हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
सप्तम उच्छ्वासः ३७७ दिव दिवसम्, समुच्छ्रायेणाधःकुर्वन्निव दिवम्, उपरिस्थितमिव सर्व- मङ्गलानाम्, श्वेतमण्डपमिव श्रियः, स्तबकमिव ब्रह्मस्तम्बस्य, नाभिम- ण्डलमिव ज्योत्स्नायाः, विशदहासमिव कीर्त्तेः, फेनराशिमिव खड्गधारा- जलानाम्, यशःपटलमिव शौर्यशालितायाः, त्रैलोक्याद्भुतं महच्छत्रम् । दृष्टे च तस्मिन्द्राज्ञा प्रथमे शेषमपि प्राभृतं प्रकाशयांचक्रुः क्रमेण कार्माः । तद्यथा परार्घ्यरत्नांशुशोणीकृतदिग्भागान्, भगदत्तप्रभृतिख्यात- पार्थिवपरंपरागतानाहृतलक्षणानलंकारान्, प्रभालेपिनां च चूडामणीनां समुत्कर्षान्, क्षीरोदधेर्धवलताहेतूनीव हारान्, अनेकरागरुचिरवेत्रकरण्ड- कुण्डलीकृतानि शरच्चन्द्रमरीचिरुचीनि शौचक्षमाणि क्षौमाणि, कुशलशि- ल्पिलोकोल्लिखितानां च शुक्तिशङ्खगल्वर्कप्रमुखानां पानभाजनानां निच- यान्, निचोलकरक्षितरुचां च रुचिरकाञ्चनपत्रभङ्गभङ्गुराणामतिबन्धुर- परिवेशानां कार्दरङ्गचर्मणां संभारान्, भूर्जत्वक्कोमलाः स्पर्शवतीर्जातिर- कार्मा भृतकाः । आहतलक्षणान्गुणैः प्रसिद्धान् । उक्तं च—'गुणैः प्रतीते तु कृतलक्षणाहतलक्षणौ' इति । समुत्कर्षानतिशयान् गल्वर्को मसाराख्यो मणिभेदः, चन्द्रकान्त इत्यन्ये । शौचो धावनम् । कार्दरङ्गचर्मणां कार्दरङ्गदेशभवानां स्फोटका- दण्ड बन गए हों । वह मानों अपनी सफेदी से आकाश को धो रहा था। प्रभा के बढ़े हुए प्रभाव से दिन को ढँक रहा था। अपनी ऊँचाई से आकाश को नीचा कर रहा था। सब मंगलों के वह मानों ऊपर स्थित था। छत्र क्या था, मानों लक्ष्मी का श्वेतमंडप (चाँदनी में विहार करने के लिए ऐसा मंडप जिसकी सजावट श्वेत रंग की हो) था; श्वेतद्वीप का बाल रूप था; ज्योत्स्ना का नाभिमण्डल था; कीर्ति का विशद हस्त था; खड्ग के धाराजल की फेनराशि था और शूरता का यशःपटल था । देव हर्ष जब छत्र को देख चुके तब भृत्यों ने बचे हुए अन्य उपहारों को भी उघाड़ कर दिखाया । वे इस प्रकार थे—आभूषण जो जड़े हुए बहुमूल्य रत्नों की किरणों से दिग्भाग को रंगीन कर रहे थे, जो भगदत्त आदि प्रसिद्ध राजाओं के समय से कुल में चले आ रहे थे, जिन पर भाँति-भाँति के लक्षण या चिह्न ठप्पे से बनाए गये थे । चूडामणि या शिरोभूषण, जिनमें बहुत चमक थी। हार, जो क्षीरसमुद्र को भी धवलता के मानों कारण थे । क्षौम वस्त्र, जो शरत्कालीन चन्द्रमा की तरह चिट्टे रङ्ग के थे और जो धुलाई सह सकने वाले थे और नाना वर्ण की रङ्ग-बिरंगी बेंत की करंडियों (झाँपियों) में कुण्डलित करके रखे गए थे। अनेक प्रकार के पान-भाजन या मधुपान करने के चषक, जो सीप, शंख, गल्वर्क के बने हुए थे और जिनपर चतुर कारीगरों ने भाँति-भाँति की
३७८ हर्षचरितम् पट्टिकाः, चित्रपटानां च श्रदीयसां समूरूकोपधानादीन्विकारान्, प्रियङ्गु- प्रसवपिङ्गलत्वञ्चि चासनानि वेत्रमयान्यगुरुवल्कलकल्पितसंचयानि च सुभाषितभाञ्जि पुस्तकानि, परिणतपाटलपटोलत्विषि च तरुणहारीतह- रिन्ति क्षीरक्षारीणि च पूगानां पल्लवावलम्बीनि सरसानि फलानि, सह- कारलतारसानां च कृष्णागुरुतैलस्य च कुपितकपिकपोलकपिलकापोति- कापलाशकोशीकवचिताङ्गीः स्थवीयसीर्वेणवीनार्डीश्च, पट्टसूत्रप्रसेवकार्पि- तांश्च भिन्नाञ्जनवर्णस्य कृष्णागुरुणो गुरुपरितापमुषश्च गोशीर्षचन्दनस्य, तुषारशिलाशकलशिशिरस्वच्छसितस्य च कर्पूरस्य, कस्तूरिकाकोशकानां च पक्वफलजूटजटिलानां च कक्कोलपल्लवानाम्, लवङ्गपुष्पमञ्जरीणां जातीफलस्तबकानां च राशीन्, अतिमधुरमधुरसामोदनिर्हारिणी- नाम् । जातिपट्टिकाः श्रेष्ठानि जघनग्रन्थनानि । संचयाः पत्रसमूहाः । पटोलस्तिक्तक ओषधिभेदः । उक्तं च - 'अथ कुलकं पटोलस्तिक्तकः पटुः' इति । कापोतिका ओषधिभेदः । गोशीर्षचन्दनस्य चन्दनभेदस्य । कोशका नाभयः । अंतिमधुरं मधुरसाया इवामोदानि हरन्ति मुञ्चन्ति यास्ताः । मधुरसा द्राक्षा । उक्तं च- 'मृद्वीका गोस्तनी द्राक्षा माध्वी मधुरसेति च' इति । अन्ये मधुरसं मकरन्दं द्रव- नक्काशी का काम किया था। कार्दरङ्ग द्वीप से आइ हुई ढालें जिनपर आव की रक्षा के लिए खोल चढ़े थे, इनके काले चमड़े पर सुनहली फूल-पत्तियों के कटाव खचित थे और इनकी गोलाई ऊंची-नीची थी। मोजपत्र की तरह मुलायम स्पर्श से सुख देने वाली जाती-पट्टिकाएँ या कटिप्रदेश में बाँधने के काम में आने वाले एक प्रकार के बढ़ियाँ पटके। नरम चित्रपटों (जामदानी) के बने हुए तकिये जिनके भीतर समूर या पक्षियों के बाल या रोँए भरे थे। बेंत के बुने हुए आसन, जिनका रङ्ग प्रियंगुमजरी की तरह ललछौँही पीली झलक का था। सुभाषितों से भरी पुस्तकें जिनके पन्ने (संचय) अगुरु को पीट कर बनाए गए थे। हरी सुपारियों के झुग्गे, जिनमें पल्लवों के साथ सरस फल झूम रहे थे, इनका रङ्ग पके हुए लाल परवल की तरह ललछौँह और हरियल पक्षी की तरह हरि- याली लिए था, इनसे दूध टपक रहा था। सहकार लताओं के रस से भरी हुई मोटी बाँस की नलियाँ, जिनके चारों ओर क्रोधित बन्दर के कपोल की भाँति कपोतिका के लाल-पीले पत्ते बँधे हुए थे। काले अगुरु का तेल भी इसी प्रकार की मोटी बाँस की नलियों में भर कर और पत्तों में लपेट कर लाया गया था। पटसन के बने हुए बोरों में भर कर काले अगुरु के ढेर लगाए गए थे, जिनका रङ्ग छूटे हुए अंजन की तरह था। गरमी में ठंडक पहुँचाने वाले गोशीर्ष नामक चन्दन की राशियाँ बरफ के शिखाखण्ड की
सप्तम उच्छ्वासः ३७५ श्रोल्लक्ककलशीः सितासितस्य च चामरजातस्य निचयान्, अवलम्बमान- तूलिकालाबुकांश्च लिखितानेकलेख्यफलकसंपुटान्, कुतूहलकृन्ति च कनकश्शृङ्खलानियमितग्रीवाणां किंनराणां च वनमानुषाणां च जीवञ्जीव- कानां च जलमानुषाणां च मिथुनानि, परिमलामोदितककुभश्च कस्तूरि- काकुरङ्गान्, गेहपरिसरणपरिचिताश्च चमरीः, चामीकररसचित्रवेत्रपञ्जरा- न्तर्गतांश्च बहुसुभाषितजल्पाकजिह्वांश्च^१ शुकशारिकाप्रभृतीन्पक्षिणः, प्रवा- लपञ्जरगतांश्च चकोरान्, जलहस्तिनामुद्रकुम्भमुक्ताफलदामदन्तुराणि च दन्तकाण्डकुण्डलानि । राजा तु छत्रदर्शनात्प्रहृष्टहृदयः प्रथमप्रयाणे शोभननिमित्तमिति मनसा जग्राह । हंसवेगं च प्रीयमाणो बभाषे—'भद्र ! सकलरत्नधाम्नः परमेश्वरशिरोधारणार्हस्यास्य महातपत्रस्य महार्णवादिव कुमुदबान्धवस्य माहुः । उल्लकः सुगन्धिफलविशेषरसः । आसवभेद इत्यन्ये । तूलिका ऊर्जिका । यया चित्रं क्रियते । अलाब्यस्तुम्ब्यः । प्रवालो विद्रुमः । उक्तं च—'अथ विद्रुमः पुंसि प्रवालं पुंनपुंसकम्' इति । 