हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ हर्षचरितम्
चित्रीयमाणचेताश्च सराजको राजा दण्डानुसाराधिरोहिण्या दृष्टया सादरमैक्षिष्ट तत्तिलकमिव त्रिभुवनस्य, शैशवमिव श्वेतद्वीपस्य, अंशा- वतारमिव शरदिन्दोः, हृदयमिव धर्मस्य, निवेशमिव शशिलोकस्य, दन्त- मण्डलद्युतिधवलं मुखमिव चक्रवर्तित्वस्य, मौक्तिकजालपरिकरसितं सीमन्तचक्रमिव दिवः, बहलज्योत्स्नाशुक्लोदरमैन्दवमिव परिवेषवलयं शौक्ल्यापहसितशङ्खश्रीकं श्रवणमण्डलमिव निश्चलतां गतमैरावतस्य श्वेतगङ्गावर्तपाण्डुरं पदमिव त्रिभुवनवन्दनीयं त्रिविक्रमस्य, प्रचेतसचूडा- मणिमरीचिशिखाभिरिव श्लिष्टाभिर्मानसबिसतन्तुमयीभिश्चामरिकावली- भिर्विरचितपरिवेषम्, उपरि चक्रवर्तिलक्ष्मीनूपुरस्वनश्रवणदोहदनिश्चलेनेव लक्ष्मणा विततपत्रेण हंसेन सनाधीकृतशिखरम्, स्पर्शवता च प्रभावस्त- म्भितेन मन्दाकिनीमृणालेन मुकुलितफणेन वासुकिनेव नीतेन दण्डतां द्योतमानम्, धवलिम्ना क्षालयदिव नक्षत्रपथम्, प्रभाप्रवाहप्रथिम्ना प्रावृण्व-
निवेशं स्थानम् । दन्तमण्डलकं दशनकृतं चक्रवालम्, दशनसमूहश्च । मुख- मारम्भः, वक्त्रं च । परिकरः परिवेष्टनम् । परिवेषवलयं परिधिकटकम् । 'स्यादा- वर्तोऽम्भसां भ्रमः' । आवर्त्तनमावर्त्तः । प्रावृण्वदाच्छादयत् ।
का मेघ समझ कर केका की आवाज बन्द कर दी और पराङ्मुख हो गए। कुमुद चन्द्र के प्रति स्नेह के कारण अपने दलों को विकसित करके अट्टहास के साथ जग पड़े। अन्य राजाओं के साथ देव हर्ष ने विस्मय-विमुग्ध होकर दण्ड के अनुसार दृष्टि को ऊपर उठाते हुए उस अद्भुत महत् छत्र को ध्यानपूर्वक देखा। वह छत्र मानों त्रिभुवन का तिलक, श्वेतद्वीप का शैशव, शरत्काल के चन्द्रमा का अंशावतार, धर्म का हृदय, चन्द्रलोक का आयतन था, और मानों दाँतों की चमक से उज्ज्वल चक्रवर्तित्व का मुख था । उसके चारों ओर मोतियों के जालक लटक रहे थे, मानों स्वर्गलोक का केश-विन्यास हो । उसके मध्यभाग में चाँदनी छिटक रही थी, मानों चन्द्रमा के मंडल का घेरा हो । अपनी सफेदी से वह शंख की श्री को हँस रहा था, मानों ऐरावत का चंचलता से रहित श्रवणमण्डल हो। वह गंगा की भँवरियों के समान उज्ज्वल था, मानों विष्णु का त्रिभुवनवन्दनीय चरण हो। मानसरोवर के बिसतन्तुओं से मानों बनी हुई छोटी-छोटी चौरियाँ उसके चारों ओर लटक रही थीं, मानों वरुण की चूड़ामणि की किरणें हों। उसके शिखर पर पंख फैलाए हंस का चिह्न बना था, जो मानों चक्रवर्ती की लक्ष्मी के नूपुर की आवाज सुनने के आनन्द में निश्चल था। स्पर्श से सुख देने वाला मन्दाकिनी का मृणाल या प्रभाव से स्तम्भित होकर फनों को सिकोड़ते हुए वासुकिनाग ही उसका