूजितकुञ्जं हेमकूटपर्वतं परा- जैष्ट । संकल्पान्तरितो विजयस्तरस्विनाम् । सहिमहिमवद्व्यवहितोऽप्यु- वाह बाहुबलव्यतिकरकातरः करं कौरवेश्वरस्य किङ्कर इवाकृती द्रुमः । नातिजिगीषवः खलु पूर्वे येनाल्प एव भूभागे भूयांसो भगदत्तदन्तवक्र- ग्रहणं स्वीकरणम्, प्लावनं च । भोगिनो भोगवन्तः, सर्पाश्च । परमेश्वरो हरोऽपि । परितः समन्तादायः । आगमनं पर्यायः । आसन्नेत्यादौ । पार्थिवसुतानामित्येवंप्रायानालापाञ्शृण्वन्नेवाससादावासमिति संबन्धः । तत्रभवता पूज्येन । सव्यसाची अर्जुनः । पराजैष्ट जिगाय । तरस्विनां पराक्रमवताम् । कौरवेश्वरो दुर्योधनः । अकृती अकृतार्थः । द्रुमाख्यः किन्नरराजः । चारों युगों की सृष्टि के कोश की भाँति सारा प्राणिवर्ग उसमें दिखाई पड़ रहा था । यद्यपि उसमें क्लेश ही क्लेश था लेकिन तपस्या की भांति अन्त में कल्याण ही करने वाला था । सम्राट् ऐसे कटक को देखते हुए चले । समीप में रहने वाले पराक्रमी राजपुत्रों ने बातचीत के द्वारा इस प्रकार का प्रोत्साहन दिया—'मान्धाता ने दिग्विजय का मार्ग दिखाया । उसी मार्ग पर चलकर अप्रतिहत रथ, वेग से रघु ने थोड़े समय में दिशाओं को शान्त कर दिया । धनुर्धारी पाण्डु ने वंश- परम्परागत भुजबल के मद में चूर अभिमानी राजाओं को अपना करद बना दिया । पाण्डुपुत्र अर्जुन ने राजसूय यज्ञ के समय चीन देश को पार करके हेमकूट पर्वत के वनों में क्रोधित होकर धनुष की टङ्कार करने वाले गन्धर्वों को जीत लिया । एकमात्र अपने ही सङ्कल्प के अभाव से वीरों की विजय में बाधा होती है। जैसे किन्नरराज द्रुम बरफ से ढँका हिमालय जैसा रक्षक पाकर भी बल के अभाव में कृतार्थ न होकर दुर्योधन का किंकर हो गया । निश्चय ही पहले के राजा विजय के इच्छुक न थे, क्योंकि थोड़ी ही जमीन के
३७२ हर्षचरितम्
क्वाथकर्णकौरवशिशुपालसाल्वजरासंधसिन्धुराजप्रभृतयोऽभवन्भूपतयः । संतुष्टो राजा युधिष्ठिरो यो ह्यसहत समीप एव धनंजयजयजनितजग- त्कम्पः किंपुरुषाणां राज्यम् । अलसश्चण्डकोशो यो न प्राविक्षत्तद्मां जित्वा स्त्रीराज्यम् । ह्रसीय एवान्तरं तुषारगिरिगन्धमादनयोः उत्साहिनः । किष्कुः तुरुष्कविषयाः । प्रादेशः पारसीकदेशः । शशपदं शकस्थानम् । अदृ- श्यमानप्रतिप्रहारे परियात्रे यात्रैव शिथिला । शौर्यशुल्कः सुलभो दक्षिण- पथः । दक्षिणार्णवकल्लोलानिलचलितचन्दनलतासौरभसुन्दरीकृतदरीम- न्दिराद्दर्दुरादद्रेर्नेदीयसि मलयो मलयलग्न एव च महेन्द्रः ।' इत्येवंप्राया- नुद्योगद्योतकानामालापान्पार्थिवकुमाराणां बाहुशालिनां शृण्वन्नेवाससा- दावासम् । मन्दिरद्वारि चोभयतः सबहुमानं भ्रूलताभ्यां विसर्जितराज- लोकः प्रविश्य चावततार बाह्यास्थानमण्डपस्थापितमासनमाचक्राम । अपास्तसमायोगश्च क्षणमासिष्ट ।
सिन्धुनाथो जयद्रथः । ह्रसीयो ह्रस्वतरम् । साङ्गुष्ठया प्रदेशिन्या प्रादेशः । 'प्रादेश- ताळगोकर्णस्तर्जन्यादियुते तते । अङ्गुष्ठे सकनिष्ठे स्याद्वितस्तिर्द्वादशाङ्गुलः ॥' इत्यमरसिंहः । शौर्यकृतः शुल्कः पणो यत्र स शौर्यशुल्कः । अतिशयेनान्तिकं नेदीयः । 'अन्तिकबाढयोर्नेदसाधौ' इति ।
टुकड़े में एक साथ भगदत्त, दन्तवक्र, रुक्मि, कर्ण, दुर्योधन, शिशुपाल, साल्व, जरासंध, जयद्रथ आदि बहुत से राजा राज्य करते थे । राजा युधिष्ठिर कैसे सन्तोषी थे जिन्होंने दिग्विजय द्वारा जगत् को कम्पित कर देने वाले अर्जुन के रहते भी समीप ही किंपुरुषों के राज्य को सह लिया । चण्डकोश कितना आलसी था जिसने पृथिवी को जीत लेने पर भी स्त्रीराज्य में प्रवेश नहीं किया । उत्साही के लिए हिमालय और गन्धमादन पर्वतों में अंतर ही कितना है । तुरुष्कों के देश हाथ भर हैं । पारसिकों का प्रदेश एक बित्ता भर है। शकों का देश खरहे के पैर भर है । परियात्र में सेना की यात्रा ही व्यर्थ है, क्योंकि मुकाबले के लिये कोई दीखता नहीं । दक्षिणापथ शौर्य के धनी के लिए सुलभ है । जिस दर्दुर पर्वत के गुफामन्दिर दक्षिणसमुद्र के कल्लोल की हवा से हिलती हुई चन्दनलताओं की सौरभ-सुगन्धि से भर जाते हैं उसी के निकट ही तो मलयाचल है, एवं मलयाचल से मिला हुआ ही महेन्द्र पर्वत है।' राजपुत्रों की इन बातों को सुनते हुए हर्ष अपने निवास- स्थान में पहुँचे । जब मन्दिर के द्वार पर आये तो अगल-बगल में खड़े राजाओं को आदर- पूर्वक भौंह के संकेत से विदा करके अन्दर प्रवेश किया और महल के बाह्य आस्थानमण्डप
सप्तम उच्छ्वासः ३७३ अथ तत्र प्रतीहारः पृथ्वीपृष्ठप्रतिष्ठापितपाणिपल्लवो विज्ञापितवान्— 'देव ! प्राग्ज्योतिषेश्वरेण कुमारेण प्रहितो हंसवेगनामा दूतोऽन्तरङ्गस्तो- रणमध्यास्ते' इति । राजा तु 'तमाशु प्रवेशय' इति सादरमादिदेश । अथ दक्षतया क्षितिपालादराच्च प्रतीहारः स्वयमेव निरगात् । अनन्तरं च हंसवेगः सविनयमाकृत्यैव नयनानन्दसंपादनसुभगाभोगभद्रतया समुल्ल- ङ्घ्यमानगुणगरिमा प्रभूतप्राभृतभृतां पुरुषाणां समूहेन महतानुगम्यमानः प्रविवेश राजमन्दिरम् । आरादेव पञ्चाङ्गालिङ्गिताङ्गनः प्रणाममकरोत् । 'एह्येहि' इति सबहुमानमाहूतश्च प्रधावितोऽपसृतः पादपीठलुलितललाट- लेखो न्यस्तहस्तः पृष्ठे पार्थिवेनोपसृत्य भूयो नमश्चक्रे । स्निग्धनेरेन्द्रदृष्ट्या निर्दिष्टमविप्रकृष्टं स प्रदेशमध्यास्त । ततो राजा तिरश्चीं तनुमीषदिव दधानश्चामरग्राहिणीमन्तरालवर्तिनीं समुत्सार्य संमुखीनस्तं सप्रश्रयं पप्रच्छ—'हंसवेग ! श्रीमान्कच्चित्कुशली कुमारः ?' इति । स तमन्ववा- दीत्—'अद्य कुशली येनैवं स्नेहरस्रपितया सौहार्दद्रवार्द्रया सगौरवं गिरा पृच्छति देवः' इति । प्राग्ज्योतिषं कामरूपाख्यो देशः । समुल्लङ्घ्यमानो नीयमानः । संमुखीनौऽभिमुखः भोगः पालनम् । में स्थापित आसन पर विराजमान हुए । वहाँ से समायौग ( फौजी परेड ) के बर्खास्त होने की सूचना देकर क्षण भर वहीं ठहरे । इसी समय वहाँ आकर प्रतिहार ने जमीन पर हाथ टेक कर सूचना दी—'देव, प्राग्ज्योतिषेश्वर कुमार द्वारा भेजा हुआ हंसवेग नाम का अन्तरंग दूत राजद्वार पर खड़ा है ।' राजा ने 'शीघ्र उसे बुलाओ' यह आदरपूर्वक आज्ञा दी । तब बात समझ जाने वाला प्रतीहार राजा के आदर से स्वयं बाहर निकल गया । तत्पश्चात् हंसवेग ने भेंट की। सामग्री लाने वाले अनेक पुरुषों के साथ विनयपूर्वक राजमन्दिर में प्रवेश किया । आँखों को आनन्दित करने वाली वह अपनी सुभग और भद्र आकृति से ही गुणों का गौरव प्राप्त कर रहा था । दूर ही से उसने अपने पाँच अंगों से पृथिवी को छूते हुए राजा को प्रणाम किया । राजा ने 'आओ आओ' कहकर उसे आदर के साथ बुलाया । वह दौड़कर उनके पास आकर पादपीठ पर सिर रगड़ने लगा । तब राजा ने उसकी पीठ पर अपना हाथ रखा । उसने फिर उन्हें प्रणाम किया । राजा ने स्नेहभरी दृष्टि से उसे बैठने के लिए संकेत किया । तब वह थोड़ी दूर पर बैठ गया । तब राजा ने कुछ तिरछे होकर शरीर को झुकाते हुए चामरग्राहिणी को बीच से हटाकर दूत की ओर मुँह करके प्रेमपूर्वक पूछा—'हंसबेग, श्रीमान् कुमार तो कुशल से हैं ?' उसने उत्तर दिया—'जब इतने स्नेह से सनी और