'नीहारो मिहिका चाथ' । तरह ठंडे सफेद और साफ कपूर के डले, कस्तूरी के नाफे (थैली) जो कस्तूरी मृगों की नाभि से निकलते हैं। कक्कोल के पक्के फलों से युक्त कक्कोलपल्लव । लवंगपुष्पों की मंजरियाँ, जायफल के गुच्छे, जस्ते की कपड़े चढ़ी कलसी या सुराहियाँ, जिनमें अत्यन्त मीठा मधुरस भर कर लाया गया था, जिनकी भीनी सुगन्धि बाहर फैल रही थी। चित्र- फलों के जोड़े, जिनमें भीतर की ओर चित्र लिखे थे और उनके एक ओर तूलिका एवं रङ्ग रखने के लिए छोटी अलाबू की कुप्पियाँ लटक रही थीं। कुतूहल उत्पन्न करने वाले भाँति-भाँति के पशु-पक्षी जैसे सोने की श्रृंखलाओं से गर्दन में बँधे हुए किन्नर, वन- मानुस, जीवंजीवक, जलमानुषों के जोड़े, दिशाओं में सुगन्धि फैलाते हुए कस्तूरीहिरन, घरों में विचरने वाली विश्वासभरी चँवरी गाय, सुनहले रंग से बेंत के पिंजरों में अनेक प्रकार के सुभाषित पाठ करने वाले शुकसारिका प्रभृति पक्षी-मूँगे के पिंजरों में बैठे हुए चकोर, जलहस्तियों के मस्तक से निकलने वाले मुक्ताफल से जड़े हुए हाथीदाँत के कुण्डल। छत्र देखते ही राजा का हृदय प्रसन्नता से भर गया और उसने पहले प्रस्थान के समय मन में उसे शुभ निमित्त समझ कर स्वीकार किया। उन्होंने स्नेहपूर्वक हंसवेग से कहा— 'भद्र, सब प्रकार के रत्नों से भरे हुए सम्राट् के सिर पर धारण करने योग्य इस महाछत्र १. जातीः कौशिकशुक ।
३८० हर्षचरितम् कुमाराल्लाभो न विस्मयाय । बालविद्याः खलु महतामुपकृतयः' इति । अपनीते च तस्मात्प्रदेशात्प्राभृतसंभारे क्षणमिव स्थित्वा 'हंसवेग ! विश्रम्यताम्' इति प्रतीहारभवनं विसर्जयांबभूव । स्वयमप्युत्थाय स्नात्वा मङ्गलाकाङ्क्षी प्राङ्मुखः प्राविशदाभोगस्य छायाम् । अथ विशत एवास्य छायाजन्मना जडिम्ना चूडामणितामनीयतेव शशिबिम्बमम्बुबिन्दुमुचश्चुम्बुरिव चन्द्रकान्तमणयो ललाटतटं कर्पूररे- णव इव व्यलीयन्त लोचनयुगले गले गलत्तुहिनकणनिकरकृतनीहारा हारा इवावबध्यन्त हरिचन्दनरसासारेणेवापाति संततमुरसि कुमुदमयमिव हृदयमभवदतिशिशिरमन्तर्हितहिमशिलेव विलीयमाना व्यलिम्पदङ्गानि । जातविस्मयश्चाकरोन्मनसि एकमजर्यं संगतमपहाय काऽस्त्यन्या प्रतिकौ- शलिकेति । आहारकाले च हंसवेगाय धवलकर्पटप्रावृतधौतनालिकेर- परिगृहीतं विलेपशेषं चन्दनमङ्गस्पृष्टे च वाससी शरत्तारकाकारतारमुक्ता- स्तबकितपदं परिवेशं नाम कटिसूत्रकम् अतिमहार्हपद्मरागालोकलोहि- का कुमार से लाभ होना उस प्रकार आश्चर्यजनक नहीं, जिस प्रकार क्षीरसमुद्र से चन्द्रमा का उद्भव होना । महापुरुष लोग उपकार के लड़कों की खेल की विद्या की तरह पहले से ही जान जाते हैं । प्राभृत की सामग्री के वहाँ से हटा लिए जाने पर क्षणभर के बाद हंसवेग को 'तुम विश्राम करो' यह कह कर प्रतिहार-भवन में भेजा । स्वयं उठकर स्नान करके मंगल की आकांक्षा से प्राङ्मुख होकर आभोग नामक उस छत्र के नीचे छाया में बैठ गए । जब हर्ष ने छत्र की छाया में प्रवेश किया तब उसकी ठंडक से मानों चन्द्र की किरणें ही घनीभूत होकर उसकी चूड़ामणि बन गईं । चन्द्रकान्तमणियाँ पसीजने लगीं और जलकण उनके ललाट पर छा गए । उनकी आँखों में कपूर का आँजन मानों लग गया । गले में बरफ के टुकड़ों के छोटे-छोटे फुहारे हार के समान कतार से बँध गए । उनके वक्षपर मानों हरिचन्दन रस बरसने लगा । हृदय मानों कुमुदों से भर कर अत्यन्त शिशिर हो गया । अदृश्य रूप में मानों बरफ की शिला उनके अङ्गों पर पिघलने लगी । आश्चर्य से भर कर उन्होंने मन में सोचा—'आमरण मैत्री के अतिरिक्त इस प्रकार से सुंदर उपहार का बदला क्या हो सकता है?' भोजन के अवसर पर राजा ने हंसवेग के लिए सफेद वस्त्र लपेट कर नारियल के साथ अपने लगाने से बचा हुआ चन्दन भेजा और उसके साथ ही अपने अङ्ग से छुवाए हुए परिधानीय वस्त्रयुगल शरत्कालीन तारों की आकृति वाले मोतियों से बना हुआ परिवेश नामक कटिसूत्र और बहुमूल्य जड़े हुए पद्मराग
सप्तम उच्छ्वासः ३८१ तीकृतदिवसं च तरङ्गकं नाम कर्णाभरणं प्रभूतं च भोज्यजातं प्राहिणोत् । एवंप्रायेण च क्रमेण जगाम दिवसः । ततः कटकस्थबलबहलधूलिधूसरितवपुरंशुमाली मलीमससङ्गमिव क्षालयितुमपरजलनिधिमवातरत् । आभोगातपत्रप्रदानवार्तामिव निवेद- यितुं वरुणाय वारुणीं दिशमयासीत् । मुकुलायमानसकलकमलवना प्रमुख एव बद्धसेवाञ्जलिपुटेव सद्वीपा भूरभूद्भूपतेः । भूपालानुरागमय इव निखिलजीवलोकलोकाञ्जलिबद्धबन्धुर्जगज्जग्राह संघ्यारागः । गौडा- पराधशङ्किनीव श्यामतां प्रपेदे दिक्प्राची । प्रचिततिमिरनिर्वाहा निर्वाणा- न्यनृप्रतापानलकलापेव कालिमानमतानीन्मेदिनी । मेदिनीशप्रदोषा- स्थानपुष्पनिकरमिव विकचतगररुचिरमवचकरुरुडुनिकरमविरलं ककुभः । स्कन्धावारगन्धगजमदामोदधावितस्येव मार्गो वियति विरराज रजःपा- ण्डुरैरावतस्य । कुपितनृपव्याघ्राघ्रातामुपसृष्टामित पौरुहू्तीं विहाय विहा- यस्तलमारुरोह रोहिणीरमणः । प्रयाणवार्ता इव मानिनीनां हृदयभेदिन्यो कटकं हस्त्यश्वादीनां सर्वेषां संनिवेशदेशः । तत्स्थं बलं सैन्यम् । तगरं पिण्डी- भवनम् । नृपव्याघ्रो राजशार्दूलः, हर्षः । उपसृष्टां सोपद्रवाम् । पौरुहू्तीं ऐन्द्रीम् । रोहिणीरमणश्चन्द्रः, वृषभश्च । रोहिणी गौः । उक्तं च—'माहेयी सौरभेयी गौरुस्रा की किरणों से दिन में लाला बिखेरता हुआ तरंगक नाम का कर्णाभरण एवं बहुत-सा भोजन का सामान भेजा। इस प्रकार वह दिन व्यतीत हुआ । तब सूर्य कटक की सेना से उड़ी हुई धूल से मानों धूसरित होने के कारण अपने मलिन अङ्गों को धोकर साफ करने के लिए पश्चिम समुद्र में अवतीर्ण हुआ या हर्ष को आमोग नामक छत्र के प्राप्त होने का संदेश निवेदन करने के लिए पश्चिम दिशा में वरुण के पास पहुँचा। कमलों के वन मुकुलित होने लगे, मानों राजा के सम्मुख द्वीपों के साथ पृथिवी सेवा करने के लिए अञ्जलिपुट बाँधे खड़ी हो । राजा के अनुराग से भरा हुआ संध्याराग जो सारे जीवलोक के लिए निवासी लोगों के बँधे अञ्जलिपुट का बन्धु है, जगत् में भर गया । पूर्व दिशा मानों गौड़ाधिप के अपराध से डर कर मलिन हो गई । पृथिवी पर गाढ़ा अन्धकार छा गया मानों पृथिवी ने अन्य राजाओं के प्रतापानल के बुझ जाने से उसकी कालिमा को फैला दिया हो । दिशाओं ने राजा के सायंकालीन सभा- मण्डल पर पुष्पसमूह के समान खिले हुए तगर पुष्पों की भाँति तारों को बिखेर दिया। आकाश में मानों स्कन्धावार के गन्धगजों की मदगन्ध सूँघ मुठभेड़ के लिये दौड़ने से ऐरावत का मार्ग धूल से भर गया । रोहिणीरमण (रोहिणी का पति) चन्द्रमा रूपी (रोहिणी
