हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 424, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ३७७ दिव दिवसम्, समुच्छ्रायेणाधःकुर्वन्निव दिवम्, उपरिस्थितमिव सर्व- मङ्गलानाम्, श्वेतमण्डपमिव श्रियः, स्तबकमिव ब्रह्मस्तम्बस्य, नाभिम- ण्डलमिव ज्योत्स्नायाः, विशदहासमिव कीर्त्तेः, फेनराशिमिव खड्गधारा- जलानाम्, यशःपटलमिव शौर्यशालितायाः, त्रैलोक्याद्भुतं महच्छत्रम् । दृष्टे च तस्मिन्द्राज्ञा प्रथमे शेषमपि प्राभृतं प्रकाशयांचक्रुः क्रमेण कार्माः । तद्यथा परार्घ्यरत्नांशुशोणीकृतदिग्भागान्, भगदत्तप्रभृतिख्यात- पार्थिवपरंपरागतानाहृतलक्षणानलंकारान्, प्रभालेपिनां च चूडामणीनां समुत्कर्षान्, क्षीरोदधेर्धवलताहेतूनीव हारान्, अनेकरागरुचिरवेत्रकरण्ड- कुण्डलीकृतानि शरच्चन्द्रमरीचिरुचीनि शौचक्षमाणि क्षौमाणि, कुशलशि- ल्पिलोकोल्लिखितानां च शुक्तिशङ्खगल्वर्कप्रमुखानां पानभाजनानां निच- यान्, निचोलकरक्षितरुचां च रुचिरकाञ्चनपत्रभङ्गभङ्गुराणामतिबन्धुर- परिवेशानां कार्दरङ्गचर्मणां संभारान्, भूर्जत्वक्कोमलाः स्पर्शवतीर्जातिर- कार्मा भृतकाः । आहतलक्षणान्गुणैः प्रसिद्धान् । उक्तं च—'गुणैः प्रतीते तु कृतलक्षणाहतलक्षणौ' इति । समुत्कर्षानतिशयान् गल्वर्को मसाराख्यो मणिभेदः, चन्द्रकान्त इत्यन्ये । शौचो धावनम् । कार्दरङ्गचर्मणां कार्दरङ्गदेशभवानां स्फोटका- दण्ड बन गए हों । वह मानों अपनी सफेदी से आकाश को धो रहा था। प्रभा के बढ़े हुए प्रभाव से दिन को ढँक रहा था। अपनी ऊँचाई से आकाश को नीचा कर रहा था। सब मंगलों के वह मानों ऊपर स्थित था। छत्र क्या था, मानों लक्ष्मी का श्वेतमंडप (चाँदनी में विहार करने के लिए ऐसा मंडप जिसकी सजावट श्वेत रंग की हो) था; श्वेतद्वीप का बाल रूप था; ज्योत्स्ना का नाभिमण्डल था; कीर्ति का विशद हस्त था; खड्ग के धाराजल की फेनराशि था और शूरता का यशःपटल था । देव हर्ष जब छत्र को देख चुके तब भृत्यों ने बचे हुए अन्य उपहारों को भी उघाड़ कर दिखाया । वे इस प्रकार थे—आभूषण जो जड़े हुए बहुमूल्य रत्नों की किरणों से दिग्भाग को रंगीन कर रहे थे, जो भगदत्त आदि प्रसिद्ध राजाओं के समय से कुल में चले आ रहे थे, जिन पर भाँति-भाँति के लक्षण या चिह्न ठप्पे से बनाए गये थे । चूडामणि या शिरोभूषण, जिनमें बहुत चमक थी। हार, जो क्षीरसमुद्र को भी धवलता के मानों कारण थे । क्षौम वस्त्र, जो शरत्कालीन चन्द्रमा की तरह चिट्टे रङ्ग के थे और जो धुलाई सह सकने वाले थे और नाना वर्ण की रङ्ग-बिरंगी बेंत की करंडियों (झाँपियों) में कुण्डलित करके रखे गए थे। अनेक प्रकार के पान-भाजन या मधुपान करने के चषक, जो सीप, शंख, गल्वर्क के बने हुए थे और जिनपर चतुर कारीगरों ने भाँति-भाँति की