३७४ हर्षचरितम् स्थित्वा च मुहूर्तमिव पुनः स चतुरमुवाच- 'चतुरम्भोधिभोगभूति- भाजनभूतस्य देवस्य सद्भावगर्भमपहाय हृदयमेकमन्यदनुरूपं प्राभृतमेव दुर्लभं लोके तथाप्यस्मत्स्वामिना संदेशमशून्यतां नयता पूर्वजोपार्जितं वारुणातपत्रमाभोगाख्यमनुरूपस्थानन्यासेन कृतार्थीकृतमेतत् । अस्य च कुतूहलकृन्ति बहून्याश्चर्याणि दृश्यन्ते । तथा हि-प्रतिदिवसं प्रविशति शैत्यहेतोश्छायायाः किरणसहस्रादेकैकः सोमस्य रश्मिरस्मिन् । यस्मिन्प्र- विष्टे प्रध्यानानन्तरं स्वादवो दन्तवीणोपदेशाचार्याश्च्योतन्ति चन्द्रभासा- मम्भसां मणिशलाकाभ्यो यावदिच्छमच्छा धाराः । प्रचेता इव यश्चतु- र्णमर्णवानामधिपतिर्भूतो भावी वा तमिदमनुगृह्णाति च्छायया नेतरम् । इदं च न सप्ताचिर्दहति, न पृषदश्वो हरति, नोदकमार्द्रयति, न रजांसि मलिनयन्ति, न जरा जर्जरयतीति । एतत्तावदनुगृह्णातु दृशा देवः संदेश- मपि विस्रब्धं श्रोष्यति ।' इत्येवमभिधाय विवृत्यात्मीयं पुरुषमभ्यधात्- 'उत्तिष्ठ । दर्शय देवस्य' इति । शीतोद्भवो दन्तानामन्योन्याघातो दन्तवीणा । सप्ताचि॑रग्निः । पृषदश्वो वायुः । विवृत्य स्थित्वा । सौहार्द से आई अपनी वाणी से गौरव के साथ देव पूछ रहे हैं तो वे आज सब प्रकार कुशली हुए । कुछ देर बाद उसने फिर निपुणता के साथ कहा- 'चारों समुद्र की लक्ष्मी के भाजन देव को देने योग्य सद्भाव से भरे एक हृदय को छोड़कर लोक में और दूसरा उपहार क्या है ? फिर भी हमारे स्वामी ने पूर्वजों द्वारा उपार्जित आभोग नामक यह वारुण आतपत्र सन्देश के साथ सेवा में भेजकर योग्य स्थान में रखने से इसे कृतार्थ कर दिया । इसके अनेक कुतूहलजनक आश्चर्य देखे गये हैं । छाया की ठण्डक पाने के लिए प्रतिदिन चन्द्रमा की एक-एक किरण इसमें प्रवेश करती है। उसके प्रवेश करने पर चन्द्र के समान मणिशलाकाओं से मधुर, स्वच्छ और दाँतो को खटखटा देने वाली धारा निकलने लगती है । वरुण के समान जो चारों समुद्रों का अधिपति हुआ है अथवा होगा उसी पर इस छत्र की छाया पड़ेगी दूसरे पर नहीं। इस छत्र को अग्नि नहीं जला सकती, हवा नहीं उड़ा सकती, पानी गीला नहीं कर सकता, धूल मलिन नहीं कर सकती, एवं जरा इसे जर्जर नहीं बना सकती । देव इस पर दृष्टिपात करने का अनुग्रह करें, फिर एकान्त में संदेश भी सुनें ।' यह कह कर वह पीछे मुड़ कर अपने नौकर से बोला- 'उठो, देव के सामने वह छत्र दिखाओ ।'
[Header] सप्तम उच्छ्वासः ३७५
स च वचनान्तरमुत्थाय पुमानूर्ध्वंचकार तद्धौतदुकूलकल्पिताच्च निचोलकादकोषीत् । आकृष्यमाण एव च यस्मिन्नतिसितमहसि सरभस- महासीव हरेण रसातलादुदलासीव शेषफणिफणामण्डलेन, अस्था- यीव चक्रीभूयान्तरिक्षे क्षीरोदेन, अघटीव गगनाङ्गने गोष्ठीबन्धः शारदेन बलाहकव्यूहेन, विश्रान्तमिव विततपक्षतिना वियति पितामहविमानहंस- यूथेन, अत्रिनेत्रनिर्गतस्य धवलधाममण्डलममनोहरो दृष्ट इव जनेन जन्म- दिवसः कुमुदबन्धोः, प्रत्यक्षीकृत इवोद्गमनक्षणो नारायणनाभिपूण्डरीकस्य, आहितेव कौमुदी प्रदोषदर्शनानन्दतृप्तिरदृणाम्, उद्माङ्क्षीदिव मन्दाकिनी- पुलिनमण्डलं महदम्बरोदरे, परिवर्तित इव दिवसः पौर्णमासीनिशया मन्दमन्दमिन्दूद्यसंदेहदूयमानमानसैर्विघटितं घटमानचञ्चुच्युतमृणाल- कोटिभिरासन्नकमलिनीचक्रवाकमिथुनैः शरज्जलधरपटलाशङ्कासंकोचित- केकारवमूकमुखपुटैः पराङ्मुखीभूतं भवनशिखण्डिमण्डलैः, प्रबुद्धमाबद्ध- चन्दान्ब्दोद्दामोल्लहलपुट्टाट्टहासविशदं कुमुदषण्डैः ।
निचोलकादाच्छादनप्रसेवकात् । अकोषीन्निष्कासितवान् । उदलास्युल्लसितम् । अस्थायि स्थितम् । अघटि घटितम् । विश्रान्तं व्यश्रमत । उद्गमनक्षण उत्पत्ति- समयः । उदमाङ्क्षीदुन्मग्नम् । परिवर्तितः स्वरूपः कृतः ।
उसके कहने पर उसने उठ कर छत्र को ऊँचा किया और सफेद दुकूल के बने हुए खोल में से उसे निकाला । उस छत्र के बाहर खींचे जाते ही अत्यन्त उज्ज्वल प्रकाश भर गया, मानों शिव ने जोर से अट्टहास किया हो या पाताल से होकर शेषनाग का फणामण्डल निकल आया हो, या चक्राकार क्षीरसमुद्र आकाश में स्थिर हो गया हो, या शरत्कालीन मेघसमूह आकाश के प्राङ्गण में सभा करने बैठा हो, या ब्रह्माजी के विमान का हंसयूथ आकाश में पंख फैला कर विश्राम लेने लगा हो । मानों लोगों ने अत्रि के नेत्र से निकले हुए उज्ज्वल धाममंडल से मनोहर चन्द्रमा का जन्मदिन देख लिया । विष्णु के नाभिकमल का उद्भवकाल प्रत्यक्ष देखने में आया । आँखों को कौमुदी- महोत्सव के देखने का आनन्द पूर्ण मिल गया । विशाल आकाश के मध्य में मन्दाकिनी की रेत मानों ऊपर उठ आई हो । दिन ही मानों पूनम की रात के रूप में बदल गया । समीप के कमलिनी-बनों में रहने वाले जोड़े चक्रवाक जो परस्पर मृणाल का आदान- प्रदान कर रहे थे, मन्द-मन्द उदित होते हुए चन्द्रमा के संदेह से दुखी होकर विघटित हो गए । उनके चंचु से मृणाल छूट कर गिर गए । भवन के मयूरों ने उसे शरत्क.क
३७६ हर्षचरितम्