३८२ हर्षचरितम् ययुरिन्दुदीधितयो दश दिशः। नवनृपदण्डयात्रात्रासातुरा इव तरलित- सत्त्ववृत्तयश्चक्षुभुः पतयो वाहिनीनाम्। चिन्तेव भूभृतां हृदयानि विवेश गुहाविवराणि विमुक्तसर्वाशातिमिरसंततिः । प्रतिसामन्तचक्षुषामिव ननाश निद्रा कुमुदवनानाम् । अस्यां च वेलायां विततवितानतलवर्ती नरेन्द्रो 'यात तावत्' इति विसर्जितानुजीविनो हंसवेगमादिष्टवान्—'कथय संदेशम्' इति । प्रणम्य स कथयितुं प्रास्तावीत्—'देव ! पुरा महावराहसंपर्कसंभूतगर्भाया भगवत्या भुवा नरको नाम सूनुरसावि रसातले । वीरस्य यस्याभवन्बाल्य एव पादप्रणामप्रणयिनश्चूडामणयो लोकपालानाम् यस्य च त्रिभुवनभुजो भुजशौण्डस्य भवनकमलिनीचक्रवाकीकोपकुटिलकटाक्षेक्षितोऽपि भय- माता च शृङ्गिणी । अर्जुन्द्यन्ध्या रोहिणी स्यादुत्तमा गोषु नैचिकी ॥' इति । वृष- भश्च कुपितव्याघ्राघ्रातामत एव सोपद्रवां दिशं विहाय स्थानान्तरमारोहति । मानः प्रियाविषये, अन्यत्र,-धीरविषये । सत्त्वानि प्राणिनः, धैर्यं च सत्त्वम् । वाहिनीनां सेनानाम् , नदीनां च । आशा दिशः, आस्था च । निद्रा संकोचः, स्वापश्च । अर्थात् गौ का पति ) वृषभ क्रोधित राजा रूपा व्याघ्र से आक्रान्त पूर्व दिशा रूपा गाय को छोड़कर आकाश पर चढ़ आया । मानिनियों के हृदय को विदीर्ण करने वाली चन्द्रमा की किरणें सैनिकप्रयाण की वार्ता के समान आकाश में फैल गई । राजा की नई दण्डयात्रा के त्रास से आतुर शत्रु के सेनापतियों का धैर्य नष्ट हो गया ( समुद्र और उनके जलजन्तु खलबला उठे) । समस्त दिशाओं को छोड़ कर अन्धकारसन्तति गुहाविवरों में उस प्रकार घुस गई जैसे राजाओं के हृदय में आशा से रहित चिन्ता । शत्रु- सामन्तों की आँखों के समान ही कुमुदवनों की निद्रा न जाने कहाँ चली गई । इस समय हर्ष फैले हुए वितान के नीचे लेटे थे । उन्होंने 'जाओ' कह कर नौकरों को बाहर हटा दिया और हंसवेग को आज्ञा दी—'संदेश कहो।' उसने प्रणाम कर कहना शुरू किया—'देव, प्राचीनकाल में महावराह के सम्पर्क से गर्भिणी होकर पृथिवी ने नरक नाम का पुत्र उत्पन्न किया । वह बाल्यकाल में ही बड़ा हो गया । लोकपाल उसके पैरों पर अपनी चूड़ामणि रगड़ने लगे । भुजशाली वह त्रिभुवन पर शासन करता था और उसकी आज्ञा के बिना भवनकमलिनी के वनों में रहने वाली चक्रवाक पक्षियों के कुटिल कटाक्षों द्वारा देखे जाने पर भी एवं जिनका सारथी अरुण डर के मारे रथ को घुमा लेता था ऐसे सूर्य भी अस्त नहीं होते थे, उसी नरक ने वरुण का मानों बाहरी हृदय हो ऐसे इस छत्र को हर लिया । उसके वंश में भगदत्त, पुष्पदत्त, वज्रदत्त
सप्तम उच्छ्वासः ३८३ चकितारुणपरिवर्तितरथो नाज्ञया विना रविरस्तमत्राजीत् । यश्च वरुणस्य बहिर्वृत्ति हृदयमिदमातपत्रमहार्षीत् । महात्मनस्तस्यान्वये भगदत्तपुष्प- दत्तवज्रदत्तप्रभृतिषु व्यतीतेषु बहुषु मेरूपमेषु महत्सु महीपालेषु प्रपौत्रो महाराजभूतिवर्मणः पौत्रश्चन्द्रमुखवर्मणः पुत्रो देवस्य कैलासस्थिरस्थितेः स्थितिवर्मणः सुस्थिरवर्मा नाम महाराजाधिराजो जज्ञे तेजसां राशिर्मृगाङ्क इति यं जना जगुः । योऽयमग्रजेनेवाजायत सहैवाहंकारेण । यश्च बाल एव प्रीत्या द्विजातीनप्रीत्या चारातीन्समप्रानप्रतिग्रहानग्राहयत् । यत्र चातिदुर्लभं लवणालयंसंभूतायाः परं माधुर्यमभूल्लक्ष्म्याः । तथा च यो वाहिनीनाथानां शङ्खाञ्जहार न रत्नानि, पृथिव्याः स्थैर्यं जग्राह न करम् , अवनिभृतां गौरवंमादत्त न नैष्ठुर्यम् । तस्य च सुगृहीतनाम्नो देवस्य देव्यां श्यामादेव्यां भास्करद्युतिर्भास्करवर्मापरनामा तनयः शांतनोर्भागी- रध्यां भीष्म इव कुमारः समभवत् । अयमस्य च शैशवादारभ्य संकल्पः स्थेयान्स्थाणुपादारविन्दद्वयादृते नाहमन्यं नमस्कुर्यामिति ईदृशश्चायं मनोरथस्त्रिभुवनदुर्लभस्त्रयाणामन्यतमेन संपद्यते सकलभुवनविजयेन वा मृत्युना वा यदि वा प्रचण्डप्रतापज्वलनजनितदिग्दाहेन जगत्येक- प्रतिग्रहो द्विजदीयमानोऽर्थः, सैन्यपश्चाद्भागश्च । आदि मेरुसदृश बड़े-बड़े राजा हुए। उसी परम्परा में महाराज भूतिवर्मा का प्रपौत्र, चन्द्रमुखवर्मा का पौत्र, कैलासवासी महाराज स्थितिवर्मा का पुत्र सुस्थिरवर्मा नाम का महाराजाधिराज उत्पन्न हुआ । उस तेजस्वी को लोग मृगाङ्क के नाम से गाया करते हैं । वह मानों अपने अग्रज अहंकार के साथ ही उत्पन्न हुआ । बाल्यावस्था में ही उसने प्रीतिपूर्वक दान दिए और अप्रीति से समस्त शत्रुओं को पछाड़ डाला। सारे समुद्र से उत्पन्न जिस लक्ष्मी का अत्यन्त दुर्लभ माधुर्य बढ़ कर था उसने प्रतिपक्ष सेनापतियों से (अथवा समुद्रों के) शंखों को छीन लिया रत्नों को नहीं। राजाओं ( अथवा पर्वतों) के गौरव को ले लिया, उनकी निष्ठुरता को नहीं। सुगृहीत नाम उस राजा की रानी श्यामादेवी से भास्करद्युति नामक पुत्र जिसका दूसरा नाम भास्करवर्मा है, उत्पन्न हुआ; जैसे गङ्गा से शन्तनु के पुत्र भीष्म हुए । शैशव से ही उसने यह अटल प्रतिज्ञा की थी कि मैं शिव के अतिरिक्त दूसरे किसी के चरणों में प्रणाम न करूँगा । त्रिभुवन में दुर्लभ ऐसा मनोरथ तीन तरह से सिद्ध हो सकता है, त्रिभुवन पर विजय प्राप्त करने से या मृत्यु से अथवा प्रचण्ड प्रताप की अग्नि से दिग्दाह उत्पन्न करने वाले आपके समान
३८४ हर्षचरितम् वीरेण देवोपमेन मित्रेण। मैत्री च प्रायः कार्यव्यपेक्षिणी क्षोणीभृताम्। कार्यं च कीदृशं नामं तद्भवेद्यदुपन्यस्यमानमुपनयेन्मित्रतां देवम्। देवस्य हि यशांसि संचिचीषतो बहिरङ्गभूतानि धनानि। बाहावेव च केवले निषण्णस्य शेषावयवानामपि साहायकसंपादनमनोरथो निरवकाशः किमुत बाह्यजनस्य। चतुःसागरम्रामग्रहणघस्ररस्य पृथिव्येकदेशदानो- पन्यासेनापि का तृप्तिः। अभिरूपकन्याविश्राणनविलोभनमपि लक्ष्मी- मुखारविन्ददर्शनदुर्ललितदृष्टेर्रकिंचित्करम्। एवमघटमानसकलोपायसंपा- दितपदार्थेऽस्मिन्प्रार्थनामात्रकमेव केवलमनुरुध्यमानः शृणोतु देवः। प्राग्ज्योतिषेश्वरो हि देवेन सहैकपिङ्ग इवानङ्गद्विषा, दशरथ इव गोत्र- भिदा, धनञ्जय इव पुष्कराक्षेण, वैकर्तन इव दुर्योधनेन, मलयानिल इव माधवेन, अजर्यं संगतमिच्छति। यदि च देवस्यापि मैत्रीयति हृदय- मवगच्छति च पर्यायान्तरितं दास्यमनुतिष्ठन्ति सुहृद इति ततः किमास्यते समाज्ञाप्यतामनुभवतु विष्णोर्मन्दरगिरिरिव विकटकेयूरकोटिमणिविघट्ट- नक्व णितकटक मणिशिलाशकलानि गाढापगूढानि देवस्य कामरूपा- अद्वितीय वीर की मित्रता से। राजाओं की मित्रता तो परस्पर उपकार के कार्य से होती है। कार्य वह कैसा हो, जिसे करके आपको मित्र बनाया जाय ? केवल यश के संचय की इच्छा रखने वाले आप धन को हेय समझते हैं। एक मात्र अपने भुजवीर्य पर निर्भर होकर रहने वाले आपके अन्य अङ्ग भी आपको