हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 418, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ३७१ ःमहाभोगिनां गुप्तये समुत्पादितम् , कैलासमिव परमेश्वरवसतये सृष्टम् , ःदृश्यमानसकलप्राणिपर्यायं चतुर्युगसर्गकोशमिव प्रजापतीनां क्लेशबहु- लमपि तपःकरणमिव क्रमकारिणं कल्याणानाम् , एवं च वीक्ष्यमाणः कटकं जगाम । आसन्नवर्तिनां च 'तत्रभवता मांधात्रा प्रवर्तिताः पन्थानो दिग्बिज- याय । अप्रतिहतरथरंहसा रघुणा लघुनैव कालेनाकारि ककुभां प्रसाद- नम् । शरासनद्वितीयः करदीचकार चक्रं क्रमागतभुजबलाभिजनधनमदा- वलिप्तानां भूभुजां पाण्डुः । पाण्डवः सव्यसाची चीनविषयमतिक्रम्य राजसूयसंपदे क्रुध्यद्गन्धर्वधनुष्कोटिटांकारकूजितकुञ्जं हेमकूटपर्वतं परा- जैष्ट । संकल्पान्तरितो विजयस्तरस्विनाम् । सहिमहिमवद्व्यवहितोऽप्यु- वाह बाहुबलव्यतिकरकातरः करं कौरवेश्वरस्य किङ्कर इवाकृती द्रुमः । नातिजिगीषवः खलु पूर्वे येनाल्प एव भूभागे भूयांसो भगदत्तदन्तवक्र- ग्रहणं स्वीकरणम्, प्लावनं च । भोगिनो भोगवन्तः, सर्पाश्च । परमेश्वरो हरोऽपि । परितः समन्तादायः । आगमनं पर्यायः । आसन्नेत्यादौ । पार्थिवसुतानामित्येवंप्रायानालापाञ्शृण्वन्नेवाससादावासमिति संबन्धः । तत्रभवता पूज्येन । सव्यसाची अर्जुनः । पराजैष्ट जिगाय । तरस्विनां पराक्रमवताम् । कौरवेश्वरो दुर्योधनः । अकृती अकृतार्थः । द्रुमाख्यः किन्नरराजः । चारों युगों की सृष्टि के कोश की भाँति सारा प्राणिवर्ग उसमें दिखाई पड़ रहा था । यद्यपि उसमें क्लेश ही क्लेश था लेकिन तपस्या की भांति अन्त में कल्याण ही करने वाला था । सम्राट् ऐसे कटक को देखते हुए चले । समीप में रहने वाले पराक्रमी राजपुत्रों ने बातचीत के द्वारा इस प्रकार का प्रोत्साहन दिया—'मान्धाता ने दिग्विजय का मार्ग दिखाया । उसी मार्ग पर चलकर अप्रतिहत रथ, वेग से रघु ने थोड़े समय में दिशाओं को शान्त कर दिया । धनुर्धारी पाण्डु ने वंश- परम्परागत भुजबल के मद में चूर अभिमानी राजाओं को अपना करद बना दिया । पाण्डुपुत्र अर्जुन ने राजसूय यज्ञ के समय चीन देश को पार करके हेमकूट पर्वत के वनों में क्रोधित होकर धनुष की टङ्कार करने वाले गन्धर्वों को जीत लिया । एकमात्र अपने ही सङ्कल्प के अभाव से वीरों की विजय में बाधा होती है। जैसे किन्नरराज द्रुम बरफ से ढँका हिमालय जैसा रक्षक पाकर भी बल के अभाव में कृतार्थ न होकर दुर्योधन का किंकर हो गया । निश्चय ही पहले के राजा विजय के इच्छुक न थे, क्योंकि थोड़ी ही जमीन के