चित्रीयमाणचेताश्च सराजको राजा दण्डानुसाराधिरोहिण्या दृष्टया सादरमैक्षिष्ट तत्तिलकमिव त्रिभुवनस्य, शैशवमिव श्वेतद्वीपस्य, अंशा- वतारमिव शरदिन्दोः, हृदयमिव धर्मस्य, निवेशमिव शशिलोकस्य, दन्त- मण्डलद्युतिधवलं मुखमिव चक्रवर्तित्वस्य, मौक्तिकजालपरिकरसितं सीमन्तचक्रमिव दिवः, बहलज्योत्स्नाशुक्लोदरमैन्दवमिव परिवेषवलयं शौक्ल्यापहसितशङ्खश्रीकं श्रवणमण्डलमिव निश्चलतां गतमैरावतस्य श्वेतगङ्गावर्तपाण्डुरं पदमिव त्रिभुवनवन्दनीयं त्रिविक्रमस्य, प्रचेतसचूडा- मणिमरीचिशिखाभिरिव श्लिष्टाभिर्मानसबिसतन्तुमयीभिश्चामरिकावली- भिर्विरचितपरिवेषम्, उपरि चक्रवर्तिलक्ष्मीनूपुरस्वनश्रवणदोहदनिश्चलेनेव लक्ष्मणा विततपत्रेण हंसेन सनाधीकृतशिखरम्, स्पर्शवता च प्रभावस्त- म्भितेन मन्दाकिनीमृणालेन मुकुलितफणेन वासुकिनेव नीतेन दण्डतां द्योतमानम्, धवलिम्ना क्षालयदिव नक्षत्रपथम्, प्रभाप्रवाहप्रथिम्ना प्रावृण्व-
निवेशं स्थानम् । दन्तमण्डलकं दशनकृतं चक्रवालम्, दशनसमूहश्च । मुख- मारम्भः, वक्त्रं च । परिकरः परिवेष्टनम् । परिवेषवलयं परिधिकटकम् । 'स्यादा- वर्तोऽम्भसां भ्रमः' । आवर्त्तनमावर्त्तः । प्रावृण्वदाच्छादयत् ।
का मेघ समझ कर केका की आवाज बन्द कर दी और पराङ्मुख हो गए। कुमुद चन्द्र के प्रति स्नेह के कारण अपने दलों को विकसित करके अट्टहास के साथ जग पड़े। अन्य राजाओं के साथ देव हर्ष ने विस्मय-विमुग्ध होकर दण्ड के अनुसार दृष्टि को ऊपर उठाते हुए उस अद्भुत महत् छत्र को ध्यानपूर्वक देखा। वह छत्र मानों त्रिभुवन का तिलक, श्वेतद्वीप का शैशव, शरत्काल के चन्द्रमा का अंशावतार, धर्म का हृदय, चन्द्रलोक का आयतन था, और मानों दाँतों की चमक से उज्ज्वल चक्रवर्तित्व का मुख था । उसके चारों ओर मोतियों के जालक लटक रहे थे, मानों स्वर्गलोक का केश-विन्यास हो । उसके मध्यभाग में चाँदनी छिटक रही थी, मानों चन्द्रमा के मंडल का घेरा हो । अपनी सफेदी से वह शंख की श्री को हँस रहा था, मानों ऐरावत का चंचलता से रहित श्रवणमण्डल हो। वह गंगा की भँवरियों के समान उज्ज्वल था, मानों विष्णु का त्रिभुवनवन्दनीय चरण हो। मानसरोवर के बिसतन्तुओं से मानों बनी हुई छोटी-छोटी चौरियाँ उसके चारों ओर लटक रही थीं, मानों वरुण की चूड़ामणि की किरणें हों। उसके शिखर पर पंख फैलाए हंस का चिह्न बना था, जो मानों चक्रवर्ती की लक्ष्मी के नूपुर की आवाज सुनने के आनन्द में निश्चल था। स्पर्श से सुख देने वाला मन्दाकिनी का मृणाल या प्रभाव से स्तम्भित होकर फनों को सिकोड़ते हुए वासुकिनाग ही उसका
सप्तम उच्छ्वासः ३७७ दिव दिवसम्, समुच्छ्रायेणाधःकुर्वन्निव दिवम्, उपरिस्थितमिव सर्व- मङ्गलानाम्, श्वेतमण्डपमिव श्रियः, स्तबकमिव ब्रह्मस्तम्बस्य, नाभिम- ण्डलमिव ज्योत्स्नायाः, विशदहासमिव कीर्त्तेः, फेनराशिमिव खड्गधारा- जलानाम्, यशःपटलमिव शौर्यशालितायाः, त्रैलोक्याद्भुतं महच्छत्रम् । दृष्टे च तस्मिन्द्राज्ञा प्रथमे शेषमपि प्राभृतं प्रकाशयांचक्रुः क्रमेण कार्माः । तद्यथा परार्घ्यरत्नांशुशोणीकृतदिग्भागान्, भगदत्तप्रभृतिख्यात- पार्थिवपरंपरागतानाहृतलक्षणानलंकारान्, प्रभालेपिनां च चूडामणीनां समुत्कर्षान्, क्षीरोदधेर्धवलताहेतूनीव हारान्, अनेकरागरुचिरवेत्रकरण्ड- कुण्डलीकृतानि शरच्चन्द्रमरीचिरुचीनि शौचक्षमाणि क्षौमाणि, कुशलशि- ल्पिलोकोल्लिखितानां च शुक्तिशङ्खगल्वर्कप्रमुखानां पानभाजनानां निच- यान्, निचोलकरक्षितरुचां च रुचिरकाञ्चनपत्रभङ्गभङ्गुराणामतिबन्धुर- परिवेशानां कार्दरङ्गचर्मणां संभारान्, भूर्जत्वक्कोमलाः स्पर्शवतीर्जातिर- कार्मा भृतकाः । आहतलक्षणान्गुणैः प्रसिद्धान् । उक्तं च—'गुणैः प्रतीते तु कृतलक्षणाहतलक्षणौ' इति । समुत्कर्षानतिशयान् गल्वर्को मसाराख्यो मणिभेदः, चन्द्रकान्त इत्यन्ये । शौचो धावनम् । कार्दरङ्गचर्मणां कार्दरङ्गदेशभवानां स्फोटका- दण्ड बन गए हों । वह मानों अपनी सफेदी से आकाश को धो रहा था। प्रभा के बढ़े हुए प्रभाव से दिन को ढँक रहा था। अपनी ऊँचाई से आकाश को नीचा कर रहा था। सब मंगलों के वह मानों ऊपर स्थित था। छत्र क्या था, मानों लक्ष्मी का श्वेतमंडप (चाँदनी में विहार करने के लिए ऐसा मंडप जिसकी सजावट श्वेत रंग की हो) था; श्वेतद्वीप का बाल रूप था; ज्योत्स्ना का नाभिमण्डल था; कीर्ति का विशद हस्त था; खड्ग के धाराजल की फेनराशि था और शूरता का यशःपटल था । देव हर्ष जब छत्र को देख चुके तब भृत्यों ने बचे हुए अन्य उपहारों को भी उघाड़ कर दिखाया । वे इस प्रकार थे—आभूषण जो जड़े हुए बहुमूल्य रत्नों की किरणों से दिग्भाग को रंगीन कर रहे थे, जो भगदत्त आदि प्रसिद्ध राजाओं के समय से कुल में चले आ रहे थे, जिन पर भाँति-भाँति के लक्षण या चिह्न ठप्पे से बनाए गये थे । चूडामणि या शिरोभूषण, जिनमें बहुत चमक थी। हार, जो क्षीरसमुद्र को भी धवलता के मानों कारण थे । क्षौम वस्त्र, जो शरत्कालीन चन्द्रमा की तरह चिट्टे रङ्ग के थे और जो धुलाई सह सकने वाले थे और नाना वर्ण की रङ्ग-बिरंगी बेंत की करंडियों (झाँपियों) में कुण्डलित करके रखे गए थे। अनेक प्रकार के पान-भाजन या मधुपान करने के चषक, जो सीप, शंख, गल्वर्क के बने हुए थे और जिनपर चतुर कारीगरों ने भाँति-भाँति की
३७८ हर्षचरितम् पट्टिकाः, चित्रपटानां च श्रदीयसां समूरूकोपधानादीन्विकारान्, प्रियङ्गु- प्रसवपिङ्गलत्वञ्चि चासनानि वेत्रमयान्यगुरुवल्कलकल्पितसंचयानि च सुभाषितभाञ्जि पुस्तकानि, परिणतपाटलपटोलत्विषि च तरुणहारीतह- रिन्ति क्षीरक्षारीणि च पूगानां पल्लवावलम्बीनि सरसानि फलानि, सह- कारलतारसानां च कृष्णागुरुतैलस्य च कुपितकपिकपोलकपिलकापोति- कापलाशकोशीकवचिताङ्गीः स्थवीयसीर्वेणवीनार्डीश्च, पट्टसूत्रप्रसेवकार्पि- तांश्च भिन्नाञ्जनवर्णस्य कृष्णागुरुणो गुरुपरितापमुषश्च गोशीर्षचन्दनस्य, तुषारशिलाशकलशिशिरस्वच्छसितस्य च कर्पूरस्य, कस्तूरिकाकोशकानां च पक्वफलजूटजटिलानां च कक्कोलपल्लवानाम्, लवङ्गपुष्पमञ्जरीणां जातीफलस्तबकानां च राशीन्, अतिमधुरमधुरसामोदनिर्हारिणी- नाम् । जातिपट्टिकाः श्रेष्ठानि जघनग्रन्थनानि । संचयाः पत्रसमूहाः । पटोलस्तिक्तक ओषधिभेदः । उक्तं च - 'अथ कुलकं पटोलस्तिक्तकः पटुः' इति । कापोतिका ओषधिभेदः । गोशीर्षचन्दनस्य चन्दनभेदस्य । कोशका नाभयः । अंतिमधुरं मधुरसाया इवामोदानि हरन्ति मुञ्चन्ति यास्ताः । मधुरसा