सहायता देने की इच्छा प्रकट करते हैं तो उनकी इच्छा व्यर्थ है, ऐसी स्थिति में जो बाह्य लोग हैं तो बात ही और है। जो व्यक्ति चारों समुद्रों को एक घूँट बना लेना चाहते हैं उसके सामने धरती एक भाग रख देने से क्या सन्तुष्टि होगी ? सुन्दरी कन्या को अर्पित करने का लोभ भी उत्पन्न किया जाय तो व्यर्थ है, क्योंकि आपको दृष्टि स्वयं लक्ष्मी के मुखकमल को ही देखने वाली है। इस प्रकार किसी भी उपाय के द्वारा उपस्थित किया गया पदार्थ चाहे वह कैसा भी हो आपके लिए अनुकूल नहीं बैठता, तो केवल हमारी प्रार्थना मात्र के अनुरोध से ही देव सुनें—प्राग्ज्योतिषेश्वर देव के साथ कभी न मिटने वाली मैत्री चाहते हैं। जैसे शिव के साथ एकपिङ्ग, इन्द्र के साथ दशरथ, कृष्ण के साथ अर्जुन, दुर्योधन के साथ कर्ण, वसन्त के साथ मलयानिल ने मैत्री की है। यदि देव का हृदय मित्रता का अभिलाषी हो और यह जानता हो कि मैत्री के नाम पर मित्र लोग दासता का भी आचरण करते हैं तो बैठे रहने से क्या ? आज्ञा दीजिए। कामरूप के अधिपति कुमार की केयूर मणि से आलिङ्गन में उस प्रकार रगड़ खाएगी जैसे मन्दराचल के कटक विष्णु के केयूर से टकराए
क्षिपतिः । अस्मिन्नात्मेन्द्रनवरतविमललावण्यसौभाग्यसुधानिर्झरिणि मुख- शशिनि चिराच्चक्षुषी लालयतु प्राग्ज्योतिषेश्वरश्रीः । नाभिनन्दति चेद्देवः प्रणयमाज्ञापयतु किं कथनीयं मया स्वामिन' इति । विरतवचसि तस्मिन्भूपालः पूर्वोपलब्धैरेव गुरुभिर्गुणैरारोपितबहुमानः कुमारे सुदूरमाभोगातपत्रव्यतिकरेण तु परां कोटिमारोपिते प्रेम्णि लज्जमान इव सादरं जगाद- 'हंसवेग ! कथमिव तादृशि महात्मनि महाभिजने पुण्यराशौ गुणिनां प्राग्रहरे परोक्षसुहृदि स्निह्यति मद्विधस्या- न्यथा स्वप्नेऽपि प्रवर्तेत मनः । सकलजगदुत्तापनपटवोऽपि शिशिरायन्ते त्रिभुवननयानन्दकरे कमलाकरे करास्तिग्मतेजसः । सुबहुगुणगण- क्रीताश्च के वयं सख्यस्य । सज्जनमाधुर्याणामभृतदास्यो दश दिशः । एकान्तावदातोत्तानस्वभावसंभृतसादृश्यस्य कुमुदस्य कृते केनाभिहितः शिशिररश्मिः । श्रेयांश्च संकल्पः कुमारस्य । स्वयं बाहुशाली मयि च समालम्बितशरासने सुहृदि हरादृते कमन्यं नमस्यति । संवर्धिता मे प्रीतिरमुना संकल्पेन । अवलेपिनि पशावपि केसरिणि बहुमानो हृदयस्य
थे । प्राग्ज्योतिषेश्वर की लक्ष्मी जब तक तृप्त न हो तब तक निरन्तर लावण्य और सौभाग्य के अमृत को झरने वाले आपके मुखचन्द्र में अपने नेत्रों को लगा दें । अगर देव कुमार के प्रणय का स्वागत नहीं करते तो आज्ञा दें । मैं जाकर स्वामी से क्या कहूँगा ? उसके इस प्रकार कहने पर कुमार के सृष्ट गुणों के पहले ही मिले परिचय से हर्ष के मन में आदरभाव उत्पन्न हो गया था और आभोग नामक छत्र को भेट में देने के सम्पर्क से वे कुमार के प्रति अत्यन्त प्रेमासक्त हो चुके थे । उन्होंने लज्जित होते हुए आदरपूर्वक कहा- 'हंसवेग, इस प्रकार महान आत्मा, महाकुलीन, पुण्यराशि, गुणियों में श्रेष्ठ, परोक्ष मित्र कुमार के स्नेह दर्शाने पर मेरे जैसे के मन में स्वप्न में भी अन्यथाभाव कैसे आ सकता है ? समस्त संसार को संतप्त कर देने में समर्थ सूर्य के तेज त्रिभुवन के नेत्र को आनन्दित करने वाले पद्मसमूह में आकर ठण्डे पड़ जाते हैं । कुमार के अनेक गुणों से जब हम बिक गये तो हमें मित्रता का अधिकार क्या ? दिशाएँ सज्जनों के मधुर स्वभाव के कारण ही वेतन के बिना ही उनकी दासी बन जाती हैं । अत्यन्त स्वच्छ स्वभाव कुमुदों को, जो स्वच्छहृदय सज्जनों का सादृश्य प्राप्त करते हैं, विकसित करने के लिए चन्द्रमा से किसने सिफारिश की है । कुमार का संकल्प श्रेष्ठ है । स्वयं वे बाहुबीर्यशाली हैं । धनुष धारण करके जब मैं मित्र के रूप हूँ तो शिव के अतिरिक्त किसी अन्य के सामने क्यों झुकेंगे । मेरे इस संकल्प से प्रीति और भी बढ़ गई । पशुजाति २५ ह० च०
३८६ हर्षचरितम् किं पुनः सुहृदि । तत्तथा यतेथाः यथा न चिरामयमस्मान्क्लेशयति कुमारदर्शनोत्कण्ठा' इति । हंसवेगस्तु विज्ञापयांबभूव—'देव ! किमपरमिदानीं क्लेशयत्यभि- जातमभिहितं देवेन । सेवाभीरवो हि सन्तः, तत्रापि विशेषेणायमहङ्कार- धनो वैष्णवो वंशः । आस्तां तावदस्मत्स्वामिवंशः । पश्यतु देवः पुरुषस्य हि सेवां प्रति दुर्जनन्येवातिवृद्धया दुर्गत्या वाभिमुखीक्रियमाणस्य, कुटुम्बिन्येवासंतुष्टया तृष्णया वा प्रेर्यमाणस्य, दुरपत्यैरिव यौवनजनितैर्ना- नाभिलाषिभिरसत्संकल्पैर्वाकुलीक्रियमाणस्य जरत्कुमारीमिव परमार्गण- योग्यामतिमहतीं वा अवस्थां पश्यतः, स्वगृहे दुर्बन्धुभिरिव दुःस्थितैः समग्रैर्ग्रहैर्वा ग्राह्यमाणस्याभियोगं, पुरातनैरतिदुस्त्यजैर्भृत्यैरिव मलिनैः कर्मभिर्वानुवर्त्यमानस्य, सकलशरीरसंतापकरं करीषाग्निमिव दुष्कृतिनः कृतचित्तस्य संप्रवेष्टुं राजकुलमुपहतसकलेन्द्रियशक्तेरिव मिथ्यैव हृदय- गतविषयग्रामग्रहणाभिलाषस्य, प्रथममेव तोरणतले वन्दनमालाकिस- में उत्पन्न अभिमान करने वाले सिंह के प्रति भी जब हृदय में आदर है तो मित्र के प्रति क्यों न हो ? तो तू जाकर यह प्रयत्न करना कि कुमार के दर्शन की उत्कण्ठा हमें चिरकाल तक न सताती रहे ।' हंसवेग ने निवेदन किया—'देव, दूसरा क्या कष्ट होगा ? देव ने बहुत ठीक कहा । सज्जन लोग अपनी सेवा से डरते हैं, अहंकार के धनी विष्णु ( वराह ) के वंश की तो बात ही और है । हमारे स्वामी के वंश की बात तो जाने दीजिए । देव ही देखें, दुष्ट जननी के समान अत्यन्त बढ़ी हुई ( अतिवृद्धा ) दुर्गति मनुष्य को नौकरी के लिए ढकेलती है । असन्तुष्ट तृष्णा पत्नी की भाँति उसे प्रेरित करती है । दुष्ट पुत्रों की भाँति यौवन- जनित नाना प्रकार की अभिलाषाओं से भरे हुए असत् संकल्प उसे आकुल कर डालते हैं । उस कन्या के समान, जो उम्र होने पर भी ब्याही नहीं गई ऐसी बुरी अवस्था को जिसमें दूसरों ( धनी लोगों या पति ) का अन्वेषण होता है, वह देखने लगता है । दुष्ट बान्धवों के समान सारे ग्रह उसके घर में डेरा डाल देते हैं और उसे सताने लगते हैं । पुराने हो जाने के कारण जिनसे पिण्ड छुड़ाना नहीं बनता, ऐसे भृत्यों के समान मलिन कर्म उसके पीछे पड़ जाते हैं । पाप का मारा वह सारे शरीर को संतप्त करने वाले भूसे की अग्नि के समान राजकुल में प्रवेश पाने के लिए निश्चय करता है। वह उस व्यक्ति के समान, जिसकी इन्द्रियों की सारी शक्ति ठप हो गई हो, विषयों के उपभोग की मन में झूठी साध करता है। पहले ही जब वह तोरणद्वार के
