भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 422

[Header] सप्तम उच्छ्वासः ३७५

स च वचनान्तरमुत्थाय पुमानूर्ध्वंचकार तद्धौतदुकूलकल्पिताच्च निचोलकादकोषीत् । आकृष्यमाण एव च यस्मिन्नतिसितमहसि सरभस- महासीव हरेण रसातलादुदलासीव शेषफणिफणामण्डलेन, अस्था- यीव चक्रीभूयान्तरिक्षे क्षीरोदेन, अघटीव गगनाङ्गने गोष्ठीबन्धः शारदेन बलाहकव्यूहेन, विश्रान्तमिव विततपक्षतिना वियति पितामहविमानहंस- यूथेन, अत्रिनेत्रनिर्गतस्य धवलधाममण्डलममनोहरो दृष्ट इव जनेन जन्म- दिवसः कुमुदबन्धोः, प्रत्यक्षीकृत इवोद्गमनक्षणो नारायणनाभिपूण्डरीकस्य, आहितेव कौमुदी प्रदोषदर्शनानन्दतृप्तिरदृणाम्, उद्माङ्क्षीदिव मन्दाकिनी- पुलिनमण्डलं महदम्बरोदरे, परिवर्तित इव दिवसः पौर्णमासीनिशया मन्दमन्दमिन्दूद्यसंदेहदूयमानमानसैर्विघटितं घटमानचञ्चुच्युतमृणाल- कोटिभिरासन्नकमलिनीचक्रवाकमिथुनैः शरज्जलधरपटलाशङ्कासंकोचित- केकारवमूकमुखपुटैः पराङ्मुखीभूतं भवनशिखण्डिमण्डलैः, प्रबुद्धमाबद्ध- चन्दान्ब्दोद्दामोल्लहलपुट्टाट्टहासविशदं कुमुदषण्डैः ।

निचोलकादाच्छादनप्रसेवकात् । अकोषीन्निष्कासितवान् । उदलास्युल्लसितम् । अस्थायि स्थितम् । अघटि घटितम् । विश्रान्तं व्यश्रमत । उद्गमनक्षण उत्पत्ति- समयः । उदमाङ्क्षीदुन्मग्नम् । परिवर्तितः स्वरूपः कृतः ।

उसके कहने पर उसने उठ कर छत्र को ऊँचा किया और सफेद दुकूल के बने हुए खोल में से उसे निकाला । उस छत्र के बाहर खींचे जाते ही अत्यन्त उज्ज्वल प्रकाश भर गया, मानों शिव ने जोर से अट्टहास किया हो या पाताल से होकर शेषनाग का फणामण्डल निकल आया हो, या चक्राकार क्षीरसमुद्र आकाश में स्थिर हो गया हो, या शरत्कालीन मेघसमूह आकाश के प्राङ्गण में सभा करने बैठा हो, या ब्रह्माजी के विमान का हंसयूथ आकाश में पंख फैला कर विश्राम लेने लगा हो । मानों लोगों ने अत्रि के नेत्र से निकले हुए उज्ज्वल धाममंडल से मनोहर चन्द्रमा का जन्मदिन देख लिया । विष्णु के नाभिकमल का उद्भवकाल प्रत्यक्ष देखने में आया । आँखों को कौमुदी- महोत्सव के देखने का आनन्द पूर्ण मिल गया । विशाल आकाश के मध्य में मन्दाकिनी की रेत मानों ऊपर उठ आई हो । दिन ही मानों पूनम की रात के रूप में बदल गया । समीप के कमलिनी-बनों में रहने वाले जोड़े चक्रवाक जो परस्पर मृणाल का आदान- प्रदान कर रहे थे, मन्द-मन्द उदित होते हुए चन्द्रमा के संदेह से दुखी होकर विघटित हो गए । उनके चंचु से मृणाल छूट कर गिर गए । भवन के मयूरों ने उसे शरत्क.क