द्राक्षा । उक्तं च- 'मृद्वीका गोस्तनी द्राक्षा माध्वी मधुरसेति च' इति । अन्ये मधुरसं मकरन्दं द्रव- नक्काशी का काम किया था। कार्दरङ्ग द्वीप से आइ हुई ढालें जिनपर आव की रक्षा के लिए खोल चढ़े थे, इनके काले चमड़े पर सुनहली फूल-पत्तियों के कटाव खचित थे और इनकी गोलाई ऊंची-नीची थी। मोजपत्र की तरह मुलायम स्पर्श से सुख देने वाली जाती-पट्टिकाएँ या कटिप्रदेश में बाँधने के काम में आने वाले एक प्रकार के बढ़ियाँ पटके। नरम चित्रपटों (जामदानी) के बने हुए तकिये जिनके भीतर समूर या पक्षियों के बाल या रोँए भरे थे। बेंत के बुने हुए आसन, जिनका रङ्ग प्रियंगुमजरी की तरह ललछौँही पीली झलक का था। सुभाषितों से भरी पुस्तकें जिनके पन्ने (संचय) अगुरु को पीट कर बनाए गए थे। हरी सुपारियों के झुग्गे, जिनमें पल्लवों के साथ सरस फल झूम रहे थे, इनका रङ्ग पके हुए लाल परवल की तरह ललछौँह और हरियल पक्षी की तरह हरि- याली लिए था, इनसे दूध टपक रहा था। सहकार लताओं के रस से भरी हुई मोटी बाँस की नलियाँ, जिनके चारों ओर क्रोधित बन्दर के कपोल की भाँति कपोतिका के लाल-पीले पत्ते बँधे हुए थे। काले अगुरु का तेल भी इसी प्रकार की मोटी बाँस की नलियों में भर कर और पत्तों में लपेट कर लाया गया था। पटसन के बने हुए बोरों में भर कर काले अगुरु के ढेर लगाए गए थे, जिनका रङ्ग छूटे हुए अंजन की तरह था। गरमी में ठंडक पहुँचाने वाले गोशीर्ष नामक चन्दन की राशियाँ बरफ के शिखाखण्ड की
सप्तम उच्छ्वासः ३७५ श्रोल्लक्ककलशीः सितासितस्य च चामरजातस्य निचयान्, अवलम्बमान- तूलिकालाबुकांश्च लिखितानेकलेख्यफलकसंपुटान्, कुतूहलकृन्ति च कनकश्शृङ्खलानियमितग्रीवाणां किंनराणां च वनमानुषाणां च जीवञ्जीव- कानां च जलमानुषाणां च मिथुनानि, परिमलामोदितककुभश्च कस्तूरि- काकुरङ्गान्, गेहपरिसरणपरिचिताश्च चमरीः, चामीकररसचित्रवेत्रपञ्जरा- न्तर्गतांश्च बहुसुभाषितजल्पाकजिह्वांश्च^१ शुकशारिकाप्रभृतीन्पक्षिणः, प्रवा- लपञ्जरगतांश्च चकोरान्, जलहस्तिनामुद्रकुम्भमुक्ताफलदामदन्तुराणि च दन्तकाण्डकुण्डलानि । राजा तु छत्रदर्शनात्प्रहृष्टहृदयः प्रथमप्रयाणे शोभननिमित्तमिति मनसा जग्राह । हंसवेगं च प्रीयमाणो बभाषे—'भद्र ! सकलरत्नधाम्नः परमेश्वरशिरोधारणार्हस्यास्य महातपत्रस्य महार्णवादिव कुमुदबान्धवस्य माहुः । उल्लकः सुगन्धिफलविशेषरसः । आसवभेद इत्यन्ये । तूलिका ऊर्जिका । यया चित्रं क्रियते । अलाब्यस्तुम्ब्यः । प्रवालो विद्रुमः । उक्तं च—'अथ विद्रुमः पुंसि प्रवालं पुंनपुंसकम्' इति । 'नीहारो मिहिका चाथ' । तरह ठंडे सफेद और साफ कपूर के डले, कस्तूरी के नाफे (थैली) जो कस्तूरी मृगों की नाभि से निकलते हैं। कक्कोल के पक्के फलों से युक्त कक्कोलपल्लव । लवंगपुष्पों की मंजरियाँ, जायफल के गुच्छे, जस्ते की कपड़े चढ़ी कलसी या सुराहियाँ, जिनमें अत्यन्त मीठा मधुरस भर कर लाया गया था, जिनकी भीनी सुगन्धि बाहर फैल रही थी। चित्र- फलों के जोड़े, जिनमें भीतर की ओर चित्र लिखे थे और उनके एक ओर तूलिका एवं रङ्ग रखने के लिए छोटी अलाबू की कुप्पियाँ लटक रही थीं। कुतूहल उत्पन्न करने वाले भाँति-भाँति के पशु-पक्षी जैसे सोने की श्रृंखलाओं से गर्दन में बँधे हुए किन्नर, वन- मानुस, जीवंजीवक, जलमानुषों के जोड़े, दिशाओं में सुगन्धि फैलाते हुए कस्तूरीहिरन, घरों में विचरने वाली विश्वासभरी चँवरी गाय, सुनहले रंग से बेंत के पिंजरों में अनेक प्रकार के सुभाषित पाठ करने वाले शुकसारिका प्रभृति पक्षी-मूँगे के पिंजरों में बैठे हुए चकोर, जलहस्तियों के मस्तक से निकलने वाले मुक्ताफल से जड़े हुए हाथीदाँत के कुण्डल। छत्र देखते ही राजा का हृदय प्रसन्नता से भर गया और उसने पहले प्रस्थान के समय मन में उसे शुभ निमित्त समझ कर स्वीकार किया। उन्होंने स्नेहपूर्वक हंसवेग से कहा— 'भद्र, सब प्रकार के रत्नों से भरे हुए सम्राट् के सिर पर धारण करने योग्य इस महाछत्र १. जातीः कौशिकशुक ।
३८० हर्षचरितम् कुमाराल्लाभो न विस्मयाय । बालविद्याः खलु महतामुपकृतयः' इति । अपनीते च तस्मात्प्रदेशात्प्राभृतसंभारे क्षणमिव स्थित्वा 'हंसवेग ! विश्रम्यताम्' इति प्रतीहारभवनं विसर्जयांबभूव । स्वयमप्युत्थाय स्नात्वा मङ्गलाकाङ्क्षी प्राङ्मुखः प्राविशदाभोगस्य छायाम् । अथ विशत एवास्य छायाजन्मना जडिम्ना चूडामणितामनीयतेव शशिबिम्बमम्बुबिन्दुमुचश्चुम्बुरिव चन्द्रकान्तमणयो ललाटतटं कर्पूररे- णव इव व्यलीयन्त लोचनयुगले गले गलत्तुहिनकणनिकरकृतनीहारा हारा इवावबध्यन्त हरिचन्दनरसासारेणेवापाति संततमुरसि कुमुदमयमिव हृदयमभवदतिशिशिरमन्तर्हितहिमशिलेव विलीयमाना व्यलिम्पदङ्गानि । जातविस्मयश्चाकरोन्मनसि एकमजर्यं संगतमपहाय काऽस्त्यन्या प्रतिकौ- शलिकेति । आहारकाले च हंसवेगाय धवलकर्पटप्रावृतधौतनालिकेर- परिगृहीतं विलेपशेषं चन्दनमङ्गस्पृष्टे च वाससी शरत्तारकाकारतारमुक्ता- स्तबकितपदं परिवेशं नाम कटिसूत्रकम् अतिमहार्हपद्मरागालोकलोहि- का कुमार से लाभ होना उस प्रकार आश्चर्यजनक नहीं, जिस प्रकार क्षीरसमुद्र से चन्द्रमा का उद्भव होना । महापुरुष लोग उपकार के लड़कों की खेल की विद्या की तरह पहले से ही जान जाते हैं । प्राभृत की सामग्री के वहाँ से हटा लिए जाने पर क्षणभर के बाद हंसवेग को 'तुम विश्राम करो' यह कह कर प्रतिहार-भवन में भेजा । स्वयं उठकर स्नान करके मंगल की आकांक्षा से प्राङ्मुख होकर आभोग नामक उस छत्र के नीचे छाया में बैठ गए । जब हर्ष ने छत्र की छाया में प्रवेश किया तब उसकी ठंडक से मानों चन्द्र की किरणें ही घनीभूत होकर उसकी चूड़ामणि बन गईं । चन्द्रकान्तमणियाँ पसीजने लगीं और जलकण उनके ललाट पर छा गए । उनकी आँखों में कपूर का आँजन मानों लग गया । गले में बरफ के टुकड़ों के छोटे-छोटे फुहारे हार के समान कतार से बँध गए । उनके वक्षपर मानों हरिचन्दन रस बरसने लगा । हृदय मानों कुमुदों से भर कर अत्यन्त शिशिर हो गया । अदृश्य रूप में मानों बरफ की शिला उनके अङ्गों पर पिघलने लगी । आश्चर्य से भर कर उन्होंने मन में सोचा—'आमरण मैत्री के अतिरिक्त इस प्रकार से सुंदर उपहार का बदला क्या हो सकता है?' भोजन के अवसर पर राजा ने हंसवेग के लिए सफेद वस्त्र लपेट कर नारियल के साथ अपने लगाने से बचा हुआ चन्दन भेजा और उसके साथ ही अपने अङ्ग से छुवाए हुए परिधानीय वस्त्रयुगल शरत्कालीन तारों की आकृति वाले मोतियों से बना हुआ परिवेश नामक कटिसूत्र और बहुमूल्य जड़े हुए पद्मराग