सप्तम उच्छ्वासः ३८७ लयस्येव शुष्यतो द्वारक्षिभिर्निरुद्धस्य, पीडितस्य प्रविशतो द्वारे हरिण- स्येवापरैर्हन्यमानस्य, करिकर्मचर्मपुटस्येव मुहुर्मुहुः प्रतिहारमण्डलकर- प्रहारैर्निंरस्यमानस्य, निधिपादपप्ररोहस्येव द्रविणाभिलाषादधोमुखीभ- वतः, दूरममार्गणस्याप्यतिविप्रकृष्टविवृतविसर्जितस्योद्वेगं व्रजतः, अकण्ट- कस्यापि चरणतललग्नस्याकृष्य क्षेपीयः क्षिप्यमाणस्य, अमकरकेतोर- प्यकालोपसर्पणाप्रकुपितेश्वरदृष्टिदग्धस्य, प्रलयमुपगच्छतः कपेरिव कोप- निर्भत्सितस्याप्यभिन्नमुखरागस्य, ब्रह्मघ्न इव प्रतिदिवसवन्दनोद्वृत्तशिरः- कपालस्य, स्पर्शरहितस्याशुभकर्माणि निर्वहतः, त्रिशङ्कोरिवोभयलोकभ्र- हस्तिनां युद्धशिक्षार्थं चर्ममयो हस्ती । प्रतिहारमण्डलेन दौवारिकसमूहेन । प्रतिसंहारेण वेष्टनेन मण्डलं यस्य करस्य तत्प्रहारैश्च । निधिपादपप्ररोहो निधान- गृहजन्मा वृक्षाङ्कुरः । स च सर्वो निधिप्रभावादधोमुखीभावः प्रणामः । अमार्ग- णस्यायाचकस्य च अतिविप्रकृष्टैः प्राकृतैः । पूर्वं विवृतः स्वतश्च लब्धदर्शन एव विसर्जितस्यात एवोद्वेगं मन्युं व्रजतः । मार्गणः शरश्चातिविप्रकृष्टं कर्णान्ते विवृतो विसर्जित उद्धतवेगं याति । अमकरकेतोरशृङ्गारिणोऽपि । अकालेऽप्रस्ताव उपसर्पणं यस्य सः । तथा । अप्रकुपितस्येश्वरस्य हर्षस्य दृष्ट्या दग्धः । ततो विशेषणसमासः । प्रलयः प्रकृष्टो लयो भित्त्यादिश्लिष्टत्वम्, नाशश्च । कपिसदृशः कपेलोंहितमुखत्वात् । प्रतिदिवसेत्यादि । ब्रह्मघ्नो हतब्राह्मणः कपालमहरहर्वन्दते । त्रिशङ्कुर्नाम चण्डाल- भावमास्थितोऽपि याजयित्वा विश्वामित्रेण स्वर्गमारोपितः कुपितेनेन्द्रेण हुंकार- पास पहुँचता है, द्वारपाल उसे रोक देते हैं और वह बन्दनवार के पत्ते की तरह वहीं सूखता रहता है। वहाँ के दुःख सहकर किसी तरह राजकुल की ड्योढ़ी के भीतर प्रवेश भी हो गया तो दूसरे लोग उस पर टूट कर हिरन की तरह कुटियाते हैं। चमड़े के बने हुए हाथी की तरह बार-बार प्रतिहारों के घूंसे खाकर धकिया दिया जाता है। धन कमाने की इच्छा से राजकुल में गया हुआ वह ऐसे मुँह लटकाए रहता है जैसे जमीन में गड़े खजाने के ऊपर लगाए गए पौधे की डाल नीचे झुकी हो। वह चाहे कुछ भी याचना न करे, फिर भी राजकुल में दूर तक प्रविष्ट हुआ वह जोर के साथ बाहर फेंक दिया जाता है, जैसे धनुष बाण को खींच कर जोर से फेंक देता है। यद्यपि वह काँटे की तरह गड़ कर किसी को दुःख नहीं देता तथापि पैर में लगा हुआ वह निकाल कर फेंक दिया जाता है। किसी प्रकार असमय में स्वामी के पास पहुँच भी गया तो उसकी कुपित दृष्टि उसे जला कर नष्ट कर देती है, जैसे अनाड़ी कामदेव देवताओं के फेर में पड़ कर शिव के द्वारा जल गया था। विनाश के मुख में पहुँचे हुए उसे डाँट-फटकार सुनने पर
३८८ हर्षचरितम् ष्टस्य नक्तंदिनमवाक्शिरसस्तिष्ठतः, वाजिन इव कवलवशेन सुखबाह्य- मात्मानं विदधानस्य, अनशनशायिन इव हृदयस्थापितजीवनाशस्य, शरीरं क्षपयतः शुन इव निजदारपराङ्मुखस्य, जघन्यकर्मलग्नमात्मानं ताडयतः, प्रेतस्येवानुचितभूमिदीयमानान्नपिण्डस्य, बलिभुज इव जिह्वा- लौल्योपयुक्तपुरुषवर्चसो वृथा विहितायुषो जीवतः, श्मशानपादपानिव पिशाचस्य दग्धभूत्या परुषीकृतान्राजवल्लभानुपसर्पतः, विपरीतजिह्वाज- नितमाधुर्यैरोष्ठमात्रप्रकटितरागै राजशुकालापैः शिशोरिव मुग्धविलोभ्य- तर्जितः । स च निपिप्सुरेव विश्वामित्रप्रभावादुभुवमनवाप्य तत्रैव पूर्वं लम्ब- मानोऽद्यापि स्थितः । कवलो ग्रासः । सुखेन बाह्यम् । बवयोरैक्यात् । सुखेभ्यो बहिर्भूतम्, कृच्छ्रेण व्याप्यं च । हृदये स्थापिता जीवने वृत्त्युपाय आशा येन, जीवस्य नाशो, जीवनाशश्च । जघन्यं निकृष्टम्, जघने भवं जघन्यं च सुतम् । अनु- चितायामशस्यायां भूमौ । चितायाः पश्चादनुचितम् । बलिभुजः काकस्य । लौल्यं चापलम्, अभिलाषश्च । उपयुक्तं व्ययीकृतम्, भुक्तं च । वर्चस्तेजः, विष्ठा च । वृथा विहितं कृतमायुर्यस्य, विध्यः पक्षिभ्यो हितमायुर्यस्य, वृथा निष्फलं जीवतः पिशाचस्य मूर्खस्य । भूतिः संपत्, भस्म च । राजानः शुका इव, राजशुकाश्च । भी वानर की तरह मुँहपर लाली बनाए रखनों पड़ती है। प्रतिदिन उसे सबके पैरों पर सिर रगड़ना पड़ता है, मानों उसे ब्रह्महत्या लगी हो। उसे कोई नहीं छूता, मानों अशौच पड़ गया हो। त्रिशंकु के समान दोनों लोकों से भ्रष्ट होकर दिन-रात वह नीचे मूड़ो लटकाए रहता है। घोड़े की तरह थोड़े से टुकड़ों के लिए वह अपने सब सुख छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है। अनशन करके सोने वाले की तरह उसके हृदय में हमेशा मर जाने की इच्छा रहती है। कुत्ते के समान अपनी पत्नी से पराङ्मुख होकर वह अपने शरीर को कँपाता रहता है और नीच कर्म में प्रवृत्त अपने आपको स्वयं वह पीटता रहता है। प्रेत के समान भोजन करने के लिए जहाँ के तहाँ (अनुचित जगह में) बैठा दिया जाता है। वह कौवे की तरह जीभ के चटोरेपन में अंधड़ कर अपने बल को उपयोग में लाता है और व्यर्थ आयु गँवाते हुए जीता है। जैसे श्मशान के वृक्षों पर पिशाच मँडराता है उसी प्रकार वह नासपीटी बढ़ोत्तरी पाकर बदमिजाज हुए राजा के मुंहलगे लोगों के पास चक्कर लगाता रहता है। मीठी-मीठी बातें करने वाले और ओठ मात्र में ही राग दिखलाने वाले सुग्गे बच्चों की तरह उसे भुलावे में डाल देते हैं। मदारी के प्रभाव में पड़ कर बेताल जाते उसी प्रकार वे भी राजा के डर के मारे अपने मन से कुछ भी नहीं कर सकते। जैसे चित्रलिखित धनुष चढ़ी
सप्तम उच्छ्वासः ३८१ मानस्य, वेतालस्येव नरेन्द्रप्रभावाविष्टस्य न किंचिन्नाचरतः, चित्रधनुष इवालीकगुणाध्यारोपणैकक्रियानित्यनम्रस्य निर्वाणतेजसः, संमार्जनीसमुपा- र्जितरजसोऽवकरकूटस्येव निर्माल्यवाहिनः, कफविकारिण इव दिने दिने कटुकैरुद्वेज्यमानस्य, सौगतस्येवार्थशून्यविज्ञप्तिजनितवैराग्यस्य काषाया- श्यभिलषतः, निशास्वपि मातृबलिपिण्डस्येव दिक्षु विक्षिप्यमाणस्य, अशौचगतस्येव कुशयनजनितसमधिकतरदुःखवृत्तेः, तुलायन्त्रस्येव पश्चात्कृतगौरवस्य तोयार्थमपि नमतः, अतिकृपणस्य शिरसा केवलेना- संतुष्टस्य वचसापि पादौ स्पृशतः, निर्दयवेत्रिवेत्रताडनत्रस्तयेव त्रपया त्यक्तस्य, दैन्यसंकोचितहृदयहतावकाशयेवाहोपुरुषिकया परिवर्जितस्य, कु- राजशुकभेदाः । नरेन्द्रो राजा, मन्त्रविच्च । गुण उत्कर्षः, ज्या च गुणः । निर्वाणं प्रशान्तम्, निर्गतवान्तेजश्च। अवकरकूटो मार्जनीक्षिप्तो रजस्तृणादिसंघातः । उक्तं च—'संमार्जनी शोधनी स्यात्संकरोऽवकरस्तथा। क्षिप्ते' इति। अमाल्यवाहित्वेन निःश्रीकत्वमुच्यते । कटुकैः प्रतीहारैः, तीक्ष्णैश्च । अर्थशून्यया निष्फलया । विज्ञप्त्या प्रार्थनया कृतोद्वेगस्य । बौद्धानामपि बाह्यवस्तुशून्यानि विज्ञानानि । अशौचं मृतकादि । कुशयनं कुत्सितशय्या, भूमिश्च कुः । पश्चात्कृतं वर्जितम् , पृष्ठतश्च कृतम् । गौरवं महत्त्वम् , गुरुत्वं च । तोयशब्दो जलोपलक्षणार्थः । तोयं जलं च पादस्पर्शनं पथोऽपि । त्रपया लज्जया । 