भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 421

३७४ हर्षचरितम् स्थित्वा च मुहूर्तमिव पुनः स चतुरमुवाच- 'चतुरम्भोधिभोगभूति- भाजनभूतस्य देवस्य सद्भावगर्भमपहाय हृदयमेकमन्यदनुरूपं प्राभृतमेव दुर्लभं लोके तथाप्यस्मत्स्वामिना संदेशमशून्यतां नयता पूर्वजोपार्जितं वारुणातपत्रमाभोगाख्यमनुरूपस्थानन्यासेन कृतार्थीकृतमेतत् । अस्य च कुतूहलकृन्ति बहून्याश्चर्याणि दृश्यन्ते । तथा हि-प्रतिदिवसं प्रविशति शैत्यहेतोश्छायायाः किरणसहस्रादेकैकः सोमस्य रश्मिरस्मिन् । यस्मिन्प्र- विष्टे प्रध्यानानन्तरं स्वादवो दन्तवीणोपदेशाचार्याश्च्योतन्ति चन्द्रभासा- मम्भसां मणिशलाकाभ्यो यावदिच्छमच्छा धाराः । प्रचेता इव यश्चतु- र्णमर्णवानामधिपतिर्भूतो भावी वा तमिदमनुगृह्णाति च्छायया नेतरम् । इदं च न सप्ताचिर्दहति, न पृषदश्वो हरति, नोदकमार्द्रयति, न रजांसि मलिनयन्ति, न जरा जर्जरयतीति । एतत्तावदनुगृह्णातु दृशा देवः संदेश- मपि विस्रब्धं श्रोष्यति ।' इत्येवमभिधाय विवृत्यात्मीयं पुरुषमभ्यधात्- 'उत्तिष्ठ । दर्शय देवस्य' इति । शीतोद्भवो दन्तानामन्योन्याघातो दन्तवीणा । सप्ताचि॑रग्निः । पृषदश्वो वायुः । विवृत्य स्थित्वा । सौहार्द से आई अपनी वाणी से गौरव के साथ देव पूछ रहे हैं तो वे आज सब प्रकार कुशली हुए । कुछ देर बाद उसने फिर निपुणता के साथ कहा- 'चारों समुद्र की लक्ष्मी के भाजन देव को देने योग्य सद्भाव से भरे एक हृदय को छोड़कर लोक में और दूसरा उपहार क्या है ? फिर भी हमारे स्वामी ने पूर्वजों द्वारा उपार्जित आभोग नामक यह वारुण आतपत्र सन्देश के साथ सेवा में भेजकर योग्य स्थान में रखने से इसे कृतार्थ कर दिया । इसके अनेक कुतूहलजनक आश्चर्य देखे गये हैं । छाया की ठण्डक पाने के लिए प्रतिदिन चन्द्रमा की एक-एक किरण इसमें प्रवेश करती है। उसके प्रवेश करने पर चन्द्र के समान मणिशलाकाओं से मधुर, स्वच्छ और दाँतो को खटखटा देने वाली धारा निकलने लगती है । वरुण के समान जो चारों समुद्रों का अधिपति हुआ है अथवा होगा उसी पर इस छत्र की छाया पड़ेगी दूसरे पर नहीं। इस छत्र को अग्नि नहीं जला सकती, हवा नहीं उड़ा सकती, पानी गीला नहीं कर सकता, धूल मलिन नहीं कर सकती, एवं जरा इसे जर्जर नहीं बना सकती । देव इस पर दृष्टिपात करने का अनुग्रह करें, फिर एकान्त में संदेश भी सुनें ।' यह कह कर वह पीछे मुड़ कर अपने नौकर से बोला- 'उठो, देव के सामने वह छत्र दिखाओ ।'