सप्तम उच्छ्वासः ३८१ तीकृतदिवसं च तरङ्गकं नाम कर्णाभरणं प्रभूतं च भोज्यजातं प्राहिणोत् । एवंप्रायेण च क्रमेण जगाम दिवसः । ततः कटकस्थबलबहलधूलिधूसरितवपुरंशुमाली मलीमससङ्गमिव क्षालयितुमपरजलनिधिमवातरत् । आभोगातपत्रप्रदानवार्तामिव निवेद- यितुं वरुणाय वारुणीं दिशमयासीत् । मुकुलायमानसकलकमलवना प्रमुख एव बद्धसेवाञ्जलिपुटेव सद्वीपा भूरभूद्भूपतेः । भूपालानुरागमय इव निखिलजीवलोकलोकाञ्जलिबद्धबन्धुर्जगज्जग्राह संघ्यारागः । गौडा- पराधशङ्किनीव श्यामतां प्रपेदे दिक्प्राची । प्रचिततिमिरनिर्वाहा निर्वाणा- न्यनृप्रतापानलकलापेव कालिमानमतानीन्मेदिनी । मेदिनीशप्रदोषा- स्थानपुष्पनिकरमिव विकचतगररुचिरमवचकरुरुडुनिकरमविरलं ककुभः । स्कन्धावारगन्धगजमदामोदधावितस्येव मार्गो वियति विरराज रजःपा- ण्डुरैरावतस्य । कुपितनृपव्याघ्राघ्रातामुपसृष्टामित पौरुहू्तीं विहाय विहा- यस्तलमारुरोह रोहिणीरमणः । प्रयाणवार्ता इव मानिनीनां हृदयभेदिन्यो कटकं हस्त्यश्वादीनां सर्वेषां संनिवेशदेशः । तत्स्थं बलं सैन्यम् । तगरं पिण्डी- भवनम् । नृपव्याघ्रो राजशार्दूलः, हर्षः । उपसृष्टां सोपद्रवाम् । पौरुहू्तीं ऐन्द्रीम् । रोहिणीरमणश्चन्द्रः, वृषभश्च । रोहिणी गौः । उक्तं च—'माहेयी सौरभेयी गौरुस्रा की किरणों से दिन में लाला बिखेरता हुआ तरंगक नाम का कर्णाभरण एवं बहुत-सा भोजन का सामान भेजा। इस प्रकार वह दिन व्यतीत हुआ । तब सूर्य कटक की सेना से उड़ी हुई धूल से मानों धूसरित होने के कारण अपने मलिन अङ्गों को धोकर साफ करने के लिए पश्चिम समुद्र में अवतीर्ण हुआ या हर्ष को आमोग नामक छत्र के प्राप्त होने का संदेश निवेदन करने के लिए पश्चिम दिशा में वरुण के पास पहुँचा। कमलों के वन मुकुलित होने लगे, मानों राजा के सम्मुख द्वीपों के साथ पृथिवी सेवा करने के लिए अञ्जलिपुट बाँधे खड़ी हो । राजा के अनुराग से भरा हुआ संध्याराग जो सारे जीवलोक के लिए निवासी लोगों के बँधे अञ्जलिपुट का बन्धु है, जगत् में भर गया । पूर्व दिशा मानों गौड़ाधिप के अपराध से डर कर मलिन हो गई । पृथिवी पर गाढ़ा अन्धकार छा गया मानों पृथिवी ने अन्य राजाओं के प्रतापानल के बुझ जाने से उसकी कालिमा को फैला दिया हो । दिशाओं ने राजा के सायंकालीन सभा- मण्डल पर पुष्पसमूह के समान खिले हुए तगर पुष्पों की भाँति तारों को बिखेर दिया। आकाश में मानों स्कन्धावार के गन्धगजों की मदगन्ध सूँघ मुठभेड़ के लिये दौड़ने से ऐरावत का मार्ग धूल से भर गया । रोहिणीरमण (रोहिणी का पति) चन्द्रमा रूपी (रोहिणी
३८२ हर्षचरितम् ययुरिन्दुदीधितयो दश दिशः। नवनृपदण्डयात्रात्रासातुरा इव तरलित- सत्त्ववृत्तयश्चक्षुभुः पतयो वाहिनीनाम्। चिन्तेव भूभृतां हृदयानि विवेश गुहाविवराणि विमुक्तसर्वाशातिमिरसंततिः । प्रतिसामन्तचक्षुषामिव ननाश निद्रा कुमुदवनानाम् । अस्यां च वेलायां विततवितानतलवर्ती नरेन्द्रो 'यात तावत्' इति विसर्जितानुजीविनो हंसवेगमादिष्टवान्—'कथय संदेशम्' इति । प्रणम्य स कथयितुं प्रास्तावीत्—'देव ! पुरा महावराहसंपर्कसंभूतगर्भाया भगवत्या भुवा नरको नाम सूनुरसावि रसातले । वीरस्य यस्याभवन्बाल्य एव पादप्रणामप्रणयिनश्चूडामणयो लोकपालानाम् यस्य च त्रिभुवनभुजो भुजशौण्डस्य भवनकमलिनीचक्रवाकीकोपकुटिलकटाक्षेक्षितोऽपि भय- माता च शृङ्गिणी । अर्जुन्द्यन्ध्या रोहिणी स्यादुत्तमा गोषु नैचिकी ॥' इति । वृष- भश्च कुपितव्याघ्राघ्रातामत एव सोपद्रवां दिशं विहाय स्थानान्तरमारोहति । मानः प्रियाविषये, अन्यत्र,-धीरविषये । सत्त्वानि प्राणिनः, धैर्यं च सत्त्वम् । वाहिनीनां सेनानाम् , नदीनां च । आशा दिशः, आस्था च । निद्रा संकोचः, स्वापश्च । अर्थात् गौ का पति ) वृषभ क्रोधित राजा रूपा व्याघ्र से आक्रान्त पूर्व दिशा रूपा गाय को छोड़कर आकाश पर चढ़ आया । मानिनियों के हृदय को विदीर्ण करने वाली चन्द्रमा की किरणें सैनिकप्रयाण की वार्ता के समान आकाश में फैल गई । राजा की नई दण्डयात्रा के त्रास से आतुर शत्रु के सेनापतियों का धैर्य नष्ट हो गया ( समुद्र और उनके जलजन्तु खलबला उठे) । समस्त दिशाओं को छोड़ कर अन्धकारसन्तति गुहाविवरों में उस प्रकार घुस गई जैसे राजाओं के हृदय में आशा से रहित चिन्ता । शत्रु- सामन्तों की आँखों के समान ही कुमुदवनों की निद्रा न जाने कहाँ चली गई । इस समय हर्ष फैले हुए वितान के नीचे लेटे थे । उन्होंने 'जाओ' कह कर नौकरों को बाहर हटा दिया और हंसवेग को आज्ञा दी—'संदेश कहो।' उसने प्रणाम कर कहना शुरू किया—'देव, प्राचीनकाल में महावराह के सम्पर्क से गर्भिणी होकर पृथिवी ने नरक नाम का पुत्र उत्पन्न किया । वह बाल्यकाल में ही बड़ा हो गया । लोकपाल उसके पैरों पर अपनी चूड़ामणि रगड़ने लगे । भुजशाली वह त्रिभुवन पर शासन करता था और उसकी आज्ञा के बिना भवनकमलिनी के वनों में रहने वाली चक्रवाक पक्षियों के कुटिल कटाक्षों द्वारा देखे जाने पर भी एवं जिनका सारथी अरुण डर के मारे रथ को घुमा लेता था ऐसे सूर्य भी अस्त नहीं होते थे, उसी नरक ने वरुण का मानों बाहरी हृदय हो ऐसे इस छत्र को हर लिया । उसके वंश में भगदत्त, पुष्पदत्त, वज्रदत्त