'आहोपुरुषिका दर्पाद्या स्यात्संभावना- त्मनि' । स्वमात्मा, धनं च । उक्तं च—'स्वो ज्ञातावात्मनि स्वं त्रिष्वात्मीये स्वोऽ- प्रत्यञ्चा से झुका हुआ भी बाण चलाने की शक्ति नहीं रखता उसी प्रकार झूठ-मूठ किसी के गुणों की प्रशंसा करते हुए अपनी नम्रता दर्शाता है और उसका तेज बुझा रहता है। झाडू से बटोर कर एकत्र किये गए कूड़े की तरह वह श्रीहीन होता है ( कभी माला नहीं धारण करता ) । कफ के रोगी की तरह उसे दिन पर दिन प्रतिहार और प्यादे घुड़कते रहते हैं। सेवा करने से टका-पैसा नहीं मिलता तो मन में वैराग्य उत्पन्न होकर बुद्ध के समान गेरुआ धारण कर लेने की इच्छा करने लगता है। मातृबलि के पिंडे की तरह रात के समय में भी बाहर फेंक दिया जाता है। अशौच में पड़े हुए की तरह वह मोटी-झोटी अपनी रहन-सहन से अनेक प्रकार के दुःख उठाता है। पीछे भार बढ़ने से तराजू जैसे झुक जाती है उसी प्रकार आत्मसम्मान को पीछे डाल कर पानी के लिए भी झुकता रहता है। अत्यन्त दीन हो जाने के कारण सिर से केवल पैर नहीं छूता, बल्कि असन्तुष्ट होकर बात-बात में पैर छूने के लिये तैयार रहता है। निष्ठुर प्रतीहारों की मार खाते-खाते वह बेहया हो जाता है। दीनता के कारण हृदय के बुझ जाने से उसकी आत्म-गौरव की भावना समाप्त हो जाती है। निन्दित कर्मों के
३६० हर्षचरितम् त्सितकर्माङ्गीकरणकुपितेयेवोन्नत्या वियुक्तस्य, धनश्रद्धया क्लेशानुपार्जयतः, स्ववृद्धिबुद्ध्यावमानं संवर्धयतो मूढस्य, सत्यपि विविधकुसुमाधिवाससुर- भिणि वने तृष्णयाञ्जलिमुपरचयतः, कुलपुत्रस्यापि कृतागस इव भीतभीतस्य समीपमुपसर्पतः, दर्शनीयस्याप्यालेख्यकुसुमस्येव निष्फलजन्मनः, विदुषोऽपि वैधैयस्येवापशब्दमुखस्य, शक्तिमतोऽपि श्वित्रिण इव संकोचितकरयुग- लस्य, समसमुत्कर्षेषु निरग्निरपच्यमानस्य, नीचसमीकरणेषु निरुच्छ्वासं म्रियमाणस्य, परिभवैस्तृणीकृतस्य, दुःखानिसेनानिर्वृतेर्ज्वलतः, भक्तस्या- प्यभक्तस्य, निरूष्मणः संतापयतो बन्धून्, विमानस्याप्यगतिकस्य, च्युत- गौरवस्याप्यधस्ताद्गच्छतः, निःसत्त्वस्यापि महामांसविक्रयं कुर्वतः, निर्म- दस्याप्यस्वतन्त्रवृत्तेः, अयोगिनोऽपि ध्यानवशीकृतात्मनः, शय्योत्थायं स्त्रियां धने' इति । अधिवासः सौगन्ध्यम्, भावना च । वनं काननम्, जलं च । तृष्णा धनस्पृहा मृगतृष्णा च । विदुषो जानानस्य, पण्डितस्य च। वैधैयस्य मूर्खस्य । अपगतशब्दं मुखं यस्य, लक्ष्यहीनश्च । शब्दोऽपशब्दः । श्वित्रं कुष्ठव्याधिभेदः । समास्तुल्यशीलाः । अनिर्वृतेरप्रतीतेः । अनिर्वृतेर्गमनत्यागाभावाच्च । भक्तस्य हितै- षिणः । अभक्तस्यालब्धसविभागस्य । विरोधः स्पष्टः सर्वत्र । ऊष्मा गत्रोऽपि । विमानस्य विगतमानस्य, व्योमयानस्य च । गतिरुपायोऽपि । गौरवमादरोऽपि । महामांसं स्वकायोऽपि । मदो गर्वः, क्लीबता च । अयोगिनो विपरीतदैववतः । दरि- ही हमेशा करते रहने से उसका अभ्युदय रुक जाता है। धन के कमाने से केवल क्लेशों का उपार्जन करता है। अपमानों को ही वह मूर्ख अपनी वृद्धि समझ लेता है। अनेक प्रकार के फूलों की गन्ध से भरे वन के होने पर भी जब देखो उसकी तृष्णाञ्जलि बनी रहती है। कुलपुत्रों के पास भी अपराधी की भाँति थर-थर काँपता रहता है। देखने योग्य होने पर भी चित्रलिखित पुष्प के समान उसका जन्म लेना व्यर्थ हो जाता है। ज्ञान से भरा होने पर भी उसके मुँह से अनजान की तरह बात नहीं निकलती। शक्ति होने पर भी उसके हाथ कोढ़ी की तरह नीचे रह जाते हैं। उसके बराबर के लोग जब तरक्की पा लेते हैं तो बिना आग के भीतर ही भीतर पकने जलने लगता है। और जब मातहत के लोग बराबरी में आ जाते हैं तो साँस के न निकलने पर भी मर जाता है। पद के घटने से तिनके की तरह प्रतिष्ठा खो बैठता है। दुःख की वायु का झोंका उसे रात-दिन दहकाता रहता है। राजभक्त होने पर भी हिस्से में उसे कुछ नहीं मिलता। उसकी गरमी सब कम पड़ जाती है, पर भाई-बन्धुओं को सताता है। उसका मान नहीं रहता। फिर भी अपने पद से नहीं डिगता। उसका गौरव नहीं रह जाता और वहीं नीचे ही गिरता जाता है। उसका सत्त्व चला जाता है, फिर भी अपने
सप्तम उच्छ्वासः ३६१ प्रणमतो दग्धमुण्डस्य, गोत्रविदूषकस्य नक्तंदिनं नृत्यतो मनस्विजनं हासयतः, कुलाङ्गारस्य वंशं दहतः, नृपशोस्तृणेऽपि लब्धे कन्धरानमन- मयतः, जठरपरिपूर्णमात्रप्रयोजनजन्मनो मांसपिण्डस्य गर्भरोगस्य मातुः, अपुण्यानां कर्मणामाचरणाद्भृतकस्य किं प्रायश्चित्तम्, का प्रति- पत्तिक्रिया, क्व गतस्य शान्तिः, कीदृशं जीवितम्, कः पुरुषाभिमानः, किंनामानो विलासाः, कीदृशी भोगश्रद्धा, प्रबलपङ्क इव सर्वमधस्तान्न- यति दारुणो दासशब्दः । धिक्तदुच्छ्वसितमुपयातु निधनं धनम्, अभ- वनिर्भूतेरस्तु तस्या नमो भगवद्भ्यस्तेभ्यः सुखेभ्यस्तस्यायमञ्जलिरैश्व- र्यस्य तिष्ठतु दूर एव सा श्रीः शिवं स परिच्छदः करोतु यदर्थमुत्त- द्रश्येत्यन्ये, अप्राप्तबलस्येत्यन्ये, चित्तवृत्तिनिरोधाभाववतश्च । दग्धमुण्डस्यातपहत- शिरसः, व्रतिभेदश्च दग्धमुण्डः । विदूषको नायकश्च, नर्मसुहृच्च । वंशो वेणुः । दारुणो दुःसहः, काष्ठस्य च । सर्वमस्त्विति योजना । मुखप्रियेत्यादावेवंविधः सेवकोऽपि यदि मर्त्यमध्ये गण्यते तद्राजिलोऽपि भोगी कथं न भवति । पुलाको व्युषः कलमः कथ न स्यादिति संबन्धः । तपस्वी वराकोऽपि । मुषि विपमानस्य(?) आपको बेचा करता है । वह मद से रहित होता है और अपनी वृत्ति का स्वयं मालिक नहीं होता । योगी नहीं होकर भी उसका अन्तरात्मा सदा सोच-विचार के वशीभूत रहता है । दग्धमुण्ड साधुओं की भाँति खाट से उठते ही सबको प्रणाम करने का उसका स्वभाव बन जाता है । घर के विदूषक की तरह रातदिन नाच-नाच कर दूसरों को हँसाता रहता है । कुलाङ्गार की भाँति वंश को जला डालता है । मनुष्य के रूप में पशु वह तिनके के लिए भी कन्धा झुका देता है । उसका जन्म केवल पेट का गड्ढा भरने के लिये होता है। सचमुच वह तो मांसपिण्ड के रूप में निकलता हुआ माता का गर्भ रोग है। अपुण्य कर्मों के हमेशा आचरण करने से वह मृतक कौन-सा प्रायश्चित करे ? कौन-सा उपाय करे ? कहाँ पर जाय, जिससे शान्ति मिले ? उसका जीवन कैसा ? अभिमान कैसा ? विलास कैसे ? सुख भोगने की इच्छा कैसी ? उसके नाम के साथ जुड़ा हुआ यह 'दास' शब्द कीचड़ की ढाब की भाँति सबको गड़प जाता है । उसके जीने को धिक्कार है । वह धन मिट जाय, उस वैभव का सत्यानाश हो, उन सुखों को दण्डवत् प्रणाम है, उस ऐश्वर्य को हथजोरी है, वह लक्ष्मी दूर रहे, उस टीम टाम से जान बचे, अपने को पृथिवी पर रगड़ना पड़े । राजसेवक ऐसा तपस्वी है जो क्रोधित होकर शाप नहीं दे सकता और प्रसन्न होकर
