भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 420

सप्तम उच्छ्वासः ३७३ अथ तत्र प्रतीहारः पृथ्वीपृष्ठप्रतिष्ठापितपाणिपल्लवो विज्ञापितवान्— 'देव ! प्राग्ज्योतिषेश्वरेण कुमारेण प्रहितो हंसवेगनामा दूतोऽन्तरङ्गस्तो- रणमध्यास्ते' इति । राजा तु 'तमाशु प्रवेशय' इति सादरमादिदेश । अथ दक्षतया क्षितिपालादराच्च प्रतीहारः स्वयमेव निरगात् । अनन्तरं च हंसवेगः सविनयमाकृत्यैव नयनानन्दसंपादनसुभगाभोगभद्रतया समुल्ल- ङ्घ्यमानगुणगरिमा प्रभूतप्राभृतभृतां पुरुषाणां समूहेन महतानुगम्यमानः प्रविवेश राजमन्दिरम् । आरादेव पञ्चाङ्गालिङ्गिताङ्गनः प्रणाममकरोत् । 'एह्येहि' इति सबहुमानमाहूतश्च प्रधावितोऽपसृतः पादपीठलुलितललाट- लेखो न्यस्तहस्तः पृष्ठे पार्थिवेनोपसृत्य भूयो नमश्चक्रे । स्निग्धनेरेन्द्रदृष्ट्या निर्दिष्टमविप्रकृष्टं स प्रदेशमध्यास्त । ततो राजा तिरश्चीं तनुमीषदिव दधानश्चामरग्राहिणीमन्तरालवर्तिनीं समुत्सार्य संमुखीनस्तं सप्रश्रयं पप्रच्छ—'हंसवेग ! श्रीमान्कच्चित्कुशली कुमारः ?' इति । स तमन्ववा- दीत्—'अद्य कुशली येनैवं स्नेहरस्रपितया सौहार्दद्रवार्द्रया सगौरवं गिरा पृच्छति देवः' इति । प्राग्ज्योतिषं कामरूपाख्यो देशः । समुल्लङ्घ्यमानो नीयमानः । संमुखीनौऽभिमुखः भोगः पालनम् । में स्थापित आसन पर विराजमान हुए । वहाँ से समायौग ( फौजी परेड ) के बर्खास्त होने की सूचना देकर क्षण भर वहीं ठहरे । इसी समय वहाँ आकर प्रतिहार ने जमीन पर हाथ टेक कर सूचना दी—'देव, प्राग्ज्योतिषेश्वर कुमार द्वारा भेजा हुआ हंसवेग नाम का अन्तरंग दूत राजद्वार पर खड़ा है ।' राजा ने 'शीघ्र उसे बुलाओ' यह आदरपूर्वक आज्ञा दी । तब बात समझ जाने वाला प्रतीहार राजा के आदर से स्वयं बाहर निकल गया । तत्पश्चात् हंसवेग ने भेंट की। सामग्री लाने वाले अनेक पुरुषों के साथ विनयपूर्वक राजमन्दिर में प्रवेश किया । आँखों को आनन्दित करने वाली वह अपनी सुभग और भद्र आकृति से ही गुणों का गौरव प्राप्त कर रहा था । दूर ही से उसने अपने पाँच अंगों से पृथिवी को छूते हुए राजा को प्रणाम किया । राजा ने 'आओ आओ' कहकर उसे आदर के साथ बुलाया । वह दौड़कर उनके पास आकर पादपीठ पर सिर रगड़ने लगा । तब राजा ने उसकी पीठ पर अपना हाथ रखा । उसने फिर उन्हें प्रणाम किया । राजा ने स्नेहभरी दृष्टि से उसे बैठने के लिए संकेत किया । तब वह थोड़ी दूर पर बैठ गया । तब राजा ने कुछ तिरछे होकर शरीर को झुकाते हुए चामरग्राहिणी को बीच से हटाकर दूत की ओर मुँह करके प्रेमपूर्वक पूछा—'हंसबेग, श्रीमान् कुमार तो कुशल से हैं ?' उसने उत्तर दिया—'जब इतने स्नेह से सनी और