सप्तम उच्छ्वासः ३८३ चकितारुणपरिवर्तितरथो नाज्ञया विना रविरस्तमत्राजीत् । यश्च वरुणस्य बहिर्वृत्ति हृदयमिदमातपत्रमहार्षीत् । महात्मनस्तस्यान्वये भगदत्तपुष्प- दत्तवज्रदत्तप्रभृतिषु व्यतीतेषु बहुषु मेरूपमेषु महत्सु महीपालेषु प्रपौत्रो महाराजभूतिवर्मणः पौत्रश्चन्द्रमुखवर्मणः पुत्रो देवस्य कैलासस्थिरस्थितेः स्थितिवर्मणः सुस्थिरवर्मा नाम महाराजाधिराजो जज्ञे तेजसां राशिर्मृगाङ्क इति यं जना जगुः । योऽयमग्रजेनेवाजायत सहैवाहंकारेण । यश्च बाल एव प्रीत्या द्विजातीनप्रीत्या चारातीन्समप्रानप्रतिग्रहानग्राहयत् । यत्र चातिदुर्लभं लवणालयंसंभूतायाः परं माधुर्यमभूल्लक्ष्म्याः । तथा च यो वाहिनीनाथानां शङ्खाञ्जहार न रत्नानि, पृथिव्याः स्थैर्यं जग्राह न करम् , अवनिभृतां गौरवंमादत्त न नैष्ठुर्यम् । तस्य च सुगृहीतनाम्नो देवस्य देव्यां श्यामादेव्यां भास्करद्युतिर्भास्करवर्मापरनामा तनयः शांतनोर्भागी- रध्यां भीष्म इव कुमारः समभवत् । अयमस्य च शैशवादारभ्य संकल्पः स्थेयान्स्थाणुपादारविन्दद्वयादृते नाहमन्यं नमस्कुर्यामिति ईदृशश्चायं मनोरथस्त्रिभुवनदुर्लभस्त्रयाणामन्यतमेन संपद्यते सकलभुवनविजयेन वा मृत्युना वा यदि वा प्रचण्डप्रतापज्वलनजनितदिग्दाहेन जगत्येक- प्रतिग्रहो द्विजदीयमानोऽर्थः, सैन्यपश्चाद्भागश्च । आदि मेरुसदृश बड़े-बड़े राजा हुए। उसी परम्परा में महाराज भूतिवर्मा का प्रपौत्र, चन्द्रमुखवर्मा का पौत्र, कैलासवासी महाराज स्थितिवर्मा का पुत्र सुस्थिरवर्मा नाम का महाराजाधिराज उत्पन्न हुआ । उस तेजस्वी को लोग मृगाङ्क के नाम से गाया करते हैं । वह मानों अपने अग्रज अहंकार के साथ ही उत्पन्न हुआ । बाल्यावस्था में ही उसने प्रीतिपूर्वक दान दिए और अप्रीति से समस्त शत्रुओं को पछाड़ डाला। सारे समुद्र से उत्पन्न जिस लक्ष्मी का अत्यन्त दुर्लभ माधुर्य बढ़ कर था उसने प्रतिपक्ष सेनापतियों से (अथवा समुद्रों के) शंखों को छीन लिया रत्नों को नहीं। राजाओं ( अथवा पर्वतों) के गौरव को ले लिया, उनकी निष्ठुरता को नहीं। सुगृहीत नाम उस राजा की रानी श्यामादेवी से भास्करद्युति नामक पुत्र जिसका दूसरा नाम भास्करवर्मा है, उत्पन्न हुआ; जैसे गङ्गा से शन्तनु के पुत्र भीष्म हुए । शैशव से ही उसने यह अटल प्रतिज्ञा की थी कि मैं शिव के अतिरिक्त दूसरे किसी के चरणों में प्रणाम न करूँगा । त्रिभुवन में दुर्लभ ऐसा मनोरथ तीन तरह से सिद्ध हो सकता है, त्रिभुवन पर विजय प्राप्त करने से या मृत्यु से अथवा प्रचण्ड प्रताप की अग्नि से दिग्दाह उत्पन्न करने वाले आपके समान
३८४ हर्षचरितम् वीरेण देवोपमेन मित्रेण। मैत्री च प्रायः कार्यव्यपेक्षिणी क्षोणीभृताम्। कार्यं च कीदृशं नामं तद्भवेद्यदुपन्यस्यमानमुपनयेन्मित्रतां देवम्। देवस्य हि यशांसि संचिचीषतो बहिरङ्गभूतानि धनानि। बाहावेव च केवले निषण्णस्य शेषावयवानामपि साहायकसंपादनमनोरथो निरवकाशः किमुत बाह्यजनस्य। चतुःसागरम्रामग्रहणघस्ररस्य पृथिव्येकदेशदानो- पन्यासेनापि का तृप्तिः। अभिरूपकन्याविश्राणनविलोभनमपि लक्ष्मी- मुखारविन्ददर्शनदुर्ललितदृष्टेर्रकिंचित्करम्। एवमघटमानसकलोपायसंपा- दितपदार्थेऽस्मिन्प्रार्थनामात्रकमेव केवलमनुरुध्यमानः शृणोतु देवः। प्राग्ज्योतिषेश्वरो हि देवेन सहैकपिङ्ग इवानङ्गद्विषा, दशरथ इव गोत्र- भिदा, धनञ्जय इव पुष्कराक्षेण, वैकर्तन इव दुर्योधनेन, मलयानिल इव माधवेन, अजर्यं संगतमिच्छति। यदि च देवस्यापि मैत्रीयति हृदय- मवगच्छति च पर्यायान्तरितं दास्यमनुतिष्ठन्ति सुहृद इति ततः किमास्यते समाज्ञाप्यतामनुभवतु विष्णोर्मन्दरगिरिरिव विकटकेयूरकोटिमणिविघट्ट- नक्व णितकटक मणिशिलाशकलानि गाढापगूढानि देवस्य कामरूपा- अद्वितीय वीर की मित्रता से। राजाओं की मित्रता तो परस्पर उपकार के कार्य से होती है। कार्य वह कैसा हो, जिसे करके आपको मित्र बनाया जाय ? केवल यश के संचय की इच्छा रखने वाले आप धन को हेय समझते हैं। एक मात्र अपने भुजवीर्य पर निर्भर होकर रहने वाले आपके अन्य अङ्ग भी आपको सहायता देने की इच्छा प्रकट करते हैं तो उनकी इच्छा व्यर्थ है, ऐसी स्थिति में जो बाह्य लोग हैं तो बात ही और है। जो व्यक्ति चारों समुद्रों को एक घूँट बना लेना चाहते हैं उसके सामने धरती एक भाग रख देने से क्या सन्तुष्टि होगी ? सुन्दरी कन्या को अर्पित करने का लोभ भी उत्पन्न किया जाय तो व्यर्थ है, क्योंकि आपको दृष्टि स्वयं लक्ष्मी के मुखकमल को ही देखने वाली है। इस प्रकार किसी भी उपाय के द्वारा उपस्थित किया गया पदार्थ चाहे वह कैसा भी हो आपके लिए अनुकूल नहीं बैठता, तो केवल हमारी प्रार्थना मात्र के अनुरोध से ही देव सुनें—प्राग्ज्योतिषेश्वर देव के साथ कभी न मिटने वाली मैत्री चाहते हैं। जैसे शिव के साथ एकपिङ्ग, इन्द्र के साथ दशरथ, कृष्ण के साथ अर्जुन, दुर्योधन के साथ कर्ण, वसन्त के साथ मलयानिल ने मैत्री की है। यदि देव का हृदय मित्रता का अभिलाषी हो और यह जानता हो कि मैत्री के नाम पर मित्र लोग दासता का भी आचरण करते हैं तो बैठे रहने से क्या ? आज्ञा दीजिए। कामरूप के अधिपति कुमार की केयूर मणि से आलिङ्गन में उस प्रकार रगड़ खाएगी जैसे मन्दराचल के कटक विष्णु के केयूर से टकराए
क्षिपतिः । अस्मिन्नात्मेन्द्रनवरतविमललावण्यसौभाग्यसुधानिर्झरिणि मुख- शशिनि चिराच्चक्षुषी लालयतु प्राग्ज्योतिषेश्वरश्रीः । नाभिनन्दति चेद्देवः प्रणयमाज्ञापयतु किं कथनीयं मया स्वामिन' इति । विरतवचसि तस्मिन्भूपालः पूर्वोपलब्धैरेव गुरुभिर्गुणैरारोपितबहुमानः कुमारे सुदूरमाभोगातपत्रव्यतिकरेण तु परां कोटिमारोपिते प्रेम्णि लज्जमान इव सादरं जगाद- 'हंसवेग ! कथमिव तादृशि महात्मनि महाभिजने पुण्यराशौ गुणिनां प्राग्रहरे परोक्षसुहृदि स्निह्यति मद्विधस्या- न्यथा स्वप्नेऽपि प्रवर्तेत मनः । सकलजगदुत्तापनपटवोऽपि शिशिरायन्ते त्रिभुवननयानन्दकरे कमलाकरे करास्तिग्मतेजसः । सुबहुगुणगण- क्रीताश्च के वयं सख्यस्य । सज्जनमाधुर्याणामभृतदास्यो दश दिशः । एकान्तावदातोत्तानस्वभावसंभृतसादृश्यस्य कुमुदस्य कृते केनाभिहितः शिशिररश्मिः । श्रेयांश्च संकल्पः कुमारस्य । स्वयं बाहुशाली मयि च समालम्बितशरासने सुहृदि हरादृते कमन्यं नमस्यति । संवर्धिता मे प्रीतिरमुना संकल्पेन । अवलेपिनि पशावपि केसरिणि बहुमानो हृदयस्य