३६२ हर्षचरितम् माङ्गं गां गमिष्यत्यशापानुग्रहक्षमस्तपस्वी मुखप्रियरतः क्लीबो पूतिमां- समयः कृमिरगण्यमानो नरकः, पादरजोधूसरोत्तमाङ्गो जङ्गमः पादपीठः पुंस्कोकिलः काकुकणितेषु, शिखी सुखकरकेकासु, स्थूलकूर्मः क्रोडक- षेषु, श्वा नीचचाटुकरणेषु, कृकलासः शिरोविडम्बनासु, जाहक आत्म- संकोचनेषु, वेणुर्मूर्च्छनासु, वेश्याकायः करणबन्धक्लेशेषु, पलालं सत्त्व- शालिषु, प्रतिपादकः पादसंवाहनासु, कन्दुकः करतलताडनेषु, वीणा- दण्डः कोणाभिघातेषु, वराकः सेवकोऽपि मर्त्यमध्ये राजिलोऽपि वा भोगी, पुलाकोऽपि वा कलमो, वरं क्षणमपि कृता मानवता मानवता न मतो नमतस्त्रैलोक्याधिराज्योपभोगोऽपि मनस्विनः। तदेवमभिनन्दि- सुखदायिनः रतः रक्तः। मुख आरम्भे, वदने च। प्रियं रतं मोहनं यस्य। क्लीबोऽ- शक्तः, शरण्यश्च। पूति दुर्गन्धम्। अगण्यमानो न गणनाहैः। कुत्सितो नरो नरकः, अगण्यश्च मानो यस्य सोऽगण्यमानो नरको भौमनामा। अवीच्यादिर्वा। काकुकणितम्, मधुरवचनम्। भिन्नध्वनिर्वक्त्वकथनं निर्व्यापारत्वाच्छोकाद्वा। कृकलासोऽप्यनवरतं शिर उन्नमयन्नास्ते। जाहकः आखुतुल्यः प्राणिभेदः, कूर्म इत्यन्ये। मूर्च्छना मोहः, स्वराणां विशिष्टा स्थितिश्च। करणं शरीरम्, मन्त्रो वा। कामशास्त्रोदितकरणानि। कोणो लगुडश्च। यथा। शालिषु पलालमप्रयोजनं तद्व- दसौ। राजिलो डिण्डिभाख्यो निर्विषः सर्पः। पुलाकः फलदरिद्रः। शालिः श्यामाक- प्रायः। मानवताऽहंकारिणा, मानवस्य कर्म मानवता पौरुषम्। न मतः नेष्टः, नमतः प्रणामं कुर्वतः। अनुग्रह नहीं कर सकता। केवल मुख से मीठा बात करने वाला नपुंसक है। पीव और मांस से भरा कीड़ा है। जिसकी कोई गणना नहीं ऐसा कुत्सित नर (नरक) है। दूसरों के पैरों की धूल से भरे मस्तक वाला चलता-फिरता पादपीठ है, लप्पो-चप्पो करने वाला नरकोयल है, मीठी बोल उचारने वाला मोर है, धरती पर सीना घिसने वाला कछुआ है, चापलूसी का कुत्ता है, केवल सिर हिलाने वाला गिरगिट है, अपने आपको सिकोड़कर रखने वाला चूहा है, राग अलापने वाला वेणु है, दूसरे के लिए शरीर को तोड़-मरोड़ करने में वेश्या की भाँति है। सत्त्व वाले व्यक्तियों में घास-फूस की तरह है, दाबने में पैर का बोझ उठाने वाला पंगरू का पावा है, हाथ की मार सहने में कन्दुक है और कोणाभिघात (दूसरा अर्थ—छड़ी की मार) का अभ्यस्त वीणादण्ड है। बेचारे राजसेवक को अगर मनुष्यों में गिना जाय तो राजिल (पानी वाला ढोंड़ साँप) को भी सर्प मानना पड़ेगा, पयाल की भी धान में गिनती होनी चाहिए। मनस्वी के लिए क्षण भर भी मानवता के गौरव के साथ जीना अच्छा, किन्तु मनस्वी के लिए त्रैलोक्य के राज्य का उपभोग भी
सप्तम उच्छ्वासः ३६३ तास्मदीयप्रणयो देवोऽपि दिवसैः कतिपयैरेव परागतः प्राग्ज्योतिषेश्वर इति करोतु चेतसि' इत्युक्त्वा तूष्णीमभूत् । अचिराच्च नमस्कृत्य निर्जगाम । राजापि रजनीं तां कुमारदर्शनौत्सुक्यस्वीकृतहृदयः समनैषीत्। आत्मा- र्पणं हि महताममूलमन्त्रमयं वशीकरणम् । प्रभाते च प्रभूतं प्रतिप्राभृतं प्रधानप्रतिदूताधिष्ठितं दत्त्वा हंसवेगं प्राहिणोत् । आत्मनापि ततः प्रभृति प्रयाणकैरनवरतैरभ्यमित्रं प्रावर्तत । कदाचित्तु राज्यवर्धनभुजबलोपार्जित- मशेषं मालवराजसाधनमादायागतं समीप एवावासितं लेखहारकाद्भण्डि- मशृणोत् । श्रुत्वा चाभिनवीभूतभ्रातृशोकहुताशनस्तद्दर्शनकातरहृदयो बभूव मूर्च्छांन्धकारमिव विवेशातिष्ठच्च समुत्सृष्टसकलव्यापारः प्रतीहार- निवारणनिभृतनिःशब्दपरिजने निजमन्दिरे सराजकपरिवारस्तदागम- नमुदीक्षमाणो मुहूर्तम् । अथ भण्डिरेकेनैव वाजिना कतिपयकुलपुत्रपरिवृतो मलिनवासा माल्यान्योषधयः । साधनं हस्त्यादि । निभृतः सनयः । अथेत्यादि । राजद्वारं भण्डिराजगामेति संबन्धः । अच्छा नहीं, यदि उसके लिये सिर झुकाना पड़े । तो हमारे प्रणय को स्वीकार करने वाले देव भी यह समझें कि कुछ ही दिनों में प्राग्ज्योतिषेश्वर आ जाते हैं।' इतना कहकर हंसवेग चुप हो गया । थोड़ी देर बाद नमस्कार करके चलता बना । राजा ने भी उस रात को कुमार के दर्शन की उत्सुकता में व्यतीत किया । आत्म- समर्पण कर देना महापुरुषों का मूलमन्त्ररहित वशीकरण है । प्रातःकाल उन्होंने प्रधान दूत के साथ बदले में बहुत-सा उपहार देकर हंसवेग को विदा किया । स्वयं शत्रु पर चढ़ाई करने के लिए सेना का प्रयाण उस दिन से बराबर जारी रखा । एक दिन लेखहारक ने आकर यह सूचना दी कि राज्यवर्धन की सेना ने मालवराज की जिस सेना को जीत लिया था उस सबको साथ लेकर भण्डि आ रहा है और समीप ही पहुँच गया है । सुनते ही उनके हृदय में भ्रातृशोक की अग्नि फिर से उमड़ गई और भण्डी को देखने के लिये व्याकुल हो गये, मानों मूर्च्छा के अन्धकार में प्रवेश कर गये हों । सब कार्य को छोड़कर राजसमूह और अन्तःपुर के लोगों के साथ भण्डि के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए क्षण भर अपने भवन में ठहरे । प्रतीहारों के रोक लगा देने से भवन के सब परिजन इशारे से काम करते थे । कुछ समय के बाद भण्डि अकेला ही घोड़े पर सवार कुछ कुलपुत्रों को साथ किए
अष्टम उच्छ्वास: राज्यश्री की खोज, दिवाकरमित्र व उपसंहार
