हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 426, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ३७५ श्रोल्लक्ककलशीः सितासितस्य च चामरजातस्य निचयान्, अवलम्बमान- तूलिकालाबुकांश्च लिखितानेकलेख्यफलकसंपुटान्, कुतूहलकृन्ति च कनकश्शृङ्खलानियमितग्रीवाणां किंनराणां च वनमानुषाणां च जीवञ्जीव- कानां च जलमानुषाणां च मिथुनानि, परिमलामोदितककुभश्च कस्तूरि- काकुरङ्गान्, गेहपरिसरणपरिचिताश्च चमरीः, चामीकररसचित्रवेत्रपञ्जरा- न्तर्गतांश्च बहुसुभाषितजल्पाकजिह्वांश्च^१ शुकशारिकाप्रभृतीन्पक्षिणः, प्रवा- लपञ्जरगतांश्च चकोरान्, जलहस्तिनामुद्रकुम्भमुक्ताफलदामदन्तुराणि च दन्तकाण्डकुण्डलानि । राजा तु छत्रदर्शनात्प्रहृष्टहृदयः प्रथमप्रयाणे शोभननिमित्तमिति मनसा जग्राह । हंसवेगं च प्रीयमाणो बभाषे—'भद्र ! सकलरत्नधाम्नः परमेश्वरशिरोधारणार्हस्यास्य महातपत्रस्य महार्णवादिव कुमुदबान्धवस्य माहुः । उल्लकः सुगन्धिफलविशेषरसः । आसवभेद इत्यन्ये । तूलिका ऊर्जिका । यया चित्रं क्रियते । अलाब्यस्तुम्ब्यः । प्रवालो विद्रुमः । उक्तं च—'अथ विद्रुमः पुंसि प्रवालं पुंनपुंसकम्' इति । 'नीहारो मिहिका चाथ' । तरह ठंडे सफेद और साफ कपूर के डले, कस्तूरी के नाफे (थैली) जो कस्तूरी मृगों की नाभि से निकलते हैं। कक्कोल के पक्के फलों से युक्त कक्कोलपल्लव । लवंगपुष्पों की मंजरियाँ, जायफल के गुच्छे, जस्ते की कपड़े चढ़ी कलसी या सुराहियाँ, जिनमें अत्यन्त मीठा मधुरस भर कर लाया गया था, जिनकी भीनी सुगन्धि बाहर फैल रही थी। चित्र- फलों के जोड़े, जिनमें भीतर की ओर चित्र लिखे थे और उनके एक ओर तूलिका एवं रङ्ग रखने के लिए छोटी अलाबू की कुप्पियाँ लटक रही थीं। कुतूहल उत्पन्न करने वाले भाँति-भाँति के पशु-पक्षी जैसे सोने की श्रृंखलाओं से गर्दन में बँधे हुए किन्नर, वन- मानुस, जीवंजीवक, जलमानुषों के जोड़े, दिशाओं में सुगन्धि फैलाते हुए कस्तूरीहिरन, घरों में विचरने वाली विश्वासभरी चँवरी गाय, सुनहले रंग से बेंत के पिंजरों में अनेक प्रकार के सुभाषित पाठ करने वाले शुकसारिका प्रभृति पक्षी-मूँगे के पिंजरों में बैठे हुए चकोर, जलहस्तियों के मस्तक से निकलने वाले मुक्ताफल से जड़े हुए हाथीदाँत के कुण्डल। छत्र देखते ही राजा का हृदय प्रसन्नता से भर गया और उसने पहले प्रस्थान के समय मन में उसे शुभ निमित्त समझ कर स्वीकार किया। उन्होंने स्नेहपूर्वक हंसवेग से कहा— 'भद्र, सब प्रकार के रत्नों से भरे हुए सम्राट् के सिर पर धारण करने योग्य इस महाछत्र १. जातीः कौशिकशुक ।