थे । प्राग्ज्योतिषेश्वर की लक्ष्मी जब तक तृप्त न हो तब तक निरन्तर लावण्य और सौभाग्य के अमृत को झरने वाले आपके मुखचन्द्र में अपने नेत्रों को लगा दें । अगर देव कुमार के प्रणय का स्वागत नहीं करते तो आज्ञा दें । मैं जाकर स्वामी से क्या कहूँगा ? उसके इस प्रकार कहने पर कुमार के सृष्ट गुणों के पहले ही मिले परिचय से हर्ष के मन में आदरभाव उत्पन्न हो गया था और आभोग नामक छत्र को भेट में देने के सम्पर्क से वे कुमार के प्रति अत्यन्त प्रेमासक्त हो चुके थे । उन्होंने लज्जित होते हुए आदरपूर्वक कहा- 'हंसवेग, इस प्रकार महान आत्मा, महाकुलीन, पुण्यराशि, गुणियों में श्रेष्ठ, परोक्ष मित्र कुमार के स्नेह दर्शाने पर मेरे जैसे के मन में स्वप्न में भी अन्यथाभाव कैसे आ सकता है ? समस्त संसार को संतप्त कर देने में समर्थ सूर्य के तेज त्रिभुवन के नेत्र को आनन्दित करने वाले पद्मसमूह में आकर ठण्डे पड़ जाते हैं । कुमार के अनेक गुणों से जब हम बिक गये तो हमें मित्रता का अधिकार क्या ? दिशाएँ सज्जनों के मधुर स्वभाव के कारण ही वेतन के बिना ही उनकी दासी बन जाती हैं । अत्यन्त स्वच्छ स्वभाव कुमुदों को, जो स्वच्छहृदय सज्जनों का सादृश्य प्राप्त करते हैं, विकसित करने के लिए चन्द्रमा से किसने सिफारिश की है । कुमार का संकल्प श्रेष्ठ है । स्वयं वे बाहुबीर्यशाली हैं । धनुष धारण करके जब मैं मित्र के रूप हूँ तो शिव के अतिरिक्त किसी अन्य के सामने क्यों झुकेंगे । मेरे इस संकल्प से प्रीति और भी बढ़ गई । पशुजाति २५ ह० च०
३८६ हर्षचरितम् किं पुनः सुहृदि । तत्तथा यतेथाः यथा न चिरामयमस्मान्क्लेशयति कुमारदर्शनोत्कण्ठा' इति । हंसवेगस्तु विज्ञापयांबभूव—'देव ! किमपरमिदानीं क्लेशयत्यभि- जातमभिहितं देवेन । सेवाभीरवो हि सन्तः, तत्रापि विशेषेणायमहङ्कार- धनो वैष्णवो वंशः । आस्तां तावदस्मत्स्वामिवंशः । पश्यतु देवः पुरुषस्य हि सेवां प्रति दुर्जनन्येवातिवृद्धया दुर्गत्या वाभिमुखीक्रियमाणस्य, कुटुम्बिन्येवासंतुष्टया तृष्णया वा प्रेर्यमाणस्य, दुरपत्यैरिव यौवनजनितैर्ना- नाभिलाषिभिरसत्संकल्पैर्वाकुलीक्रियमाणस्य जरत्कुमारीमिव परमार्गण- योग्यामतिमहतीं वा अवस्थां पश्यतः, स्वगृहे दुर्बन्धुभिरिव दुःस्थितैः समग्रैर्ग्रहैर्वा ग्राह्यमाणस्याभियोगं, पुरातनैरतिदुस्त्यजैर्भृत्यैरिव मलिनैः कर्मभिर्वानुवर्त्यमानस्य, सकलशरीरसंतापकरं करीषाग्निमिव दुष्कृतिनः कृतचित्तस्य संप्रवेष्टुं राजकुलमुपहतसकलेन्द्रियशक्तेरिव मिथ्यैव हृदय- गतविषयग्रामग्रहणाभिलाषस्य, प्रथममेव तोरणतले वन्दनमालाकिस- में उत्पन्न अभिमान करने वाले सिंह के प्रति भी जब हृदय में आदर है तो मित्र के प्रति क्यों न हो ? तो तू जाकर यह प्रयत्न करना कि कुमार के दर्शन की उत्कण्ठा हमें चिरकाल तक न सताती रहे ।' हंसवेग ने निवेदन किया—'देव, दूसरा क्या कष्ट होगा ? देव ने बहुत ठीक कहा । सज्जन लोग अपनी सेवा से डरते हैं, अहंकार के धनी विष्णु ( वराह ) के वंश की तो बात ही और है । हमारे स्वामी के वंश की बात तो जाने दीजिए । देव ही देखें, दुष्ट जननी के समान अत्यन्त बढ़ी हुई ( अतिवृद्धा ) दुर्गति मनुष्य को नौकरी के लिए ढकेलती है । असन्तुष्ट तृष्णा पत्नी की भाँति उसे प्रेरित करती है । दुष्ट पुत्रों की भाँति यौवन- जनित नाना प्रकार की अभिलाषाओं से भरे हुए असत् संकल्प उसे आकुल कर डालते हैं । उस कन्या के समान, जो उम्र होने पर भी ब्याही नहीं गई ऐसी बुरी अवस्था को जिसमें दूसरों ( धनी लोगों या पति ) का अन्वेषण होता है, वह देखने लगता है । दुष्ट बान्धवों के समान सारे ग्रह उसके घर में डेरा डाल देते हैं और उसे सताने लगते हैं । पुराने हो जाने के कारण जिनसे पिण्ड छुड़ाना नहीं बनता, ऐसे भृत्यों के समान मलिन कर्म उसके पीछे पड़ जाते हैं । पाप का मारा वह सारे शरीर को संतप्त करने वाले भूसे की अग्नि के समान राजकुल में प्रवेश पाने के लिए निश्चय करता है। वह उस व्यक्ति के समान, जिसकी इन्द्रियों की सारी शक्ति ठप हो गई हो, विषयों के उपभोग की मन में झूठी साध करता है। पहले ही जब वह तोरणद्वार के
सप्तम उच्छ्वासः ३८७ लयस्येव शुष्यतो द्वारक्षिभिर्निरुद्धस्य, पीडितस्य प्रविशतो द्वारे हरिण- स्येवापरैर्हन्यमानस्य, करिकर्मचर्मपुटस्येव मुहुर्मुहुः प्रतिहारमण्डलकर- प्रहारैर्निंरस्यमानस्य, निधिपादपप्ररोहस्येव द्रविणाभिलाषादधोमुखीभ- वतः, दूरममार्गणस्याप्यतिविप्रकृष्टविवृतविसर्जितस्योद्वेगं व्रजतः, अकण्ट- कस्यापि चरणतललग्नस्याकृष्य क्षेपीयः क्षिप्यमाणस्य, अमकरकेतोर- प्यकालोपसर्पणाप्रकुपितेश्वरदृष्टिदग्धस्य, प्रलयमुपगच्छतः कपेरिव कोप- निर्भत्सितस्याप्यभिन्नमुखरागस्य, ब्रह्मघ्न इव प्रतिदिवसवन्दनोद्वृत्तशिरः- कपालस्य, स्पर्शरहितस्याशुभकर्माणि निर्वहतः, त्रिशङ्कोरिवोभयलोकभ्र- हस्तिनां युद्धशिक्षार्थं चर्ममयो हस्ती । प्रतिहारमण्डलेन दौवारिकसमूहेन । प्रतिसंहारेण वेष्टनेन मण्डलं यस्य करस्य तत्प्रहारैश्च । निधिपादपप्ररोहो निधान- गृहजन्मा वृक्षाङ्कुरः । स च सर्वो निधिप्रभावादधोमुखीभावः प्रणामः । अमार्ग- णस्यायाचकस्य च अतिविप्रकृष्टैः प्राकृतैः । पूर्वं विवृतः स्वतश्च लब्धदर्शन एव विसर्जितस्यात एवोद्वेगं मन्युं व्रजतः । मार्गणः शरश्चातिविप्रकृष्टं कर्णान्ते विवृतो विसर्जित उद्धतवेगं याति । अमकरकेतोरशृङ्गारिणोऽपि । अकालेऽप्रस्ताव उपसर्पणं यस्य सः । तथा । अप्रकुपितस्येश्वरस्य हर्षस्य दृष्ट्या दग्धः । ततो विशेषणसमासः । प्रलयः प्रकृष्टो लयो भित्त्यादिश्लिष्टत्वम्, नाशश्च । कपिसदृशः कपेलोंहितमुखत्वात् । प्रतिदिवसेत्यादि । ब्रह्मघ्नो हतब्राह्मणः कपालमहरहर्वन्दते । त्रिशङ्कुर्नाम चण्डाल- भावमास्थितोऽपि याजयित्वा विश्वामित्रेण स्वर्गमारोपितः कुपितेनेन्द्रेण हुंकार- पास पहुँचता है, द्वारपाल उसे रोक देते हैं और वह बन्दनवार के पत्ते की तरह वहीं सूखता रहता है। वहाँ के दुःख सहकर किसी तरह राजकुल की ड्योढ़ी के भीतर प्रवेश भी हो गया तो दूसरे लोग उस पर टूट कर हिरन की तरह कुटियाते हैं। चमड़े के बने हुए हाथी की तरह बार-बार प्रतिहारों के घूंसे खाकर धकिया दिया जाता है। धन कमाने की इच्छा से राजकुल में गया हुआ वह ऐसे मुँह लटकाए रहता है जैसे जमीन में गड़े खजाने के ऊपर लगाए गए पौधे की डाल नीचे झुकी हो। वह चाहे कुछ भी याचना न करे, फिर भी राजकुल में दूर तक प्रविष्ट हुआ वह जोर के साथ बाहर फेंक दिया जाता है, जैसे धनुष बाण को खींच कर जोर से फेंक देता है। यद्यपि वह काँटे की तरह गड़ कर किसी को दुःख नहीं देता तथापि पैर में लगा हुआ वह निकाल कर फेंक दिया जाता है। किसी प्रकार असमय में स्वामी के पास पहुँच भी गया तो उसकी कुपित दृष्टि उसे जला कर नष्ट कर देती है, जैसे अनाड़ी कामदेव देवताओं के फेर में पड़ कर शिव के द्वारा जल गया था। विनाश के मुख में पहुँचे हुए उसे डाँट-फटकार सुनने पर