३६४ हर्षचरितम् रिपुशरशल्यपूरितेन निखातबहुलोहकीलकपरिकररक्षितस्फुटनेनेव हृद- येन, हृदयलग्नैः स्वामिसत्कृतैरिव श्मश्रुभिः, शुचं समुपदर्शयन्दूरीकृत- व्यायामशिथिलभुजदण्डदोलायमानमङ्गलवलयैकशेषालंकृतिरनादरोपयु- क्तताम्बूलविरलरागेण शोकदहनदह्यमानस्य हृदयस्याङ्गारेणेव, दीर्घनिः- श्वासवेगनिर्गतेनाधरेण शुष्यता स्वामिविरहविधृतजीवितापराधवैलक्ष्या- दिव, बाष्पवारिपटलेन पटेनेव प्रावृतवदनः, विशन्निव दुर्बलीभूतैः स्वाङ्गै- मपत्रपयाङ्गैरेवमग्निव च व्यर्थीभूतभुजोषमाणमायतैर्निःश्वसितैः, पातकीव, अपराधीव, द्रोहीव, मुषित इव, छलित इव, यूथपतिपतनविषण्ण इव वेगदण्डवारणः, सूर्यास्तमयनिःश्रीक इव कमलाकरः, दुर्योधननिधनदु- र्मना इव द्रौणिः, अपहृतरत्न इव सागरो राजद्वारमाजगाम । अवतीर्य च तुरङ्गमादवनतमुखो विवेश राजमन्दिरम् । दूरादेव च विमुक्ताक्रन्दः पपात पादयोः । श्मश्रुरिति । शोकवशेन ततो विच्छित्त्वाद्वा । राजद्वार पर आया । उसके कपड़े मलिन थे, उसकी छाती में शत्रु के बाणों के घाव थे । लोहे के कड़े कीलों वाले परिकर के धारण कर लेने से वह बच निकला था । स्वामी के आदर से मानों उसकी दाढ़ी छाती तक बढ़ आई थी, जिससे उसके शोक का पता चल रहा था। बहुत दिनों से व्यायाम के छूट जाने के कारण उसके हाथ पतले पड़ गए थे और उसका मंगलवलय खिसक कर नीचे कलाई में आ गया था । बिना मन के चबाए हुए पान की लाली शोक की अग्नि से जले हुए हृदय के अंगारे की भांति लग रही थी । उसका अधर लम्बी सांस के निकलते रहने से सूख रहा था, मानों स्वामी के विरह के बाद भी जीवित रहने के अपराध से लज्जित था। आँसुओं की झड़ी ऐसे लगी थी मानों उसके मुँह पर शोकपट ढँका हो । लज्जा के मारे उसके अङ्ग अपने आप में सिमटते जा रहे थे । वह लम्बी सांसों से मानों व्यर्थ पड़ी भुज की गरमी को छोड़ रहा था। वह पातकी, अप- राधी, द्रोही, लुटा हुआ, छला हुआ जैसा लग रहा था। उसकी ऐसी दीन दशा थी जैसे यूथपति के मरने पर तरुण हाथी की हो जाती है। वह उस सरोवर के समान था जो सूर्य के अस्त हो जाने से हो जाता है, जैसे दुर्योधन के मर जाने से अश्वत्थामा दुःखी हुआ उसी प्रकार वह भी राज्यवर्धन के निधन से विषादमग्न था। वह उस समुद्र की भांति था जिसमें से रत्न हर लिया गया हो । घोड़े से उतर कर वह मुँह लटकाए ही राजमंदिर के भीतर गया। दूर ही से धाड़ मार कर वह पैरों पर गिर पड़ा ।
सप्तम उच्छ्वासः ३६५ अवनिपतिरपि दृष्ट्वा तमुत्थाय प्रविरलैः पदैः प्रत्युद्गम्योत्थाप्य च गाढमुपगूह्य कण्ठे करुणमतिचिरं रुरोद । शिथिलीभूतमन्युवेगश्च पुरैव पुनरागत्य निजासने निषसाद । प्रथमप्रक्षालितमुखे च भण्डौ मुखं प्रक्षा- लयत् । समतिक्रान्ते च कियत्यपि कालकलाकलापे भ्रातृमरणवृत्तान्त- मप्राक्षीत् । अथकथयच्च यथावृत्तमखिलं भण्डिः । अथ नरपतिस्त- मुवाच—'राज्यश्रीव्यतिकरः कः ?' इति । स पुनरवादीत्—'देव ! देव- भूयं गते देवे राज्यवर्धने गुप्तनाम्ना च गृहीते कुशस्थले देवी राज्यश्रीः परिभ्रश्य बन्धनाद्विन्ध्याटवीं सपरिवारा प्रविष्टेति लोकतो वार्तामशृण- वम् । अन्वेष्टारस्तु तां प्रति प्रभूताः प्रहिता जना नाद्यापि निवर्तन्ते' इति । तच्चाकर्ण्य भूपतिरब्रवीत्—'किमन्यैरनुपदिभिः यत्र सा तत्र परित्यक्तान्यकृत्यः स्वयमेवाहं यास्यामि । भवानपि कटकमादाय प्रवर्ततां गौडाभिमुखम्।' इत्युक्त्वा चोत्थाय स्नानभुवमगात् । कारितशोकश्म- श्रुवपनकर्मणा च महाप्रतीहारभवनस्नातेन, शारीरिकवसनकुसुमाङ्गरागा- लंकारप्रेषणप्रकटितप्रसादेन भण्डिना सार्धमभुक्त, निनाय च तेनैव सह वासरम् ।
हर्ष उसे देखकर उठे और लड़खड़ाते पैरों से आगे बढ़ उसे गले लगाया और स्वयं भी देर तक फूट-फूट कर रोते रहे । जब उनका शोक कुछ कम हुआ तब पहले की तरह आकर आसन पर बैठ गए । जब भण्डि अपना मुँह धो चुका तब उन्होंने भी धोया । कुछ देर के बाद भाई की मृत्यु का वृत्तान्त पूछा । जैसा हो चुका था भण्डि ने सब हाल कह सुनाया । तब राजा ने उससे फिर कहा—'राज्यश्री की क्या गति हुई ?' वह फिर बोला— 'देव, देव राज्य वर्धन के दिवंगत होने पर जब गुप्त नाम के व्यक्ति ने कान्यकुब्ज पर अधिकार कर लिया तो देवी राज्यश्री किसी प्रकार बन्धन से छूट कर अपने परिवार के साथ विन्ध्याचल के जंगल में चली गई । यह मैंने लोगों के मुँह से सुना है । बहुत खोज- पड़ताल करने वाले आदमी वहाँ भेजे गए जो अभी तक नहीं लौटे ।' यह सुनकर राजा ने कहा—'औरों के ढूँढने से क्या ? जहाँ राज्य श्री है मैं वहां दूसरे सब काम छोड़ कर स्वयं जाऊँगा । तुम भी सेना लेकर गौड़ पर चढ़ाई करो।' यह कहकर वे उठे और स्नानभूमि में चले गए । भण्डि ने हर्ष के कहने पर शोक से बढ़े हुए केशों का क्षौर कराया और महाप्रतीहार-भवन में स्नान किया । हर्ष ने उसके लिए वस्त्र, पुष्प, अंगराग और आभूषण भेज कर अपना प्रसाद प्रकट किया और साथ ही भोजन किया । एवं वह दिन उसके साथ ही बिताया ।
३६६ हर्षचरितम्
अथापरेद्युरुषस्येव भण्डिर्भूतपालमुपसृत्य व्यज्ञापयत्—'पश्यतु देवः श्रीराज्यवर्धनभुजबलार्जितं साधनं सपरिबर्हं मालवराजस्य' इति । नर- पतिना स 'एवं क्रियताम्' इत्यभ्यनुज्ञातो दर्शयांबभूव । तद्यथा—अन- वरतगलितमदमदिरामोदमुखरमधुकरजूटाजटिलकरटपट्टपङ्किलगण्डान् , गण्डशैलानिव जङ्गमान् , गम्भीरगर्जितरवाञ्जलधरानिव महीमवतीर्णा- नुत्फुल्लसप्तच्छदवनामोदमुचः, शरदिवसानिव पुञ्जीभूतान् , अनेकसहस्र- संख्यान्करिणः, चारुचामीकरचित्रचामरमण्डलमनेहरांश्च हरिणरंहसो हरीन् , बालआतपविसरवर्षिणां च किरणैरनेकेन्द्रायुधीकृतदशदिशामलं- काराणां विशेषान् , विस्मयकृतः स्मरोन्मादितमालवोकुचपरिमलदुर्ललि- तांश्च निजज्योत्स्नापूरप्लावितदिगन्तानपि तारान्हारान् , उडुपतिपादसं- चयशुचीनि निजयशांसीव बालव्यजनानि, जातरूपमयनालं च निवा- मपुण्डरीकमिव श्रियः श्वेतमातपत्रम् , अप्सरस इव बहुसमररससाहसा- नुरागावतीर्णा वारविलासिनीः, सिंहासनशयनासन्दीप्रभृतीनि सद्योप- करणानि, कालायसनिगडनिश्चलीकृतचरणयुगलं च सकलं मालवराजलो-
उसके बाद दूसरे दिन पौ फटते ही भण्डि ने राजा के पास आकर निवेदन किया— 'श्री राज्यवर्धन के भुजबल से मालवराज की जो सेना साज-सामान के साथ जीती गई है उसे देव देखने की कृपा करें।' राजा ने 'ऐसा ही करो' जब यह आज्ञा दी तो उसने वह सब सामान दिखाया। हजारों की संख्या में अनेक हाथी, जिनके गण्डस्थल को हमेशा बहते हुए मदजल की मादक गंध से आकृष्ट होकर लूझते हुए भौंरे पंकिल बना रहे थे, जो चलते-फिरते गण्डशैल की भांति लग रहे थे और इस प्रकार चिग्घाड़ रहे थे मानों पृथिवी पर उतरे हुए मेघ हों, और खिले हुए तमाल वन की तरह जिनकी गंध फैल रही थी। हरिण की भांति तेज चाल वाले घोड़े सुन्दर सुनहली चौरियों से सजे थे। बहुत से अलंकार, जिनकी किरणें बालआतप के रूप में निकल रही थीं, अपनी रंग-बिरंगी प्रभा से दिशाओं में इन्द्रायुधों का निर्माण कर रहे थे। आश्चर्य करने वाले शुद्ध मोतियों से पोहे गए तारहार जिनमें काम से मतवाली मालवी स्त्रियों के कुचों के परिमल लगे हुए थे और जो अपनी ज्योत्स्ना के प्रभाव से दिशाओं को प्लावित कर रहे थे। चन्द्रमा के किरणसमूह के समान सफेद चँवर जो हर्ष के अपने यश की भांति प्रतीत हो रहे थे। सुवर्ण दण्ड वाला श्वेत छत्र, जो मानों लक्ष्मी के निवास का कमल हो। वेश्याएँ, जो मानों अनेक युद्धों के देखने के साहस और अनुराग से पृथिवी पर उतरी हुई अप्सराएँ हों। सिंहासन, शयनासन आदि राज्य का सामान पैरों में