हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० हर्षचरितम् कुमाराल्लाभो न विस्मयाय । बालविद्याः खलु महतामुपकृतयः' इति । अपनीते च तस्मात्प्रदेशात्प्राभृतसंभारे क्षणमिव स्थित्वा 'हंसवेग ! विश्रम्यताम्' इति प्रतीहारभवनं विसर्जयांबभूव । स्वयमप्युत्थाय स्नात्वा मङ्गलाकाङ्क्षी प्राङ्मुखः प्राविशदाभोगस्य छायाम् । अथ विशत एवास्य छायाजन्मना जडिम्ना चूडामणितामनीयतेव शशिबिम्बमम्बुबिन्दुमुचश्चुम्बुरिव चन्द्रकान्तमणयो ललाटतटं कर्पूररे- णव इव व्यलीयन्त लोचनयुगले गले गलत्तुहिनकणनिकरकृतनीहारा हारा इवावबध्यन्त हरिचन्दनरसासारेणेवापाति संततमुरसि कुमुदमयमिव हृदयमभवदतिशिशिरमन्तर्हितहिमशिलेव विलीयमाना व्यलिम्पदङ्गानि । जातविस्मयश्चाकरोन्मनसि एकमजर्यं संगतमपहाय काऽस्त्यन्या प्रतिकौ- शलिकेति । आहारकाले च हंसवेगाय धवलकर्पटप्रावृतधौतनालिकेर- परिगृहीतं विलेपशेषं चन्दनमङ्गस्पृष्टे च वाससी शरत्तारकाकारतारमुक्ता- स्तबकितपदं परिवेशं नाम कटिसूत्रकम् अतिमहार्हपद्मरागालोकलोहि- का कुमार से लाभ होना उस प्रकार आश्चर्यजनक नहीं, जिस प्रकार क्षीरसमुद्र से चन्द्रमा का उद्भव होना । महापुरुष लोग उपकार के लड़कों की खेल की विद्या की तरह पहले से ही जान जाते हैं । प्राभृत की सामग्री के वहाँ से हटा लिए जाने पर क्षणभर के बाद हंसवेग को 'तुम विश्राम करो' यह कह कर प्रतिहार-भवन में भेजा । स्वयं उठकर स्नान करके मंगल की आकांक्षा से प्राङ्मुख होकर आभोग नामक उस छत्र के नीचे छाया में बैठ गए । जब हर्ष ने छत्र की छाया में प्रवेश किया तब उसकी ठंडक से मानों चन्द्र की किरणें ही घनीभूत होकर उसकी चूड़ामणि बन गईं । चन्द्रकान्तमणियाँ पसीजने लगीं और जलकण उनके ललाट पर छा गए । उनकी आँखों में कपूर का आँजन मानों लग गया । गले में बरफ के टुकड़ों के छोटे-छोटे फुहारे हार के समान कतार से बँध गए । उनके वक्षपर मानों हरिचन्दन रस बरसने लगा । हृदय मानों कुमुदों से भर कर अत्यन्त शिशिर हो गया । अदृश्य रूप में मानों बरफ की शिला उनके अङ्गों पर पिघलने लगी । आश्चर्य से भर कर उन्होंने मन में सोचा—'आमरण मैत्री के अतिरिक्त इस प्रकार से सुंदर उपहार का बदला क्या हो सकता है?' भोजन के अवसर पर राजा ने हंसवेग के लिए सफेद वस्त्र लपेट कर नारियल के साथ अपने लगाने से बचा हुआ चन्दन भेजा और उसके साथ ही अपने अङ्ग से छुवाए हुए परिधानीय वस्त्रयुगल शरत्कालीन तारों की आकृति वाले मोतियों से बना हुआ परिवेश नामक कटिसूत्र और बहुमूल्य जड़े हुए पद्मराग