३८८ हर्षचरितम् ष्टस्य नक्तंदिनमवाक्शिरसस्तिष्ठतः, वाजिन इव कवलवशेन सुखबाह्य- मात्मानं विदधानस्य, अनशनशायिन इव हृदयस्थापितजीवनाशस्य, शरीरं क्षपयतः शुन इव निजदारपराङ्मुखस्य, जघन्यकर्मलग्नमात्मानं ताडयतः, प्रेतस्येवानुचितभूमिदीयमानान्नपिण्डस्य, बलिभुज इव जिह्वा- लौल्योपयुक्तपुरुषवर्चसो वृथा विहितायुषो जीवतः, श्मशानपादपानिव पिशाचस्य दग्धभूत्या परुषीकृतान्राजवल्लभानुपसर्पतः, विपरीतजिह्वाज- नितमाधुर्यैरोष्ठमात्रप्रकटितरागै राजशुकालापैः शिशोरिव मुग्धविलोभ्य- तर्जितः । स च निपिप्सुरेव विश्वामित्रप्रभावादुभुवमनवाप्य तत्रैव पूर्वं लम्ब- मानोऽद्यापि स्थितः । कवलो ग्रासः । सुखेन बाह्यम् । बवयोरैक्यात् । सुखेभ्यो बहिर्भूतम्, कृच्छ्रेण व्याप्यं च । हृदये स्थापिता जीवने वृत्त्युपाय आशा येन, जीवस्य नाशो, जीवनाशश्च । जघन्यं निकृष्टम्, जघने भवं जघन्यं च सुतम् । अनु- चितायामशस्यायां भूमौ । चितायाः पश्चादनुचितम् । बलिभुजः काकस्य । लौल्यं चापलम्, अभिलाषश्च । उपयुक्तं व्ययीकृतम्, भुक्तं च । वर्चस्तेजः, विष्ठा च । वृथा विहितं कृतमायुर्यस्य, विध्यः पक्षिभ्यो हितमायुर्यस्य, वृथा निष्फलं जीवतः पिशाचस्य मूर्खस्य । भूतिः संपत्, भस्म च । राजानः शुका इव, राजशुकाश्च । भी वानर की तरह मुँहपर लाली बनाए रखनों पड़ती है। प्रतिदिन उसे सबके पैरों पर सिर रगड़ना पड़ता है, मानों उसे ब्रह्महत्या लगी हो। उसे कोई नहीं छूता, मानों अशौच पड़ गया हो। त्रिशंकु के समान दोनों लोकों से भ्रष्ट होकर दिन-रात वह नीचे मूड़ो लटकाए रहता है। घोड़े की तरह थोड़े से टुकड़ों के लिए वह अपने सब सुख छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है। अनशन करके सोने वाले की तरह उसके हृदय में हमेशा मर जाने की इच्छा रहती है। कुत्ते के समान अपनी पत्नी से पराङ्मुख होकर वह अपने शरीर को कँपाता रहता है और नीच कर्म में प्रवृत्त अपने आपको स्वयं वह पीटता रहता है। प्रेत के समान भोजन करने के लिए जहाँ के तहाँ (अनुचित जगह में) बैठा दिया जाता है। वह कौवे की तरह जीभ के चटोरेपन में अंधड़ कर अपने बल को उपयोग में लाता है और व्यर्थ आयु गँवाते हुए जीता है। जैसे श्मशान के वृक्षों पर पिशाच मँडराता है उसी प्रकार वह नासपीटी बढ़ोत्तरी पाकर बदमिजाज हुए राजा के मुंहलगे लोगों के पास चक्कर लगाता रहता है। मीठी-मीठी बातें करने वाले और ओठ मात्र में ही राग दिखलाने वाले सुग्गे बच्चों की तरह उसे भुलावे में डाल देते हैं। मदारी के प्रभाव में पड़ कर बेताल जाते उसी प्रकार वे भी राजा के डर के मारे अपने मन से कुछ भी नहीं कर सकते। जैसे चित्रलिखित धनुष चढ़ी
सप्तम उच्छ्वासः ३८१ मानस्य, वेतालस्येव नरेन्द्रप्रभावाविष्टस्य न किंचिन्नाचरतः, चित्रधनुष इवालीकगुणाध्यारोपणैकक्रियानित्यनम्रस्य निर्वाणतेजसः, संमार्जनीसमुपा- र्जितरजसोऽवकरकूटस्येव निर्माल्यवाहिनः, कफविकारिण इव दिने दिने कटुकैरुद्वेज्यमानस्य, सौगतस्येवार्थशून्यविज्ञप्तिजनितवैराग्यस्य काषाया- श्यभिलषतः, निशास्वपि मातृबलिपिण्डस्येव दिक्षु विक्षिप्यमाणस्य, अशौचगतस्येव कुशयनजनितसमधिकतरदुःखवृत्तेः, तुलायन्त्रस्येव पश्चात्कृतगौरवस्य तोयार्थमपि नमतः, अतिकृपणस्य शिरसा केवलेना- संतुष्टस्य वचसापि पादौ स्पृशतः, निर्दयवेत्रिवेत्रताडनत्रस्तयेव त्रपया त्यक्तस्य, दैन्यसंकोचितहृदयहतावकाशयेवाहोपुरुषिकया परिवर्जितस्य, कु- राजशुकभेदाः । नरेन्द्रो राजा, मन्त्रविच्च । गुण उत्कर्षः, ज्या च गुणः । निर्वाणं प्रशान्तम्, निर्गतवान्तेजश्च। अवकरकूटो मार्जनीक्षिप्तो रजस्तृणादिसंघातः । उक्तं च—'संमार्जनी शोधनी स्यात्संकरोऽवकरस्तथा। क्षिप्ते' इति। अमाल्यवाहित्वेन निःश्रीकत्वमुच्यते । कटुकैः प्रतीहारैः, तीक्ष्णैश्च । अर्थशून्यया निष्फलया । विज्ञप्त्या प्रार्थनया कृतोद्वेगस्य । बौद्धानामपि बाह्यवस्तुशून्यानि विज्ञानानि । अशौचं मृतकादि । कुशयनं कुत्सितशय्या, भूमिश्च कुः । पश्चात्कृतं वर्जितम् , पृष्ठतश्च कृतम् । गौरवं महत्त्वम् , गुरुत्वं च । तोयशब्दो जलोपलक्षणार्थः । तोयं जलं च पादस्पर्शनं पथोऽपि । त्रपया लज्जया । 'आहोपुरुषिका दर्पाद्या स्यात्संभावना- त्मनि' । स्वमात्मा, धनं च । उक्तं च—'स्वो ज्ञातावात्मनि स्वं त्रिष्वात्मीये स्वोऽ- प्रत्यञ्चा से झुका हुआ भी बाण चलाने की शक्ति नहीं रखता उसी प्रकार झूठ-मूठ किसी के गुणों की प्रशंसा करते हुए अपनी नम्रता दर्शाता है और उसका तेज बुझा रहता है। झाडू से बटोर कर एकत्र किये गए कूड़े की तरह वह श्रीहीन होता है ( कभी माला नहीं धारण करता ) । कफ के रोगी की तरह उसे दिन पर दिन प्रतिहार और प्यादे घुड़कते रहते हैं। सेवा करने से टका-पैसा नहीं मिलता तो मन में वैराग्य उत्पन्न होकर बुद्ध के समान गेरुआ धारण कर लेने की इच्छा करने लगता है। मातृबलि के पिंडे की तरह रात के समय में भी बाहर फेंक दिया जाता है। अशौच में पड़े हुए की तरह वह मोटी-झोटी अपनी रहन-सहन से अनेक प्रकार के दुःख उठाता है। पीछे भार बढ़ने से तराजू जैसे झुक जाती है उसी प्रकार आत्मसम्मान को पीछे डाल कर पानी के लिए भी झुकता रहता है। अत्यन्त दीन हो जाने के कारण सिर से केवल पैर नहीं छूता, बल्कि असन्तुष्ट होकर बात-बात में पैर छूने के लिये तैयार रहता है। निष्ठुर प्रतीहारों की मार खाते-खाते वह बेहया हो जाता है। दीनता के कारण हृदय के बुझ जाने से उसकी आत्म-गौरव की भावना समाप्त हो जाती है। निन्दित कर्मों के