हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 425, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ें३७८ हर्षचरितम् पट्टिकाः, चित्रपटानां च श्रदीयसां समूरूकोपधानादीन्विकारान्, प्रियङ्गु- प्रसवपिङ्गलत्वञ्चि चासनानि वेत्रमयान्यगुरुवल्कलकल्पितसंचयानि च सुभाषितभाञ्जि पुस्तकानि, परिणतपाटलपटोलत्विषि च तरुणहारीतह- रिन्ति क्षीरक्षारीणि च पूगानां पल्लवावलम्बीनि सरसानि फलानि, सह- कारलतारसानां च कृष्णागुरुतैलस्य च कुपितकपिकपोलकपिलकापोति- कापलाशकोशीकवचिताङ्गीः स्थवीयसीर्वेणवीनार्डीश्च, पट्टसूत्रप्रसेवकार्पि- तांश्च भिन्नाञ्जनवर्णस्य कृष्णागुरुणो गुरुपरितापमुषश्च गोशीर्षचन्दनस्य, तुषारशिलाशकलशिशिरस्वच्छसितस्य च कर्पूरस्य, कस्तूरिकाकोशकानां च पक्वफलजूटजटिलानां च कक्कोलपल्लवानाम्, लवङ्गपुष्पमञ्जरीणां जातीफलस्तबकानां च राशीन्, अतिमधुरमधुरसामोदनिर्हारिणी- नाम् । जातिपट्टिकाः श्रेष्ठानि जघनग्रन्थनानि । संचयाः पत्रसमूहाः । पटोलस्तिक्तक ओषधिभेदः । उक्तं च - 'अथ कुलकं पटोलस्तिक्तकः पटुः' इति । कापोतिका ओषधिभेदः । गोशीर्षचन्दनस्य चन्दनभेदस्य । कोशका नाभयः । अंतिमधुरं मधुरसाया इवामोदानि हरन्ति मुञ्चन्ति यास्ताः । मधुरसा द्राक्षा । उक्तं च- 'मृद्वीका गोस्तनी द्राक्षा माध्वी मधुरसेति च' इति । अन्ये मधुरसं मकरन्दं द्रव- नक्काशी का काम किया था। कार्दरङ्ग द्वीप से आइ हुई ढालें जिनपर आव की रक्षा के लिए खोल चढ़े थे, इनके काले चमड़े पर सुनहली फूल-पत्तियों के कटाव खचित थे और इनकी गोलाई ऊंची-नीची थी। मोजपत्र की तरह मुलायम स्पर्श से सुख देने वाली जाती-पट्टिकाएँ या कटिप्रदेश में बाँधने के काम में आने वाले एक प्रकार के बढ़ियाँ पटके। नरम चित्रपटों (जामदानी) के बने हुए तकिये जिनके भीतर समूर या पक्षियों के बाल या रोँए भरे थे। बेंत के बुने हुए आसन, जिनका रङ्ग प्रियंगुमजरी की तरह ललछौँही पीली झलक का था। सुभाषितों से भरी पुस्तकें जिनके पन्ने (संचय) अगुरु को पीट कर बनाए गए थे। हरी सुपारियों के झुग्गे, जिनमें पल्लवों के साथ सरस फल झूम रहे थे, इनका रङ्ग पके हुए लाल परवल की तरह ललछौँह और हरियल पक्षी की तरह हरि- याली लिए था, इनसे दूध टपक रहा था। सहकार लताओं के रस से भरी हुई मोटी बाँस की नलियाँ, जिनके चारों ओर क्रोधित बन्दर के कपोल की भाँति कपोतिका के लाल-पीले पत्ते बँधे हुए थे। काले अगुरु का तेल भी इसी प्रकार की मोटी बाँस की नलियों में भर कर और पत्तों में लपेट कर लाया गया था। पटसन के बने हुए बोरों में भर कर काले अगुरु के ढेर लगाए गए थे, जिनका रङ्ग छूटे हुए अंजन की तरह था। गरमी में ठंडक पहुँचाने वाले गोशीर्ष नामक चन्दन की राशियाँ बरफ के शिखाखण्ड की