भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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३७२ हर्षचरितम्

क्वाथकर्णकौरवशिशुपालसाल्वजरासंधसिन्धुराजप्रभृतयोऽभवन्भूपतयः । संतुष्टो राजा युधिष्ठिरो यो ह्यसहत समीप एव धनंजयजयजनितजग- त्कम्पः किंपुरुषाणां राज्यम् । अलसश्चण्डकोशो यो न प्राविक्षत्तद्मां जित्वा स्त्रीराज्यम् । ह्रसीय एवान्तरं तुषारगिरिगन्धमादनयोः उत्साहिनः । किष्कुः तुरुष्कविषयाः । प्रादेशः पारसीकदेशः । शशपदं शकस्थानम् । अदृ- श्यमानप्रतिप्रहारे परियात्रे यात्रैव शिथिला । शौर्यशुल्कः सुलभो दक्षिण- पथः । दक्षिणार्णवकल्लोलानिलचलितचन्दनलतासौरभसुन्दरीकृतदरीम- न्दिराद्दर्दुरादद्रेर्नेदीयसि मलयो मलयलग्न एव च महेन्द्रः ।' इत्येवंप्राया- नुद्योगद्योतकानामालापान्पार्थिवकुमाराणां बाहुशालिनां शृण्वन्नेवाससा- दावासम् । मन्दिरद्वारि चोभयतः सबहुमानं भ्रूलताभ्यां विसर्जितराज- लोकः प्रविश्य चावततार बाह्यास्थानमण्डपस्थापितमासनमाचक्राम । अपास्तसमायोगश्च क्षणमासिष्ट ।

सिन्धुनाथो जयद्रथः । ह्रसीयो ह्रस्वतरम् । साङ्गुष्ठया प्रदेशिन्या प्रादेशः । 'प्रादेश- ताळगोकर्णस्तर्जन्यादियुते तते । अङ्गुष्ठे सकनिष्ठे स्याद्वितस्तिर्द्वादशाङ्गुलः ॥' इत्यमरसिंहः । शौर्यकृतः शुल्कः पणो यत्र स शौर्यशुल्कः । अतिशयेनान्तिकं नेदीयः । 'अन्तिकबाढयोर्नेदसाधौ' इति ।

टुकड़े में एक साथ भगदत्त, दन्तवक्र, रुक्मि, कर्ण, दुर्योधन, शिशुपाल, साल्व, जरासंध, जयद्रथ आदि बहुत से राजा राज्य करते थे । राजा युधिष्ठिर कैसे सन्तोषी थे जिन्होंने दिग्विजय द्वारा जगत् को कम्पित कर देने वाले अर्जुन के रहते भी समीप ही किंपुरुषों के राज्य को सह लिया । चण्डकोश कितना आलसी था जिसने पृथिवी को जीत लेने पर भी स्त्रीराज्य में प्रवेश नहीं किया । उत्साही के लिए हिमालय और गन्धमादन पर्वतों में अंतर ही कितना है । तुरुष्कों के देश हाथ भर हैं । पारसिकों का प्रदेश एक बित्ता भर है। शकों का देश खरहे के पैर भर है । परियात्र में सेना की यात्रा ही व्यर्थ है, क्योंकि मुकाबले के लिये कोई दीखता नहीं । दक्षिणापथ शौर्य के धनी के लिए सुलभ है । जिस दर्दुर पर्वत के गुफामन्दिर दक्षिणसमुद्र के कल्लोल की हवा से हिलती हुई चन्दनलताओं की सौरभ-सुगन्धि से भर जाते हैं उसी के निकट ही तो मलयाचल है, एवं मलयाचल से मिला हुआ ही महेन्द्र पर्वत है।' राजपुत्रों की इन बातों को सुनते हुए हर्ष अपने निवास- स्थान में पहुँचे । जब मन्दिर के द्वार पर आये तो अगल-बगल में खड़े राजाओं को आदर- पूर्वक भौंह के संकेत से विदा करके अन्दर प्रवेश किया और महल के बाह्य आस्थानमण्डप